मानवता को शर्मसार कर देने वाली कुप्रथा, एशिया के सबसे बड़े ब्लॉक की पंचायत का हाल आपको रुला देगा
वर्षों पहले शासन की ओर से मैला ढोने की प्रथा पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। लेकिन, उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के उरेंग गांव में सुबह होते ही मैला ढोने वाली महिलाएं देखी जा सकती हैं। जिला प्रशासन अधिक से अधिक गांवों को ओडीएफ की श्रेणी में लाना चाह रहा है। इस गांव की कुप्रथा की ओर किसी जिम्मेदारों का ध्यान नहीं जाता। अमर उजाला प्रतिनिधि ने उन मैला ढोने वाले तीन परिवारों से बात की तो उन्होंने दुखड़ा रो दिया। उन लोगों का कहना है कि उनके पास कोई रोजगार नहीं है जिससे उनका और उनके परिवार का पालन-पोषण हो सके। मजबूरी में उन्हें मैला ढोने जैसा काम करना पड़ता है। इन गिने-चुने परिवारों के पास शौचालय नहीं हैं। बच्चों के आधार कार्ड न होने की वजह से बच्चों का दाखिला प्राथमिक विद्यालय में नहीं हो पा रहा है।
प्रधान प्रतिनिधि सुधीर कुमार ने बताया कि मैंने कई बार इन लोगों को मैला ढोने से मना किया। लेकिन, इन लोगों ने मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने बताया कि कई बार इन लोगों से पंचायत में सफाई कार्य करने को कहा जिससे उनकी हाजिरी मनरेगा में लगाई जाए और उन्हें रोजगार मिले। इसके बाद भी ये लोग काम करने नहीं आए।
मामला संज्ञान में नहीं है। अमर उजाला के माध्यम से यह जानकारी मिली है। बहुत जल्द स्थलीय निरीक्षण करके इस प्रथा पर पूर्णत: रोक लगाई जाएगी और अगर इस कार्य के लिए कोई जोर-जबरजस्ती करता है तो उस पर कार्रवाई की जाएगी।
- राजाराम यादव, खंड विकास अधिकारी महेवा
पूजा ने बताया कि उन्हें सरकार की ओर से कोई सुविधाएं नहीं मिली हैं। गरीबी के कारण वह मैला ढोने का कार्य करती हैं। उसका कहना है कि वह इस कार्य को तब तक बंद नहीं करेंगी जब तक उन्हें शासन की ओर से कोई सुविधा नहीं मिल जाती।
शशि का कहना है कि मैला ढोना उन्हें अच्छा नहीं लगता, लेकिन मजबूरी कुछ भी कराए। उसका कहना है कि गरीबों की कोई नहीं सुनता, सबको अपनी-अपनी पड़ी है।