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Kushinagar News: फसल अवशेष को जलाएं नहीं, अपनाएं वैज्ञानिक विकल्प
Wed, 26 Nov 2025 01:22 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Wed, 26 Nov 2025 01:22 AM IST
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पडरौना। धान की कटाई समाप्ति की ओर है। गेहूं की बुवाई की शुरुआत भी जिले में हो चुकी है। किसानों के पास खेत तैयार करने के लिए बहुत कम समय बचता है। धान कटाई के बाद खेत में बचे फसल अवशेष को हटाना एक चुनौती है, जिसके समाधान के रूप में कई किसान इसे जलाना आसान समझते हैं, लेकिन यह तरीका पर्यावरण, मिट्टी, मानव स्वास्थ्य और पशुधन आदि के लिए अत्यंत हानिकारक है।
सरकार की तरफ से पराली प्रबंधन के लिए कई वैज्ञानिक विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं, जिनमें सब्सिडी पर हैप्पी सीडर, सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम, पुसा डीकंपोजर, मल्चिंग तकनीक, पराली का मशरूम उत्पादन में उपयोग और आलू की फसल में मल्च विधि आदि विकल्प शामिल हैं।
ये बातें कृषि विज्ञान केंद्र सरगटिया के मौसम वैज्ञानिक श्रुति वी सिंह ने बताई। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से उपयोगी फसल के भाग को ही किसान महत्व देते हैं। फसल के बचे हुए भाग को किसान आर्थिक रूप से सही न समझ कर उसे नष्ट कर देते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि फसल अवशेष जलाने से निकलने वाला धुआं मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। गेहूं, गन्ना व धान के अवशेष जलाने से वातावरण में 70 प्रतिशत कार्बन डाइआक्साइड, सात प्रतिशत कार्बन मोनोआक्साइड, 0.66 प्रतिशत मिथेन और 2.09 प्रतिशत नाइट्रस आक्साइड निकलती है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदेह होती है।
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इससे मनुष्य और पशुओं में श्वास व त्वचा रोगों को बढ़ावा मिलता है। मृदा की ऊपरी सतह से पोषक तत्व जलकर नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि एक टन पराली जमीन में मिलाने से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, सात किलोग्राम सल्फर, 60-100 किलोग्राम पोटाश तथा 1600 किलोग्राम आर्गेनिक कार्बन प्रति एकड़ तक जमीन को प्राप्त हो जाते हैं।
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सरकार की तरफ से पराली प्रबंधन के लिए कई वैज्ञानिक विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं, जिनमें सब्सिडी पर हैप्पी सीडर, सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम, पुसा डीकंपोजर, मल्चिंग तकनीक, पराली का मशरूम उत्पादन में उपयोग और आलू की फसल में मल्च विधि आदि विकल्प शामिल हैं।
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ये बातें कृषि विज्ञान केंद्र सरगटिया के मौसम वैज्ञानिक श्रुति वी सिंह ने बताई। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से उपयोगी फसल के भाग को ही किसान महत्व देते हैं। फसल के बचे हुए भाग को किसान आर्थिक रूप से सही न समझ कर उसे नष्ट कर देते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि फसल अवशेष जलाने से निकलने वाला धुआं मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। गेहूं, गन्ना व धान के अवशेष जलाने से वातावरण में 70 प्रतिशत कार्बन डाइआक्साइड, सात प्रतिशत कार्बन मोनोआक्साइड, 0.66 प्रतिशत मिथेन और 2.09 प्रतिशत नाइट्रस आक्साइड निकलती है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदेह होती है।
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इससे मनुष्य और पशुओं में श्वास व त्वचा रोगों को बढ़ावा मिलता है। मृदा की ऊपरी सतह से पोषक तत्व जलकर नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि एक टन पराली जमीन में मिलाने से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, सात किलोग्राम सल्फर, 60-100 किलोग्राम पोटाश तथा 1600 किलोग्राम आर्गेनिक कार्बन प्रति एकड़ तक जमीन को प्राप्त हो जाते हैं।