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भर्ती घोटाले में निशाने पर सीएमओ दफ्तर
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Fri, 07 Apr 2017 12:10 AM IST
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कौशाम्बी
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जिला अस्पताल के एनआईसीयू वार्ड में हुई फर्जी भर्ती को लेकर सीएमओ दफ्तर अधिकारियों के निशाने पर आ गया है। मामले का खुलासा होने से विभाग में हड़कंप मच गया है। प्रकरण को लेकर अधिकारी व कर्मचारियों ने चुप्पी साध ली है। इस मामले में सीएमओ दफ्तर के संविदा कर्मी व स्टाफ नर्स की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। डीएम ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पूरे प्रकरण की जांच कराने का निर्देश जारी कर दिया है।
जिला अस्पताल के एनआईसीयू वार्ड के स्टॉफ के लिए हाल ही में फर्जी भर्ती प्रक्रिया कराई गई थी। इस खेल में विभाग के अधिकारी व कर्मचारी भी शामिल थे। एक संविदा कर्मी व स्टाफ नर्स ने पूरी भर्ती प्रक्रिया कराई। युवाओं से उनका आवेदन जमा कराया। इसके बाद सात-सात लाख रुपये जमा करवाया गया। जिला अस्पताल में आवेदकों का जिला अस्पताल में ही गुपचुप तरीके से साक्षात्कार कराया गया। इसके बाद नियुक्ति पत्र भेजा गया। 22 से 27 मार्च के बीच हवा में ही आवेदकों की ज्वाइनिंग भी करा दी गई। इस पूरे खेल पर पर्दा पड़ा था। खेरवा के जबर सिंह पुत्र अमर सिंह जब जिला अस्पताल में ज्वाइन करने पहुंचा तो पता चला कि नियुक्ति प्रमाण पत्र फर्जी है तो मामले का खुलासा हुआ। सीएमएस डॉ. दीपक सेठ का कहना है कि जब एनआईसीयू वार्ड में स्टाफ रिक्त ही नहीं है तो ऐसे में भर्ती प्रक्रिया कैसे हो सकती है।
इस पूरे प्रकरण में सीएमओ दफ्तर अधिकारियों के निशाने पर आ गया है। जिस संविदा कर्मी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वह सीएमओ दफ्तर का कारखास बताया जाता है। इस संविदा कर्मी ने नौकरी के दौरान ही एक संस्था बनाई और संस्था के नाम से स्वास्थ्य विभाग से कई बड़े काम हासिल किए। इतना ही नहीं स्वास्थ्य सेवा देने का भी टेंडर लिया। जिसकी आड़ में वह युवाओं को नौकरी देता था। सीएमओ डॉ. एसके उपाध्याय ने अचानक इस मामले में चुप्पी साध ली है। डीएम अखंड प्रताप सिंह का कहना है कि मामला गंभीर है। वह इसकी जांच करा रहे हैं। सीएमओ से भी जांच रिपोर्ट मांगी गई है। इस प्रकरण में जल्द ही कार्रवाई होगी। उन लोगों को भी चिह्नित करने का निर्देश दिया गया है, जिन्होंने यह फर्जीवाड़ा किया है।
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एमसीएच विंग में नौकरी देने के नाम पर किया था खेल
जिला अस्पताल में 12 करोड़ की लागत से एमसीएच विंग बनकर तैयार है। महिला एवं चाइल्ड केयर सेंटर भवन के हस्तांतरण को लेकर सीएमओ ने पेच फंसा दिया है। यह भवन सीएमएस डॉ. दीपक सेठ को हस्तांतरित होनी चाहिए थी, लेकिन सीएमओ ने पीएचसी प्रभारी डॉ. अरुण पटेल को हस्तांतरित कर दी। डीएम व सीडीओ के संज्ञान में मामला आया तो उन्होंने हस्तक्षेप किया। इसके बाद भी अभी तक बिल्डिंग सीएमएस को नहीं मिली। फर्जी भर्ती प्रक्रिया को लेकर चर्चा है कि इसी भवन में सबको नौकरी देने का वादा करके रुपये लिया गया था। भाजपा सरकार बनते ही सीएम योगी ने सभी भर्तियों पर रोक लगा दी थी। इसलिए आनन-फानन में सबको बुलाकर 22 मार्च के पहले नियुक्ति पत्र भेज दिया गया और इसके बाद उनकी ज्वाइनिंग करा दी गई।
क्यों नहीं कराई जा रही एफआईआर
