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सेक्स रैकेट: 29 साल में पहली सजा

Fri, 25 Dec 2015 02:01 AM IST
आशुतोष मिश्रा/कानपुर
आशुतोष मिश्रा/कानपुर Updated Fri, 25 Dec 2015 02:01 AM IST
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Sex racket: the first sentence in 29 years

सेक्स रैकेट मामले में प्रिवेंशन ऑफ इममॉरल ट्रैफिक एक्ट (पीटा) के तहत शहर में पहली बार अदालत ने सजा सुनाई है। एडीजे विष्णु चंद्र वैश्य की कोर्ट ने देह व्यापार में लिप्त पाए गए एक महिला और तीन पुरुषों को तीन-तीन साल कैद और साढ़े छह-साढ़े छह हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया है। सरकारी अधिवक्ता का दावा है कि 1986 में पीटा लागू होने के बाद इस एक्ट में शहर में यह पहली सजा है।

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देह व्यापार की सूचना मिलने पर 20 दिसंबर 2003 को सीओ बाबूपुरवा शैलेश कुमार यादव, सीओ नजीराबाद कन्हैया लाल ने फोर्स के साथ हर्ष नगर स्थित मैत्री रेस्टोरेंट पर छापा मारकर नई बस्ती निवासी जितेंद्र सिंह और कर्नलगंज निवासी मो. अजीम को दो केबिनों में दो युवतियों के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा था।
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रेस्टोरेंट संचालक आवास विकास निवासी सुरेंद्र तिवारी और एक अन्य युवती को भी दबोचा गया था। केबिनों से आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद हुई थी। सुरेंद्र तिवारी, जितेंद्र सिंह, मो. अजीम और तीनों युवतियों को जेल भेजा गया था।
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शासकीय अधिवक्ता राजेश्वर तिवारी ने बताया कि इस मामले में दो युवतियां जमानत के बाद से ही फरार हो गई थीं। सुरेंद्र तिवारी, जितेंद्र सिंह, मो. अजीम और एक युवती को सजा सुनाई गई। उन्होंने दावा किया कि पीटा में शहर में यह पहली सजा है। इस केस में गवाही और बरामदगी अहम रही।

पुलिस के सभी छह गवाहों ने समय से गवाही दी। रेस्टोरेंट से बरामद सील की गई आपत्तिजनक सामग्री कोर्ट में बतौर सबूत रखी गई।

1956 में बना था कानून
अधिवक्ता शिवाकांत दीक्षित ने बताया कि 1950 में न्यूयार्क में हुए एक अधिवेशन में देह व्यापार पर एक्ट बना था। न्यूयार्क में लागू होने के बाद बारी-बारी से अन्य देशों में इसे लागू किया गया।

भारत में यह एक्ट 1956 में लागू हुआ। तब इसका नाम सीटा (सप्रेशन इममॉरल ट्रैफिक इन वूमेन एंड गर्ल्स एक्ट) था। 1986 में इस एक्ट में संशोधन हुआ और इसका नाम पीटा रखा गया। 22 मई 2006 में इस एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव बना लेकिन लोकसभा में पास नहीं हो सका।

1997 से कोई अपील ही नहीं
शासकीय अधिवक्ता राजेश्वर तिवारी का दावा है कि इस एक्ट में सजा के खिलाफ 1997 से कोई अपील ही नहीं हुई है। 1997 तक का ही रिकार्ड देखने से यह बात साफ होती है। इसलिए वह दावे से कह सकते हैं कि पीटा में शहर में इससे पहले कोई सजा नहीं हुई है। अन्य सीनियर वकील भी यही बात कह रहे हैं।

12 साल से लग रही सिर्फ तारीख
सबसे चर्चित पीटा के केस में अभी तक तारीख ही लग रही है। 28 नवंबर 2003 को अंसल अपार्टमेंट फजलगंज और बर्रा छह में छापा मारकर हाई प्रोफाइल सेक्स रैकेट पकड़ा गया था।

पुलिस ने रवींद्र सिंह, दिनेश उर्फ ज्ञानेश, गुड्डू, ललित कुमार, रोहित, मोहित, मुकेश मिश्रा और नौ युवतियों के खिलाफ अनैतिक देह व्यापार की कार्रवाई की थी। इस मुकदमे में अभी भी तारीख ही लग रही है। कई युवतियां जमानत मिलने के बाद कोर्ट में हाजिर ही नहीं हुईं।

लापरवाही और फरारी से सजा नहीं
सीनियर एडवोकेट एसपी सिंह और विजय बक्शी का कहना है कि पुलिस सेक्स रैकेट पकड़ते समय तो काफी तेजी दिखाती है। लेकिन, इसके बाद सजा दिलाने में लापरवाही बरती जाती है।


समय से गवाही न होने, सेक्स के लिए पैसे का लेनदेन साबित न होने, गवाहों के टूटने और महिला अभियुक्तों के ज्यादातर केस में जमानत के बाद से गायब होने के कारण सजा नहीं हो पाती है। अमूमन इस धंधे में महिलाएं छद्म नाम का सहारा लेती हैं। इसलिए पुलिस उन्हें फरार होने के बाद ट्रेस भी नहीं कर पाती है।


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