{"_id":"69cad415d720f90fbd03c818","slug":"two-accused-acquitted-in-12-year-old-minor-kidnapping-case-kaushambi-news-c-261-1-pr11004-138952-2026-03-31","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kaushambi News: 12 साल पुराने नाबालिग अपहरण मामले में दो आरोपी बरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kaushambi News: 12 साल पुराने नाबालिग अपहरण मामले में दो आरोपी बरी
Tue, 31 Mar 2026 01:20 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Tue, 31 Mar 2026 01:20 AM IST
विज्ञापन
पिपरी थाना क्षेत्र से जुड़े करीब 12 साल पुराने नाबालिग अपहरण मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों को बरी कर दिया। विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा, इसलिए आरोपियों को दोषमुक्त किया जाता है।
वर्ष 2014 में पिपरी थाना क्षेत्र निवासी राज बहादुर ने अपनी नाबालिग बेटी के अपहरण का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया था कि बेटी का अपहरण कर उसे बेच दिया गया है। पुलिस ने मामले में पॉक्सो एक्ट समेत अन्य धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की थी।
जांच के बाद पुलिस ने विरेंद्र उर्फ कटारी और छोटन को आरोपी बनाते हुए उनके खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद मामला विशेष न्यायालय में विचाराधीन रहा और लंबे समय तक सुनवाई चलती रही।
विज्ञापन
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और साक्ष्यों की कमजोरी को अदालत के समक्ष रखा। वहीं अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस साक्ष्यों के साथ सिद्ध नहीं कर सका।
विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) अशोक श्रीवास्तव ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सके।
विज्ञापन
वर्ष 2014 में पिपरी थाना क्षेत्र निवासी राज बहादुर ने अपनी नाबालिग बेटी के अपहरण का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया था कि बेटी का अपहरण कर उसे बेच दिया गया है। पुलिस ने मामले में पॉक्सो एक्ट समेत अन्य धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की थी।
विज्ञापन
जांच के बाद पुलिस ने विरेंद्र उर्फ कटारी और छोटन को आरोपी बनाते हुए उनके खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद मामला विशेष न्यायालय में विचाराधीन रहा और लंबे समय तक सुनवाई चलती रही।
विज्ञापन
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और साक्ष्यों की कमजोरी को अदालत के समक्ष रखा। वहीं अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस साक्ष्यों के साथ सिद्ध नहीं कर सका।
विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) अशोक श्रीवास्तव ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सके।