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Kaushambi News: खुरपका-मुंहपका का कहर, जिले में तीन हजार से अधिक मवेशी संक्रमित
Sat, 24 Jan 2026 12:47 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Sat, 24 Jan 2026 12:47 AM IST
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बीमारी से ग्रसित भैंस। संवाद
- फोटो : 1
जिले में खुरपका-मुंहपका बीमारी के फैलने की आशंका से पशुपालकों में दहशत का माहौल है। मंझनपुर, मूरतगंज और सरसवां ब्लॉक के कई गांवों में बीमारी तेजी से फैल रही है। दावा है कि जिले में तीन हजार से अधिक मवेशियों में बीमारी के लक्षण देखे जा रहे हैं।
हालांकि मुख्य पशु चिकित्साधिकारी (सीवीओ) डॉ. अशोक कुमार ने बीमारी की पुष्टि से इन्कार किया है। उन्होंने कहा कि करीब एक सप्ताह पहले आईबीआरआई टीम और फैजाबाद वेटनरी विश्वविद्यालय की टीम ने मूरतगंज क्षेत्र से दो नमूने लेकर जांच की थी। जांच रिपोर्ट में खुरपका-मुंहपका के लक्षण नहीं पाए गए।
सीवीओ के अनुसार जिले में लगभग 250 मवेशियों में बीमारी के लक्षण मिले हैं, जबकि ग्रामीण स्तर पर तीन हजार से अधिक मवेशियों के बीमार होने का दावा किया जा रहा है। सीवीओ ने दावा किया यह डगनाल व फूडरॉट बीमारी है। जो पशुपालक की लापरवाही से होती है। लक्षण सामान्य होने के कारण लोग इसे खुरपका व मुंहपका समझ लेते हैं।
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बताया कि जिले में बीते दो दिनों से सभी ब्लॉकों में टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि जिले में खुरपका-मुंहपका की स्थानीय स्तर पर जांच सुविधा उपलब्ध नहीं है और लक्षणों के आधार पर ही उपचार किया जा रहा है।
सरसवां में मवेशी की हो चुकी है मौत
- सरसवां ब्लॉक के रक्सौली गांव में बीमारी के कारण बीते दिनों करीब आधा दर्जन पशुओं की मौत हो चुकी है। गांव के राजेश की दो भैंसों की मौत हो गई। वहीं, पशुपालक नवनीत कुमार की भैंसों की जान मुश्किल से बचाई जा सकी। हरबंश मौर्य की भैंस का इलाज अभी भी जारी है। इसके अलावा अलवारा गांव के राम लोटन व उमेश की भैंस की मौत हुई है। इन मवेशियों के मौत के पीछे खुरपका-मुंहपका बीमारी की आशंका जताई जा रही है।
यह है खुरपका-मुंहपका रोग के लक्षण
- खुरपका-मुंहपका एक संक्रामक वायरल रोग है। यह गाय, भैंस, बकरी, भेड़ व सूअर में होता है। इसके प्रमुख लक्षण मुंह व खुरों में छाले, बुखार, लंगड़ापन, लार टपकना और दूध उत्पादन में गिरावट हैं। इसका कोई सीधा इलाज नहीं है। नियमित टीकाकरण, साफ-सफाई और बीमार पशु को अलग रखना ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।
डगनाॅल व फूडरॉट के लक्षण व बचाव के उपाय
- सीवीओ ने बताया कि गाय-भैंस में डगनाल (पैर की सूजन/संक्रमण) और फूटरॉट (खुरों की सड़न) मुख्य रूप से नमी और गंदगी के कारण होने वाली बीमारी है। यह संक्रमण से फैलता है। बचाव के लिए बाड़े को सूखा रखें, नियमित खुरों की सफाई करें।
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हालांकि मुख्य पशु चिकित्साधिकारी (सीवीओ) डॉ. अशोक कुमार ने बीमारी की पुष्टि से इन्कार किया है। उन्होंने कहा कि करीब एक सप्ताह पहले आईबीआरआई टीम और फैजाबाद वेटनरी विश्वविद्यालय की टीम ने मूरतगंज क्षेत्र से दो नमूने लेकर जांच की थी। जांच रिपोर्ट में खुरपका-मुंहपका के लक्षण नहीं पाए गए।
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सीवीओ के अनुसार जिले में लगभग 250 मवेशियों में बीमारी के लक्षण मिले हैं, जबकि ग्रामीण स्तर पर तीन हजार से अधिक मवेशियों के बीमार होने का दावा किया जा रहा है। सीवीओ ने दावा किया यह डगनाल व फूडरॉट बीमारी है। जो पशुपालक की लापरवाही से होती है। लक्षण सामान्य होने के कारण लोग इसे खुरपका व मुंहपका समझ लेते हैं।
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बताया कि जिले में बीते दो दिनों से सभी ब्लॉकों में टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि जिले में खुरपका-मुंहपका की स्थानीय स्तर पर जांच सुविधा उपलब्ध नहीं है और लक्षणों के आधार पर ही उपचार किया जा रहा है।
सरसवां में मवेशी की हो चुकी है मौत
- सरसवां ब्लॉक के रक्सौली गांव में बीमारी के कारण बीते दिनों करीब आधा दर्जन पशुओं की मौत हो चुकी है। गांव के राजेश की दो भैंसों की मौत हो गई। वहीं, पशुपालक नवनीत कुमार की भैंसों की जान मुश्किल से बचाई जा सकी। हरबंश मौर्य की भैंस का इलाज अभी भी जारी है। इसके अलावा अलवारा गांव के राम लोटन व उमेश की भैंस की मौत हुई है। इन मवेशियों के मौत के पीछे खुरपका-मुंहपका बीमारी की आशंका जताई जा रही है।
यह है खुरपका-मुंहपका रोग के लक्षण
- खुरपका-मुंहपका एक संक्रामक वायरल रोग है। यह गाय, भैंस, बकरी, भेड़ व सूअर में होता है। इसके प्रमुख लक्षण मुंह व खुरों में छाले, बुखार, लंगड़ापन, लार टपकना और दूध उत्पादन में गिरावट हैं। इसका कोई सीधा इलाज नहीं है। नियमित टीकाकरण, साफ-सफाई और बीमार पशु को अलग रखना ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।
डगनाॅल व फूडरॉट के लक्षण व बचाव के उपाय
- सीवीओ ने बताया कि गाय-भैंस में डगनाल (पैर की सूजन/संक्रमण) और फूटरॉट (खुरों की सड़न) मुख्य रूप से नमी और गंदगी के कारण होने वाली बीमारी है। यह संक्रमण से फैलता है। बचाव के लिए बाड़े को सूखा रखें, नियमित खुरों की सफाई करें।