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कंधा मिलाकर चल सकतीं तो कंधा क्यों नहीं दे सकतीं, स्मृति ने भाजपा नेता की अर्थी उठाई तो छिड़ी बहस

Tue, 28 May 2019 07:18 PM IST
शिखा पांडेय यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Tue, 28 May 2019 07:18 PM IST
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smriti irani lends a shoulder to bjp leader surendra singh news
स्मृति ने भाजपा नेता की अर्थी उठाई (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
रचती नए आयाम तू, फिर क्यों है बेनाम तू। पैर पृथ्वी पर जमा, नाम दुनिया में कमा। विजय का परचम लिए, शिखर तक भाग री....जाग री तू जाग री... कवियित्री डॉ. रश्मि कुलश्रेष्ठ की यह कविता नारी सशक्तीकरण का संदेश देती है। कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली नारी अर्थी को कंधा क्यों नहीं दे सकती, इस बहस पर कानपुर की महिलाओं ने अमेठी सांसद स्मृति ईरानी का पूरा समर्थन किया है।
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अमेठी में भाजपा नेता की हत्या के बाद उनके परिवार को सहारा देने पहुंची स्मृति ईरानी ने न केवल परिवार को ढांढस बंधाया, बल्कि उनकी अर्थी को कंधा भी दिया। तब से सोशल मीडिया पर एक बहस छिड़ गई है। किसी ने इसे पॉलिटिकल ड्रामा बताया तो कोई महिलाओं के अर्थी देने की बात से सहमत नजर आया। कानपुर की महिलाओं के अलग-अलग विचार सामने आए...
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जन्म देने की अधिकारी, तो कंधा देने का भी हक
नारी संतान को नौ महीने गर्भ में सुरक्षित संचित रखकर जन्म देती है। यदि वो जन्म देने की अधिकारी है तो मृत्यु उपरांत कंधा देने का भी हक है। किसी की भावना को पॉलिटिकली देखना गलत है।
- उमा विश्वकर्मा, समाजसेविका

देख कर मिलती है सीख
जब भी हमसे ऊपर का प्रभावशाली व्यक्ति समाज की लीक से हटकर काम करता है, तो प्रेरणा सबको मिलती है। स्मृति ईरानी ने जो मिसाल पेश की है, वह महिलाओं के मन में अमिट छाप छोड़ेगी। परंपराएं पहले भी टूटी हैं, जब बेटी ने पिता या माता की अर्थी को कंधे दिए, लेकिन दूसरे के घर जाकर वहां अर्थी को कंधा देने का साहस नहीं हुआ है। स्मृति ईरानी को देखकर अब यह वर्जनाएं भी टूटेंगी।
- डॉ. आभा सिंह, पीपीएन डिग्री कॉलेज

बस इस पर राजनीति का रंग न चढ़े
स्मृति ईरानी द्वारा अर्थी को कंधा देना की परंपरा तब तक बहुत अच्छी है, जब तक इस पर पॉलिटिकल रंग न चढ़े। महिला को जब कोई कम नहीं आंकता तो अंतिम क्रिया के वक्त कमजोर मानकर पीछे क्यों कर दिया जाता है। इस पर वैसे भी लंबी बहस की जरूरत है। स्मृति ईरानी द्वारा अपने करीबी को कंधा दिया जाना एक अच्छे संकेत के रूप में उभरा है। समाज इससे जरूर कुछ सीखेगा।
- डॉ. रश्मि कुलश्रेष्ठ, कवयित्री

बेहद प्रशंसनीय है स्मृति का कदम
महिलाएं कंधे पर सिर रखकर रोने के लिए नहीं हैं। महिला सशक्तीकरण और जागरुकता की बात करने वाले लोगों को पता नहीं क्यों यह सब पॉलिटिकल ड्रामा  लगता है। स्मृति ईरानी के इस कदम ने देश के सामने मिसाल प्रस्तुत की है। बेहद प्रशंसनीय कदम है। जिंदगी भर साथ देने वाली बेटियों को जीवन की अंतिम यात्रा में कंधा देने का पूरा हक है।
- डॉ. कुसुम सिंह, साहित्यकार
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