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जिंदगी की सच्चाई से रूबरू कराती हैं 'कुरान की ये आयतें'
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Sun, 04 Mar 2018 10:05 PM IST
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यूपी में हमीरपुर के मौदहा में रहमानिया इंटर कॉलेज में दरसे क़ुरान के दौरान मुस्तक़ीम फ़ारूकी ने सूरह बकरा की आयत 180 से 190 तक का अनुवाद सुनाया। इस सुरह: में अल्लाह फरमाते हैं कि ईमान वालों पर रोजे फ़र्ज किए गए हैं। जैसे पिछले लोगों पर रोजे फ़र्ज किए गए थे। ताकि तुम तक़वा, संयम वाले बन सको।
क़ुरान का दावा है कि पिछले सभी लोगों पर रोजे किसी न किसी रूप में फ़र्ज थे। हम देखते हैं कि आज संसार के सभी मजाहिब में चाहे वो आसमानी हो या ग़ैर आसमानी सभी में रोजा (फास्ट या उपवास) के रूप में मौजूद है। अल्लाह फरमाता है कि रमजान के महीने में ही क़ुरान नाजिल किया गया। जोकि समस्त इंसानों के लिए हिदायत है और यह फुरकान भी है। यानी इंसान अगर बहुत से रास्तों के बीच फंस जाए और उसको यह समझ में न आए कि किसकी बात सही है तो क़ुरान पढ़ें।
इसमे सच और झूठ को अलग करने की शक्ति है। रमजान के महीने में हर मुसलमान को रोजे रखना फ़र्ज है। सिर्फ मरीज, मुसाफिर, दूध पिलाने वाली मां और मासिक धर्म वाली महिलाओं और बहुत कमजोर और बूढ़े लोगों को छूट है। वह रमजान के बाद अगले रमजान के पहले अपने छूटे रोजे पूरे करें। ऐसे बूढ़े जो बहुत कमजोर हैं और बाद में भी रोजा नहीं रख सकते उन को हर रोजे के बदले एक ग़रीब इंसान को दिन में एक बार भरपेट अपना जैसा खाना खिलाना है।
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रोजा इफ्तार से सहरी तक कुछ भी खाने पीने और जायज बातों की इजाजत है। यह रोजे बेश क़ीमती अल्लाह की हिदायत क़ुरान के नाजिल करने पर अल्लाह की बड़ाई और शुक्रिया अदा करने के लिए भी हैं। आगे अल्लाह फरमाता है कि मेरे बंदे मुझ से जब भी फरियाद करते हैं मैं उनकी फरियाद को सुनता और क़बूल करता हूँ। फिर फ़रमाया औरत, मर्द का और मर्द, औरत का लिबास हैं अर्थात दोनों के एक दूसरे पर बराबर अधिकार और कर्तव्य हैं। दोनों में न कोई किसी से कम है और न कोई किसी से ज्यादा है, बल्कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।
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क़ुरान का दावा है कि पिछले सभी लोगों पर रोजे किसी न किसी रूप में फ़र्ज थे। हम देखते हैं कि आज संसार के सभी मजाहिब में चाहे वो आसमानी हो या ग़ैर आसमानी सभी में रोजा (फास्ट या उपवास) के रूप में मौजूद है। अल्लाह फरमाता है कि रमजान के महीने में ही क़ुरान नाजिल किया गया। जोकि समस्त इंसानों के लिए हिदायत है और यह फुरकान भी है। यानी इंसान अगर बहुत से रास्तों के बीच फंस जाए और उसको यह समझ में न आए कि किसकी बात सही है तो क़ुरान पढ़ें।
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इसमे सच और झूठ को अलग करने की शक्ति है। रमजान के महीने में हर मुसलमान को रोजे रखना फ़र्ज है। सिर्फ मरीज, मुसाफिर, दूध पिलाने वाली मां और मासिक धर्म वाली महिलाओं और बहुत कमजोर और बूढ़े लोगों को छूट है। वह रमजान के बाद अगले रमजान के पहले अपने छूटे रोजे पूरे करें। ऐसे बूढ़े जो बहुत कमजोर हैं और बाद में भी रोजा नहीं रख सकते उन को हर रोजे के बदले एक ग़रीब इंसान को दिन में एक बार भरपेट अपना जैसा खाना खिलाना है।
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रोजा इफ्तार से सहरी तक कुछ भी खाने पीने और जायज बातों की इजाजत है। यह रोजे बेश क़ीमती अल्लाह की हिदायत क़ुरान के नाजिल करने पर अल्लाह की बड़ाई और शुक्रिया अदा करने के लिए भी हैं। आगे अल्लाह फरमाता है कि मेरे बंदे मुझ से जब भी फरियाद करते हैं मैं उनकी फरियाद को सुनता और क़बूल करता हूँ। फिर फ़रमाया औरत, मर्द का और मर्द, औरत का लिबास हैं अर्थात दोनों के एक दूसरे पर बराबर अधिकार और कर्तव्य हैं। दोनों में न कोई किसी से कम है और न कोई किसी से ज्यादा है, बल्कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।