फर्जी भर्ती मामले को लेकर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी हीलाहवाली कर रहे हैं। युवाओं को नौकरी के नाम पर लूट लिया गया और अधिकारी चुप्पी साधे हैं। सीएमओ दफ्तर में चर्चा है कि इस मामले का खुलासा 22 मार्च को ही हो गया था। एक जनप्रतिनिधि ने भी इस मामले में आपत्ति जताई थी। इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने फर्जीवाड़ा करने वालाें के खिलाफ रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई, बल्कि वह ऐसा करने से बच रहे हैं।
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जिला अस्पताल के एनआईसीयू वार्ड के स्टॉफ के लिए हाल ही में फर्जी भर्ती प्रक्रिया कराई गई थी। इस खेल में विभाग के अधिकारी व कर्मचारी भी शामिल थे। एक संविदा कर्मी व स्टाफ नर्स ने पूरी भर्ती प्रक्रिया कराई। युवाओं से उनका आवेदन जमा कराया। इसके बाद सात-सात लाख रुपये जमा करवाया गया। जिला अस्पताल में आवेदकों का जिला अस्पताल में ही गुपचुप तरीके से साक्षात्कार कराया गया। इसके बाद नियुक्ति पत्र भेजा गया। 22 से 27 मार्च के बीच हवा में ही आवेदकों की ज्वाइनिंग भी करा दी गई। इस पूरे खेल पर पर्दा पड़ा था। खेरवा के जबर सिंह पुत्र अमर सिंह जब जिला अस्पताल में ज्वाइन करने पहुंचा तो पता चला कि नियुक्ति प्रमाण पत्र फर्जी है तो मामले का खुलासा हुआ। सीएमएस डॉ. दीपक सेठ का कहना है कि जब एनआईसीयू वार्ड में स्टाफ रिक्त ही नहीं है तो ऐसे में भर्ती प्रक्रिया कैसे हो सकती है।
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इस पूरे प्रकरण में सीएमओ दफ्तर अधिकारियों के निशाने पर आ गया है। जिस संविदा कर्मी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वह सीएमओ दफ्तर का कारखास बताया जाता है। इस संविदा कर्मी ने नौकरी के दौरान ही एक संस्था बनाई और संस्था के नाम से स्वास्थ्य विभाग से कई बड़े काम हासिल किए। इतना ही नहीं स्वास्थ्य सेवा देने का भी टेंडर लिया। जिसकी आड़ में वह युवाओं को नौकरी देता था। सीएमओ डॉ. एसके उपाध्याय ने अचानक इस मामले में चुप्पी साध ली है। डीएम अखंड प्रताप सिंह का कहना है कि मामला गंभीर है। वह इसकी जांच करा रहे हैं। सीएमओ से भी जांच रिपोर्ट मांगी गई है। इस प्रकरण में जल्द ही कार्रवाई होगी। उन लोगों को भी चिह्नित करने का निर्देश दिया गया है, जिन्होंने यह फर्जीवाड़ा किया है।
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एमसीएच विंग में नौकरी देने के नाम पर किया था खेल
जिला अस्पताल में 12 करोड़ की लागत से एमसीएच विंग बनकर तैयार है। महिला एवं चाइल्ड केयर सेंटर भवन के हस्तांतरण को लेकर सीएमओ ने पेच फंसा दिया है। यह भवन सीएमएस डॉ. दीपक सेठ को हस्तांतरित होनी चाहिए थी, लेकिन सीएमओ ने पीएचसी प्रभारी डॉ. अरुण पटेल को हस्तांतरित कर दी। डीएम व सीडीओ के संज्ञान में मामला आया तो उन्होंने हस्तक्षेप किया। इसके बाद भी अभी तक बिल्डिंग सीएमएस को नहीं मिली। फर्जी भर्ती प्रक्रिया को लेकर चर्चा है कि इसी भवन में सबको नौकरी देने का वादा करके रुपये लिया गया था। भाजपा सरकार बनते ही सीएम योगी ने सभी भर्तियों पर रोक लगा दी थी। इसलिए आनन-फानन में सबको बुलाकर 22 मार्च के पहले नियुक्ति पत्र भेज दिया गया और इसके बाद उनकी ज्वाइनिंग करा दी गई।
क्यों नहीं कराई जा रही एफआईआर
फर्जी भर्ती मामले को लेकर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी हीलाहवाली कर रहे हैं। युवाओं को नौकरी के नाम पर लूट लिया गया और अधिकारी चुप्पी साधे हैं। सीएमओ दफ्तर में चर्चा है कि इस मामले का खुलासा 22 मार्च को ही हो गया था। एक जनप्रतिनिधि ने भी इस मामले में आपत्ति जताई थी। इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने फर्जीवाड़ा करने वालाें के खिलाफ रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई, बल्कि वह ऐसा करने से बच रहे हैं।