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Kanpur News: अवध के बादशाह के वजीर आगा मीर का बसाया बाजार ही बाद में कहलाया नवाबगंज

Tue, 07 Oct 2025 02:38 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 07 Oct 2025 02:38 AM IST
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The market established by Aga Mir, the minister of the King of Awadh, was later called Nawabganj.
कानपुर। शहर का पॉश मोहल्ला नवाबगंज कभी खास लोगों का बाजार हुआ करता था। दरअसल, अंग्रेजों के समय में बिठूर का ज्योरा गांव जिला मुख्यालय घोषित था। यहीं सिविल कोर्ट, ट्रेजरी, कलेक्टर निवास, मौजूदा लक्ष्मण बाग कालोनी के पास जेल और रैना मार्केट से विष्णुपुरी के बीच कई कोर्ट थे। आसपास जजों और अधिकारियों के बंगले थे। इस वजह से करीब के गांवों में सेठों, वकीलों और अभिजात्य वर्ग के लोग बस गए। इन्हीं कुलीन लोगों को ध्यान में रखकर अवध के बादशाह गाजीउद्दीन हैदर के वजीर आगा मीर ने 1832 के आसपास नवाब की गंज (तब बाजार को गंज कहते थे) बसाई। यही नवाबगंज कहलाने लगा। 1818 के गजट के अनुसार, यह ज्योरा गांव 89 एकड़ में बसा था। आबादी के लिहाज से यह बिठूर (10,813) के बाद दूसरा सबसे बड़ी आबादी (4,462) वाला कस्बा था।
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कानपुर का इतिहास हिस्सा अव्वल (भाग-1) के मुताबिक, अवध के बादशाह गाजीउद्दीन हैदर की मौत के बाद उनका बेटा नसीरुद्दीन हैदर गद्दी पर बैठा। उसने आगा मीर को पद से हटा दिया। कंपनी की एक फौजी टुकड़ी अक्तूबर 1830 में आगा मीर को परिवार के साथ गंगापार (कानपुर) छोड़ गई। वह पहले जूही के एक बंगले में सवादा कोठी के पास ठहरे फिर ग्वालटोली के पास बख्शी ग्रांड (ग्रांट) के बंगले को खरीद कर उसमें रहने लगे। इस परिवार को इसीलिए ग्वालटोली के नवाब के नाम से भी जाना जाता है। नवाब की गंज को बसाने के पांच साल बाद 1837 में आगा मीर का इंतकाल हो गया जिस कमरे में वह नमाज अदा करते थे उन्हें वहीं दफना दिया गया। बाद में यह इमारत ग्वालटोली मकबरा कहलाने लगी। परिवार के सदस्य दूसरी कोठी में चले गए।
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कानपुुर पंचायत के संयोजक व सचिव धर्म प्रकाश गुप्ता ने बताया कि तत्कालीन नवाबगंज का क्षेत्र मौजूदा नवाबगंज थाने से लेकर एसडी कॉलेज और एचबीटीयू के पूर्वी कैंपस के पास बनी मस्जिद तक माना जाता है। नवाबगंज मोहल्ले में प्रतिष्ठित रईस व जमींदार शिवली निवासी डिप्टी श्यामलाल की कोठी आज भी विद्यमान है। वह वीएसएसडी काॅलेज के लिए भूमि देने वाले व काॅलेज के विधि विभाग के शुरू होने पर उसके व छात्रावास के अध्यक्ष भी रहे थे। 1922 में जब कॉलेज की शुरुआत हुई तो इसका नाम सनातन धर्म कॉलेज ऑफ कामर्स था।
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रईस और नामचीन लोगों ने बनाया ठिकाना
कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप कुमार शुक्ल ने बताया कि यहां रईस और नामचीन लोगों ने ठिकाना बनाया। 19 शताब्दी के मध्यकाल के पहले सनद प्राप्त वकील ईश्वरी प्रसाद हीरालाल शिवली से आकर नवाबगंज में रहने लगे। 1840 में हरदोई के बिलग्राम से लाला दरगाही लाल यहां रहने आए। वह नाना साहेब के विरोधी वकील रहे। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शंकर दत्त मिश्रा ने बताया कि अपनी कविताओं के लिए जेल गए कांग्रेस शहर अध्यक्ष, पार्षद और दो बार लोकसभा का चुनाव लड़ चुके कवि छैल बिहारी दीक्षित उर्फ कंटर कवि, सपा के शहर अध्यक्ष स्वर्गीय श्याम लाल गुप्त, इकबाल बहादुर श्रीवास्तव, सभासद प्रेम चंद्र अग्निहोत्री समेत कई नामी और रईस लोग यहीं के निवासी थे।


शहर की पहली मंचीय कवयित्री और कालापानी की सजा
अनूप कुमार शुक्ल ने बताया कि कवयित्री विष्णु कुमारी श्रीवास्तव उर्फ मंजू भी यहीं की थीं। वह पहली महिला थीं जिन्होंने साहित्यरत्न व प्रभाकर की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। 15 अप्रैल 1933 को महादेवी वर्मा ने प्रयाग में अखिल भारतीय महिला कवि सम्मेलन का आयोजन किया। कवयित्री मंजू, रामकुमारी चौहान व राजकुमारी ने कानपुर से पहली बार प्रतिनिधित्व कर मंचीय कविता को आगे बढ़ाया था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने पर नवाबगंज निवासी सिपाही हरदेव सिंह (35) को कालापानी की सजा देकर सात मई 1858 को अंडमान निकोबार द्वीप समूह भेजा गया था।


- प्रस्तुति आदर्श त्रिपाठी
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