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Kushinagar News: दो साल में चार गुना ज्यादा जहरीली हुई शहर की हवा, खतरे में सेहत

Wed, 08 Nov 2023 01:10 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 08 Nov 2023 01:10 AM IST
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City air becomes four times more poisonous in two years, health in danger
पडरौना नगर के बाईपास रोड पर उड़ती हुई धूल में आते जाते लोग। संवाद
- कोरोना काल में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन हो रहा था, जिसके चलते आई थी प्रदूषण में गिरावट
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संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना। कोरोना काल में लोगों का आवागमन और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के बंद होने के कारण सड़कों पर वाहन नहीं चल रहे थे। लंबे समय तक वाहनों के सड़क पर न चलने के कारण हवा में काफी हद तक सुधार हो गया था। इसके अलावा कोरोनाकाल में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन हो रहा था, जिसके चलते प्रदूषण में गिरावट आई थी।लेकिन इसके बाद वाहनों ब्लैक कार्बन नाम का जहर वायुमंडल में बढ़ रहा है, जो धीरे-धीरे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता जा रहा है। हालत यह है कि दो साल के अंदर इलाके की हवा तीन से चार गुना जहरीली हो गई।
शहर में प्रदूषण का स्तर जिन इलाकों में सड़कें बदहाल या निर्माणाधीन हैं, वहां सबसे अधिक है। इन इलाकों में वाहनों से निकलने वाले धुएं से प्रदूषण फैला रहे है। वहीं, क्षतिग्रस्त या निर्माणाधीन सड़क से उड़ने वाली धूल वाहनों से निकले धुएं में मिलकर भारी हो जा रही है। इससे वे वायुमंडल में घुलने के बजाए निचलते स्तर पर ही रह जाते हैं।
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उदित नारायण इंटर कॉलेज के प्रवक्ता अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि पर्यावरण में वायु प्रदूषण का मुख्य वजह वातावरण में बनने वाले गैस में सड़कों पर उड़ने वाले सूक्ष्म कण मिलकर भारी होना है। इससे ये वायुमंडल में घुलने के बजाए निचले स्तर पर ही ठहर जाते हैं। सबसे अधिक नुकसान धूल उड़ने वाले रास्ते के आस-पास रहने वाले लोगों के साथ पेड़-पौधों को उठाना पड़ता है। पेड़-पौधों की पत्तियों पर धूल जमने से उनका विकास रुकने के अलावा अन्य पौधों की तरह ऑक्सीजन बनाने की क्षमता कम हो जाती है। इसका सीधा असर लोगों पर पड़ता है। उन्होंने बताया कि कोरोना कॉल में शहर की एक्यूआई 50 से 75 के बीच थी, लेकिन इस समय शहर की एक्यूआई 250 के करीब है।
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शहर के इन हिस्सों में जाएं तो बरतें सावधानी
अम्बे चौक, बेलवा चुंगी, बाईपास रोड, कॉलेज रोड, कठकुइयां रोड, मुख्य पश्चिमी गंडक नहर मार्ग, कुबेरस्थान रोड, महिला थाना रोड सहित कई ऐसे मार्ग हैं, जहां से जाने पर धूल का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में मास्क या गमछा साथ में रखना जरुरी है। इसी तरह जनपद के अन्य हिस्सों में भी कई ऐसे स्थान हैं, जहां धूल, निर्माण सामग्री सड़कों पर रखे होने या अन्य कारणों से इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा वाहनों से निकलने वाले धुएं से भी शहर और अन्य क्षेत्रों में लोगों को समस्याएं हो सकती हैं।

विशेषज्ञ ने कहा

कोरोना काल भले ही लोगों के लिए खराब समय रहा, लेकिन दूसरे पहलू को देखें तो फायदे भी हुए हैं। कोरोना के समय वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण समेत अन्य प्रदूषण पर करीब-करीब रोक सी लग गई थी। वातावरण करीब-करीब साफ हो चुका था। वैज्ञानिक रिपोर्ट की मानें तो नाइट्रोजन ऑक्साइड का कन्सन्ट्रेशन में बहुत गिरावट आई थी। पॉल्यूशन मैटर (पीएम 2.5) जिसका आकार 2.5 माइक्रोन से भी कम होता है। वह मानव शरीर में लंग्स के द्वारा ब्लॅड स्ट्रीम में पहुंच जाते हैं। इसका असर हृदय रोग, सांस लेने में परेशानी होती है। कोरोना काल के समय इसमें भी बहुत गिरावट आई थी। कंपनियों के मलबे जो कि नदियों में मिला देने से जल प्रदूषण होता है, उसने भी भारी मात्रा में गिरावट आई है।

- प्रोफेसर आकाश आनंद वर्मा, विभागाध्यक्ष, भौतिक विज्ञान विभाग, उदित नारायन पोस्ट ग्रेजएट कॉलेज, पडरौना


पर्यावरणविद ने कहा

सड़कों पर उड़ने वाली धूल और वाहनों से निकलने वाले धुएं पर्यावरण को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। सड़कों के किनारे देखें तो सभी पेड़ पौधों की पत्तियां धूल से पटी है। इससे वे खुद बीमार होते जा रहे हैं। मानव के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन बनाने की बात कौन कहे स्वयं उनकी ही उम्र कम होती जा रही है। अब सौ वर्ष से अधिक उम्र के पेड़ बहुत कम बचे हैं। बरगद, पाकड़ और पीपल जैसे लंबी आयु वाले पेड़ कुछ ही रह गए हैं। पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए लोगों को मन से तैयार होना पड़ेगा। प्राकृतिक जीवन जीने का प्रयास करना होगा। अधिक से अधिक पौधरोपण और उसके संरक्षण के प्रति ध्यान देना होगा।

- डॉ. हरिओम मिश्र, पर्यावरणविद
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