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मानवता को शर्मसार कर देने वाली कुप्रथा, एशिया के सबसे बड़े ब्लॉक की पंचायत का हाल आपको रुला देगा

Fri, 13 Jul 2018 09:30 AM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Updated Fri, 13 Jul 2018 09:30 AM IST
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untold story of people Carrying human feces on head
मैला ढोने की कुप्रथा  - फोटो : अमर उजाला
केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार गांवों-देहातों की दशा सुधारने व स्वच्छता के लिए लगातार प्रयासरत हैं। तमाम योजनाओं के तहत करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। पर, एशिया के सबसे बड़े ब्लॉक महेवा की सबसे बड़ी पंचायत उरेंग में जारी कुप्रथा केवल मानवता को शर्मसार ही नहीं करती बल्कि कई सवाल भी खड़े करती है। यहां का हाल और लोगों की जुबानी सुनकर कोई भी पत्थर दिल खुद को पिघलने से रोक नहीं सकता।

 

 

 

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धर्मेंद्र, जितेंद्र - फोटो : अमर उजाला

वर्षों पहले शासन की ओर से मैला ढोने की प्रथा पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। लेकिन, उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के उरेंग गांव में सुबह होते ही मैला ढोने वाली महिलाएं देखी जा सकती हैं। जिला प्रशासन अधिक से अधिक गांवों को ओडीएफ की श्रेणी में लाना चाह रहा है। इस गांव की कुप्रथा की ओर किसी जिम्मेदारों का ध्यान नहीं जाता। अमर उजाला प्रतिनिधि ने उन मैला ढोने वाले तीन परिवारों से बात की तो उन्होंने दुखड़ा रो दिया। उन लोगों का कहना है कि उनके पास कोई रोजगार नहीं है जिससे उनका और उनके परिवार का पालन-पोषण हो सके। मजबूरी में उन्हें मैला ढोने जैसा काम करना पड़ता है। इन गिने-चुने परिवारों के पास शौचालय नहीं हैं। बच्चों के आधार कार्ड न होने की वजह से बच्चों का दाखिला प्राथमिक विद्यालय में नहीं हो पा रहा है।  

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मैला ढ़ोने की कुप्रथा - फोटो : अमर उजाला

प्रधान प्रतिनिधि सुधीर कुमार ने बताया कि मैंने कई बार इन लोगों को मैला ढोने से मना किया। लेकिन, इन लोगों ने मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने बताया कि कई बार इन लोगों से पंचायत में सफाई कार्य करने को कहा जिससे उनकी हाजिरी मनरेगा में लगाई जाए और उन्हें रोजगार मिले। इसके बाद भी ये लोग काम करने नहीं आए। 
 

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मैला ढ़ोने की कुप्रथा - फोटो : अमर उजाला

मामला संज्ञान में नहीं है। अमर उजाला के माध्यम से यह जानकारी मिली है। बहुत जल्द स्थलीय निरीक्षण करके इस प्रथा पर पूर्णत: रोक लगाई जाएगी और अगर इस कार्य के लिए कोई जोर-जबरजस्ती करता है तो उस पर कार्रवाई की जाएगी। 
- राजाराम यादव, खंड विकास अधिकारी महेवा 
 

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मैला ढ़ोने की कुप्रथा - फोटो : अमर उजाला
मैला ढोने वालों की व्यथा 
पूजा ने बताया कि उन्हें सरकार की ओर से कोई सुविधाएं नहीं मिली हैं। गरीबी के कारण वह मैला ढोने का कार्य करती हैं। उसका कहना है कि वह इस कार्य को तब तक बंद नहीं करेंगी जब तक उन्हें शासन की ओर से कोई सुविधा नहीं मिल जाती। 

शशि का कहना है कि मैला ढोना उन्हें अच्छा नहीं लगता, लेकिन मजबूरी कुछ भी कराए। उसका कहना है कि गरीबों की कोई नहीं सुनता, सबको अपनी-अपनी पड़ी है। 
 
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