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विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष..
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पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित नहीं हो सके पुरातात्विक टीले
इतिहासकार प्राचीन टीलों में कई काल खंडों के दफन होने का करते रहे हैं दावा
पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित होने पर रोजगार के अवसर हो सकते हैं सृजित
संवाद न्यूज एजेंसी
तुर्कपट्टी (कुशीनगर)। फाजिलनगर क्षेत्र में स्थित विभिन्न टीले प्राचीन इतिहास के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह टीले कई काल खंडों के सांस्कृतिक विरासत के गवाह हैं। इन टीलों के उत्खनन से अवशेषों से यह स्थल दो धर्मावलंबियों के आस्था का केंद्र बिंदु है। अगर टीलों की समुचित खुदाई और संरक्षण को लेकर ठोस प्रयास हो तो पर्यटन का मजबूत चेन बनाई जा सकती है। करीब 14 किलोमीटर का यह क्षेत्र स्थानीय स्तर पर रोजगार का बेहतर अवसर भी प्रदान कर सकता है।
प्रख्यात पुरातत्वविद कनिंघम ने अपनी पुस्तक में पडरौना के आस-पास ही महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली होने का दावा किया था। उनके दावे पर शोध के दौरान 1976 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन प्राचीन इतिहास व पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर डॉ. कृष्णानंद त्रिपाठी ने कुशीनगर के पूरब 14 किलोमीटर क्षेत्र को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण होने की पुष्टि की थी। तब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने 1979 में फाजिलनगर क्षेत्र के सठियांव और उस्मानपुर स्थित बीरभारी के टीले का उत्खनन कराया था। उत्खनन में मिले मिलीं गुप्तकालीन दीवारें, मूर्ति, सिक्के, शील, ग्रवेपर आदि के अध्ययन के बाद तत्कालीन इतिहासकार डॉ. चंद्रमौलि शुक्ल, डॉ. शैल चतुर्वेदी, पीके लहरी, महावीर प्रसाद कंदोई ने इसे बौद्धकालीन बताया था। इतिहासविदों ने अंग, मगध, नालंदा, वैशाली, मंडग्राम, हस्तिग्राम, जंबूग्राम के साथ आम्रग्राम (अमेया), भोजनगर (बदुराव), कुकुत्था (कुलकुला) बीरभारी, मरिचहिया, सिंदूरिया, लंगड़ी, मठिया आदि स्थलों को बौद्धकालीन बताया। यह भी उल्लेख मिला कि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने सठियांव में ही निर्वाण प्राप्त किया था। 1992 में देवरिया के तत्कालीन डीएम मनोज कुमार ने इन स्थलों के महत्व को केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को अवगत कराया था। अब यह समस्त टीले उत्तर प्रदेश पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से संरक्षित किए जा चुके हैं, लेकिन अभी भी पर्यटन के मानचित्र पर आने बाकी हैं। सठियांव गांव में स्थित बुद्ध के चुंद स्थल तक जाने का कोई पक्का रास्ता नहीं है, जबकि यहां विभिन्न देशों के पर्यटक आते रहते हैं। 1995 से सरैया महंतपट्टी के टीले से लगातार प्राचीन पंचकर्म के सिक्के मिलते रहे हैं। उस्मानपुर के टीले का बृहद उत्खनन कार्य भी हुआ, लेकिन अब तक वह उपेक्षित है। इतिहासकारों ने बुद्ध के समकालीन जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली भी फाजिलनगर के बगल के ग्राम सठियांव को मानते हैं। यहां 1994 में पर्यटन विभाग ने उनका सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय से जुड़ा भव्य कृति स्तंभ और स्तूप बनवाया है। जैन धर्मावलंबियों ने भी यहां 1971 में एक मंदिर का निर्माण कराया है। इसी प्रकार श्रीलंका के धर्मग्रंथ दीपवंश में वर्णित मैनपुर कोट, तुर्कपट्टी में 1981 में उत्खनन के दौरान मिली गुप्तकालीन बेशकीमती नीलम पत्थर की सूर्य प्रतिमा भी क्षेत्र के समृद्ध प्राचीन इतिहास की धरोहर हैं। अगर इन स्थलों पर समुचित ध्यान देते हुए सर्वांगीण विकास की पहल की जाए तो यह समस्त स्थल पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो सकते हैं। इससे स्थानीय लोगों को बड़े स्तर पर रोजगार प्राप्त हो सकता है।
फाजिलनगर का नाम पावानगर रखा जाए
इतिहासकारों ने फाजिलनगर का पौराणिक नाम पावानगर बताया है। इस नाम के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा गया है। बौद्ध सर्किट की तरह महावीर स्वामी सर्किट का प्रस्ताव भी प्रक्रिया में है। ताकि विभिन्न देशों के आने वाले श्रद्धालु कुशीनगर के साथ साथ, पावानगर, सठियांव, उस्मानपुर, कुलकुला, बीरभारी के टीला आदि स्थलों का भ्रमण कर सकें।
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- गंगा सिंह कुशवाहा, विधायक, फाजिलनगर
बौद्ध व महावीर के काल खंड में यह स्थल पावापुरी रही है। यह समस्त टीले देश की सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक हैं। अगर इनका समुचित विकास किया जाए तो बौद्ध व जैन धर्मावलंबियों के लिए बड़ा आध्यात्मिक केंद्र निर्मित किया जा सकता है। इंटेक इस संदर्भ में कई ठोस कदम उठा रही है।
महावीर प्रसाद कंदोई, अध्यक्ष, गोरखपुर क्षेत्र
भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटेक)
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इतिहासकार प्राचीन टीलों में कई काल खंडों के दफन होने का करते रहे हैं दावा
पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित होने पर रोजगार के अवसर हो सकते हैं सृजित
संवाद न्यूज एजेंसी
तुर्कपट्टी (कुशीनगर)। फाजिलनगर क्षेत्र में स्थित विभिन्न टीले प्राचीन इतिहास के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह टीले कई काल खंडों के सांस्कृतिक विरासत के गवाह हैं। इन टीलों के उत्खनन से अवशेषों से यह स्थल दो धर्मावलंबियों के आस्था का केंद्र बिंदु है। अगर टीलों की समुचित खुदाई और संरक्षण को लेकर ठोस प्रयास हो तो पर्यटन का मजबूत चेन बनाई जा सकती है। करीब 14 किलोमीटर का यह क्षेत्र स्थानीय स्तर पर रोजगार का बेहतर अवसर भी प्रदान कर सकता है।
प्रख्यात पुरातत्वविद कनिंघम ने अपनी पुस्तक में पडरौना के आस-पास ही महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली होने का दावा किया था। उनके दावे पर शोध के दौरान 1976 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन प्राचीन इतिहास व पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर डॉ. कृष्णानंद त्रिपाठी ने कुशीनगर के पूरब 14 किलोमीटर क्षेत्र को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण होने की पुष्टि की थी। तब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने 1979 में फाजिलनगर क्षेत्र के सठियांव और उस्मानपुर स्थित बीरभारी के टीले का उत्खनन कराया था। उत्खनन में मिले मिलीं गुप्तकालीन दीवारें, मूर्ति, सिक्के, शील, ग्रवेपर आदि के अध्ययन के बाद तत्कालीन इतिहासकार डॉ. चंद्रमौलि शुक्ल, डॉ. शैल चतुर्वेदी, पीके लहरी, महावीर प्रसाद कंदोई ने इसे बौद्धकालीन बताया था। इतिहासविदों ने अंग, मगध, नालंदा, वैशाली, मंडग्राम, हस्तिग्राम, जंबूग्राम के साथ आम्रग्राम (अमेया), भोजनगर (बदुराव), कुकुत्था (कुलकुला) बीरभारी, मरिचहिया, सिंदूरिया, लंगड़ी, मठिया आदि स्थलों को बौद्धकालीन बताया। यह भी उल्लेख मिला कि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने सठियांव में ही निर्वाण प्राप्त किया था। 1992 में देवरिया के तत्कालीन डीएम मनोज कुमार ने इन स्थलों के महत्व को केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को अवगत कराया था। अब यह समस्त टीले उत्तर प्रदेश पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से संरक्षित किए जा चुके हैं, लेकिन अभी भी पर्यटन के मानचित्र पर आने बाकी हैं। सठियांव गांव में स्थित बुद्ध के चुंद स्थल तक जाने का कोई पक्का रास्ता नहीं है, जबकि यहां विभिन्न देशों के पर्यटक आते रहते हैं। 1995 से सरैया महंतपट्टी के टीले से लगातार प्राचीन पंचकर्म के सिक्के मिलते रहे हैं। उस्मानपुर के टीले का बृहद उत्खनन कार्य भी हुआ, लेकिन अब तक वह उपेक्षित है। इतिहासकारों ने बुद्ध के समकालीन जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली भी फाजिलनगर के बगल के ग्राम सठियांव को मानते हैं। यहां 1994 में पर्यटन विभाग ने उनका सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय से जुड़ा भव्य कृति स्तंभ और स्तूप बनवाया है। जैन धर्मावलंबियों ने भी यहां 1971 में एक मंदिर का निर्माण कराया है। इसी प्रकार श्रीलंका के धर्मग्रंथ दीपवंश में वर्णित मैनपुर कोट, तुर्कपट्टी में 1981 में उत्खनन के दौरान मिली गुप्तकालीन बेशकीमती नीलम पत्थर की सूर्य प्रतिमा भी क्षेत्र के समृद्ध प्राचीन इतिहास की धरोहर हैं। अगर इन स्थलों पर समुचित ध्यान देते हुए सर्वांगीण विकास की पहल की जाए तो यह समस्त स्थल पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो सकते हैं। इससे स्थानीय लोगों को बड़े स्तर पर रोजगार प्राप्त हो सकता है।
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फाजिलनगर का नाम पावानगर रखा जाए
इतिहासकारों ने फाजिलनगर का पौराणिक नाम पावानगर बताया है। इस नाम के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा गया है। बौद्ध सर्किट की तरह महावीर स्वामी सर्किट का प्रस्ताव भी प्रक्रिया में है। ताकि विभिन्न देशों के आने वाले श्रद्धालु कुशीनगर के साथ साथ, पावानगर, सठियांव, उस्मानपुर, कुलकुला, बीरभारी के टीला आदि स्थलों का भ्रमण कर सकें।
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- गंगा सिंह कुशवाहा, विधायक, फाजिलनगर
बौद्ध व महावीर के काल खंड में यह स्थल पावापुरी रही है। यह समस्त टीले देश की सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक हैं। अगर इनका समुचित विकास किया जाए तो बौद्ध व जैन धर्मावलंबियों के लिए बड़ा आध्यात्मिक केंद्र निर्मित किया जा सकता है। इंटेक इस संदर्भ में कई ठोस कदम उठा रही है।
महावीर प्रसाद कंदोई, अध्यक्ष, गोरखपुर क्षेत्र
भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटेक)