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International Literacy Day 2021: बेसहारा तारों के सूर्य हैं आदित्य, 29 वर्षों में दो लाख से अधिक गरीब बच्चों को कर चुके हैं साक्षर
Wed, 08 Sep 2021 04:10 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Wed, 08 Sep 2021 04:10 PM IST
सार
आदित्य बताते हैं कि ट्यूशन पढ़ाने के दौरान बहुत से ऐसे बच्चे आए जो फीस नहीं दे सकते थे। अब उनसे फीस न लें तो खुद भूखे सोना पड़ता था और फीस के लिए जोर डालें तो बच्चे छोड़कर चले जाते थे। इस पीड़ा से उन्हें गरीब बच्चों को साक्षर बनाने की प्रेरणा मिली।
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अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस 2021: गली, मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाते आदित्य कुमार
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
गरीब बच्चों को साक्षर करने का सपना संजोए आदित्य कुमार जिस गली, मोहल्ले, गांव, कस्बे या कानपुर से गुजरते हैं, वहां की झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों की जिंदगी में ‘शिक्षा का उजियारा’ भर जाते हैं। 29 वर्षों से गरीब बच्चों को क, ख, ग... सिखाने में जुटे आदित्य देश के कोने-कोने तक साइकिल चलाकर दो लाख से अधिक बच्चों को साक्षर बना चुके हैं।
पांच लाख किलोमीटर साइकिल चला चुके आदित्य को गिनीज बुक और लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ने प्रशंसा पत्र दिया है। फर्रुखाबाद के सलेमपुर गांव में जन्मे और बीएससी तक कानपुर में पढ़ाई करने वाले आदित्य कुमार ने बच्चों को साक्षर बनाने के लिए घर, परिवार छोड़ दिया और शादी तक नहीं की।
आदित्य बताते हैं कि पिता भूप नारायण किसान थे। फसल खराब होती तो मजदूरी करके परिवार का पेट पालते थे। वे हमेशा कर्ज में डूबे रहे। इस वजह से पूरे परिवार के सामने खाने तक के लाले पड़े रहे। मां लौंगश्री ने घरों में काम करके और लोगों से मदद मांगकर उन्हें इंटर तक पढ़ाया।
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पांच लाख किलोमीटर साइकिल चला चुके आदित्य को गिनीज बुक और लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ने प्रशंसा पत्र दिया है। फर्रुखाबाद के सलेमपुर गांव में जन्मे और बीएससी तक कानपुर में पढ़ाई करने वाले आदित्य कुमार ने बच्चों को साक्षर बनाने के लिए घर, परिवार छोड़ दिया और शादी तक नहीं की।
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आदित्य बताते हैं कि पिता भूप नारायण किसान थे। फसल खराब होती तो मजदूरी करके परिवार का पेट पालते थे। वे हमेशा कर्ज में डूबे रहे। इस वजह से पूरे परिवार के सामने खाने तक के लाले पड़े रहे। मां लौंगश्री ने घरों में काम करके और लोगों से मदद मांगकर उन्हें इंटर तक पढ़ाया।
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बीएससी के लिए कानपुर आना पड़ा, तब समझ में आया कि गरीबी क्या होती है। कई-कई दिन खाने को नहीं मिलता था। तब ट्यूशन पढ़ाकर अपना और अपने परिवार का पेट पाला और बीएससी तक पढ़ाई की।
इस तरह मिली प्रेरणा
आदित्य बताते हैं कि ट्यूशन पढ़ाने के दौरान बहुत से ऐसे बच्चे आए जो फीस नहीं दे सकते थे। अब उनसे फीस न लें तो खुद भूखे सोना पड़ता था और फीस के लिए जोर डालें तो बच्चे छोड़कर चले जाते थे। इस पीड़ा से उन्हें गरीब बच्चों को साक्षर बनाने की प्रेरणा मिली।
1992 में इस साक्षरता अभियान को कानपुर के रावतपुर इलाके से शुरू किया। पांच साल तक अलग-अलग झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को पढ़ाया। लोग उन्हें दान स्वरूप कुछ पैसे दे देते तो उसी से भोजन और कपड़ों का इंतजाम कर लेते। फुटपाथ पर चादर बिछाकर कहीं भी सो जाते थे।
इस तरह मिली प्रेरणा
आदित्य बताते हैं कि ट्यूशन पढ़ाने के दौरान बहुत से ऐसे बच्चे आए जो फीस नहीं दे सकते थे। अब उनसे फीस न लें तो खुद भूखे सोना पड़ता था और फीस के लिए जोर डालें तो बच्चे छोड़कर चले जाते थे। इस पीड़ा से उन्हें गरीब बच्चों को साक्षर बनाने की प्रेरणा मिली।
1992 में इस साक्षरता अभियान को कानपुर के रावतपुर इलाके से शुरू किया। पांच साल तक अलग-अलग झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को पढ़ाया। लोग उन्हें दान स्वरूप कुछ पैसे दे देते तो उसी से भोजन और कपड़ों का इंतजाम कर लेते। फुटपाथ पर चादर बिछाकर कहीं भी सो जाते थे।
युवाओं से बच्चों को पढ़ाने की करते हैं प्रार्थना
आदित्य बताते हैं कि कानपुर के बाद अन्य जिलों में उन्होंने यह अभियान शुरू किया। जिस क्षेत्र से गुजरते हैं, वहां फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों की तलाश करते हैं। फिर उस क्षेत्र के पढ़े-लिखे युवाओं से संपर्क कर उन्हें एक या दो घंटे पढ़ाने की प्रार्थना करते हैं। वे कुछ दिन रुककर कक्षाएं संचालित करवाते हैं। उसके बाद आगे निकल जाते हैं। उनके इस कार्य पर डिस्कवरी चैनल ने एक घंटे का एपिसोड भी बनाया है।
आदित्य बताते हैं कि कानपुर के बाद अन्य जिलों में उन्होंने यह अभियान शुरू किया। जिस क्षेत्र से गुजरते हैं, वहां फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों की तलाश करते हैं। फिर उस क्षेत्र के पढ़े-लिखे युवाओं से संपर्क कर उन्हें एक या दो घंटे पढ़ाने की प्रार्थना करते हैं। वे कुछ दिन रुककर कक्षाएं संचालित करवाते हैं। उसके बाद आगे निकल जाते हैं। उनके इस कार्य पर डिस्कवरी चैनल ने एक घंटे का एपिसोड भी बनाया है।
मैं बच्चों के लिए हर शहर में स्कूल नहीं खोल सकता, लेकिन अपने जैसे लोगों को पढ़ाने के लिए प्रेरित जरूर कर सकता हूं। ऐसे बुजुर्गों की तलाश करता हूं जो सरकारी सेवा से रिटायर हुए हों। उनसे बच्चों के लिए कुछ समय निकालने की प्रार्थना करता हूं। बहुत से लोग मान जाते हैं और वर्षों तक कक्षाएं चलाते रहते हैं। हर गरीब बच्चे को साक्षर करने के प्रयास में जुटा हूं। - आदित्य कुमार