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लाखाें के लिए मिसाल है गांव की ये महिला, दास्तां सुनकर छलक अाएंगे अांसू

Fri, 28 Oct 2016 07:54 PM IST
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला कानपुर
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला कानपुर Updated Fri, 28 Oct 2016 07:54 PM IST
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The women of the village is example for lakhs of people
सिलाई कर अपने बेटे के लिए शाेभा ने बनाया कुर्ता - फोटो : राहुल शुक्ला, अमर उजाला कानपुर



कहते हैं ना जिंदगी कब करवटें बदल ले किसी को मालूम नहीं होता। कुछ यही हुआ हमीरपुर, सुमेरपुर के इंगूठा गांव की शोभा के साथ। शोभा की कहानी उन महिलाओं के लिए मिसाल है जो खुद को कमजोर समझती हैं। अपने पांव तक चौखट के बाहर रखने में कतराती हैं, फिर खुद के लिए अावाज उठाना ताे दूर की बात हाेती है। शाेभा भी कुछ इन्हीं परिस्थितियाें से गुजरीं। दाने-दाने काे माोहताज थी, लेकिन अाखिरकार एक दिन इनके जिंदगी में एक नया सवेरा अाया अाैर इनकी जिंदगी उजालाें से भर गई। अाज शाेभा अपने जैसाें काे काम दे रही हैं। उन्हें उनके पैराें पर खड़ा हाेना सीखा रही हैं। पढ़िए शाेभा की पूरी दास्तां...

 

शादी, खुशियां अाैर फिर मातम

The women of the village is example for lakhs of people
गांव की दूसरी महिलाअाें के साथ शाेभा


मूल रूप से इटावा की रहने वाली शाेभा की शादी वर्ष 2000 में हुई थी। स्नातक उत्तीर्ण शाेभा अपने जिंदगी में बहुत कुछ करना चाहती थी, लेकिन कुदरत काे मंजूर न था। शादी के बाद से शाेभा एक सामाजिक कुप्रभा का शिकार हुई, जहां उन्हें केवल घूंघट ही मिला। तीन साल बाद शोभा की गोद एक बेटे से भरी ताे वही उसका सपना बन गया। सभी बेहद खुश थे, लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन न चली। बेटा पैदा होने के महज 12 दिनों बाद ही शोभा का सुहाग उजड़ गया। इस वाक्या ने शोभा को पूरी तरह से तोड़ दिया। जब शाेभा काे अपनाें का साथ चाहिए था, तब उसके अपनाें ने उसे अकेला कर दिया। वह घर में थी ताे लेकिन केवल नाैकरानी बनकर। एक-एक पैसे के लिए उसे घरवालाें के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता था। भीख मांगना पड़ता था। लेकिन फिर भी घरवालाें का दिल नहीं पसीजता। यहां तक की बेटे के इलाज के लिए भी घरवाले उसे मदद नहीं देते थे।

 
The women of the village is example for lakhs of people
शाेभा द्वारा तैयार किए गए कपड़े - फोटो : राहुल शुक्ला, अमर उजाला कानपुर
एेसे बदली दास्तां
गाेद में बच्चा लिए अाखिर शाेभा क्या करती। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह घर के गाय और भैंस पालने लगी। पहले जाे गाय तीन से चार लीटर दूध दिया करते थे वह अाठ से दस लीटर दूध देने लगे। शाेभा घरवालाें से छिपकर इन दूध काे बेच दिया करती थी। इससे जाे पैसा मिलता वह बच्चे की परवरिश में लगाने लगी। लेकिन यह कबतक चलता। बच्चे के बड़े हाेने पर उसे अच्छे स्कूल में दाखिला जाे कराना था, लेकिन दूध से उतनी कमाई नहीं हाेती थी। ऐसे समय शाेभा की जिंदगी में मंजू दीदी आई। मंजू हिंदुस्तान यूनिलिवर लिमिटेड (एचयूएल) के सामुदायिक कार्यक्रम ‘प्रभात’ के जरिए महिलाअाें काे आत्मनिर्भर बनाने का काम करती थी। उन्हाेंने किसी तरह शोभा के घर वालाें से बातचीत की। बताया कि अगर शाेभा सिलाई-कढ़ाई लेगी ताे घर के कपड़े वही सिल दिया करेगी। इस तरह से अपना फायदा देख ससुरालवालाें ने भी शाेभा काे सिलाई सीखने के लिए मंजू के साथ भेज दिया।

 
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दूसराें काे भी देती हैं काम

The women of the village is example for lakhs of people
शाेभा द्वारा तैयार किया गया बैग

आज शोभा बाजार से सूट, सलवार आदि कपड़ों की सिलाई के लिए आर्डर लेती हैं। करीब तीन वर्ष बाद वह इस कौशल से अच्छी कमाई कर ले रही हैं। अब वह खुद के साथ अपने जैसी महिलाअाें काे भी आत्मनिर्भर बनाने का काम कर रही हैं। उन्हें प्रशिक्षित कर उनके अधिकार बताती हैं। मंजू के साथ मिलकर वह पूरे गांव की महिलाअाें काे एकजुट कर रही हैं।
 
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