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कुशीनगर को संजाने व संवारने में प्रशासन जुटा 16-52-57

Sat, 11 Jun 2022 11:49 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sat, 11 Jun 2022 11:49 PM IST
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Develop Greenry bank of  Hiranyawati river
हिरण्यवती नदी किनारे छाएगी हरियाली
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कसया (कुशीनगर)। कुशीनगर में प्रवाहित गंगा के समान पवित्र बौद्धकालीन हिरण्यवती नदी का किनारा जापानी पौधरोपण मियावाकी पद्धति की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। इसका शुभारंभ रविवार को प्रदेश के जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह करेंगे। इसकी तैयारी वन विभाग और प्रशासन मिलकर पूरा कर लिया है।
कुशीनगर में बुद्धा घाट से हिरण्यवती घाट के बीच मियावाकी पद्धति से पौधरोपण कर वन विकसित किया जाएगा। इसके लिए ज्वाइंट मजिस्ट्रेट पूर्ण बोरा व डीएफओ एके श्रीवास्तव की देखरेख में पौधरोपण के लिए 1700 मीटर लंबाई में हिरण्यवती नदी के किनारे पौधरोपण के लिए गड्ढे की खुदाई व अन्य तैयारी पूरी कर ली गई है। इसका शुभारंभ रविवार को प्रदेश के जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह पूर्वाह्न 11 बजे करेंगे। इस दौरान जिले भर के जनप्रतिनिधि सहित अन्य उच्चाधिकारी भी मौजूद रहेंगे।
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रेंजर कसया सत्येंद्र यादव ने बताया कि नदी के किनारे मियावाकी पद्धति के तर्ज पर पौधरोपण कर वन विकसित करने के लिए एक मीटर की दूरी पर चार पौधों को रोपित किया जाएगा। इस तरह से करीब 6800 विभिन्न प्रजाति के पौधों का रोपण होगा। मियावाकी पद्धति में पहले एक छोटा फिर मझोला और उसके बाद बड़ा पौधा रोपित किया जाएगा। इसमें किनारे सर्व वाले पौधे जैसे नींबू, मेंहदी व करौंदा लगाए जाएंगे। बताया कि पौधरोपण के लिए मृदा परीक्षण भी हुआ है। मिट्टी में 15 ट्रॉली खाद भी मिश्रित करा दिया गया है। एक मीटर में चार कोनों पर एक-एक पौधों को रोपित किया जाएगा।
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वास्तुविद ने तैयार किया मियावाकी पद्धति से गार्डेन विकसित करने की डिजाइन तैयार की
वास्तुविद नीरज कुमार वर्मा ने प्रशासन की अनुमति पर हिरण्यवती नदी के किनारे मियावाकी पद्धति की तर्ज पर विकसित करने के लिए डिजाइन तैयार किया है। इसमें नदी के दोनों तरफ बुद्धा घाट से हिरण्यवती घाट तक आकर्षक पाथवे, पथप्रकाश के लिए आकर्षक रंग-बिरंगी विक्टोरियन लाइट, नदी में नौकायन आदि की सुविधा के साथ एक सुसज्ज्ति व पर्यटकों को अपने तरफ आकर्षित करने वाला डिजाइन तैयार कर प्रशासन को मुहैया करा दिय गया है। वर्मा ने बताया कि मियावाकी पद्धति से पौधरोपण के अलावा अन्य सुविधाओं की तैयार डिजाइन का प्रस्तुतीकरण भी जलशक्ति मंत्री के समक्ष किया जाएगा। इसकी तैयारी चल रही है। वहीं उन्होंने ने बताया कि नदी में जलस्तर को बनाए रखने के लिए अलग से इसे किसी जलस्रोत से जोड़ने की भी कवायद चल रही है जिसे मूर्त रूप दिया जा सकता है।
यह है मियावाकी पद्धति
रेंजर सत्येंद्र यादव ने बताया कि मियावाकी पद्धति के प्रणेता जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी हैं। इस पद्धति से बहुत कम समय व जगह में घने जंगल को विकसित किया जा सकता है। इस पद्धति में देशी प्रजाति के पौधे एक दूसरे के समीप लगाए जाते हैं जो कम स्थान घेरने के साथ ही अन्य पौधों की वृद्धि में भी सहायक होते हैं। कहा कि सघनता की वजह से ये पौधे सूर्य की रोशनी को धरती पर आने से रोकते हैं जिससे धरती पर खरपतवार नहीं उग पाता है। तीन वर्ष के पश्चात इन पौधों की देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है। पौधे की वृद्धि दसगुना तेजी से होती है। परिणामस्वरूप पौधरोपण सामान्य स्थिति से 30 गुना अधिक सघन होता है। वन क्षेत्र तैयार करने में पारंपरिक विधि से लगभग 200 से 300 वर्ष का समय लगता है। लेकिन, मियावाकी पद्धति से उन्हें केवल 20 से 30 वर्षों में ही तैयार किया जा सकता है।

वर्जन
हिरण्यवती नदी का किनारा जल्द हरा-भरा व आकर्षक दिखने लगे, इसके लिए जापानी पद्धति मियावाकी की तर्ज पर पौधरोपण करने का शुभारंभ आज होना है। इसके बाद इस कार्य को जल्द पूरा कर मूर्त रूप देने का काम किया जाएगा। इसकी तैयारी पूरी कर ली गई है।
-पूर्ण बोरा,ज्वाइंट मजिस्ट्रेट, कसया
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