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Kanpur News: तीन सालों के भीतर दाल उत्पादन में मिलेगी आत्मनिर्भरता

Sat, 06 Sep 2025 02:48 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 06 Sep 2025 02:48 AM IST
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Self-sufficiency will be achieved in pulses production within three years
कानपुर। संस्थान ने अब तक दलहन की 85 प्रजातियां विकसित की हैं। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत किसानों के लिए दलहन उत्पादन को लाभकारी बनाया गया है। आने वाले तीन सालों में दाल उत्पादन में आत्मनिर्भरता मिल जाएगी। यह बातें भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईपीआर) के 33वें स्थापना दिवस समारोह में निदेशक डॉ. जीपी दीक्षित ने कहीं। उन्होंने कहा कि भारत सरकार की योजनाओं के तहत किसानों तक उन्नत बीज पहुंचाए जा रहे हैं। पिछले एक साल के दौरान 19 हजार किसानों तक संस्थान के विज्ञानी पहुंचे और उनको नवीनतम तकनीक की जानकारियां दी गईं।
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समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि व सीएसजेएमयू के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक और बिरसा कृषि विश्वविद्यालय रांची के कुलपति डॉ. सुनील चंद्र दुबे, निदेशक राष्ट्रीय शर्करा संस्थान डाॅ. सीमा परोहा ने किया। इस दौरान सीएसजेएम इनोवेशन फाउंडेशन, कानपुर और पल्सेस इन्नोवेशन हब एबीआईसी, आईआईपीआर के बीच एमओयू साइन किया गया। इसके तहत दोनों संस्थाएं दलहन नवाचार को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे। इस अवसर पर आईआईपीआर के वैज्ञानिकों की पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया। प्रगतिशील किसानों को मुख्य अतिथि ने सम्मानित भी किया।
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मुख्य अतिथि प्रो. विनय कुमार पाठक ने डेटा मैनेजमेंट स्ट्रेटेजीज और एनालिसिस पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसानों को मल्टी टास्किंग सीखनी होगी। न केवल खेती बल्कि विपणन और व्यवसाय की जानकारी रखने की आवश्यकता है। बिरसा कृषि विवि के कुलपति डाॅ. सुनील चंद्र दुबे ने दालों की महत्ता और उसमें किये जा रहे शोध पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। दलहन प्रजातियों में अनुसंधान की जरूरतों को रेखांकित किया। डाॅ. सीमा परोहा ने दालों के पोषक तत्वों पर चर्चा की।
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भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान की ओर से मूंग की प्रजाति विराट को विकसित किया है। यह कम अवधि और उच्च उपज देने वाली किस्म है जो 52-55 दिनों में पक जाती है। यह फसल चक्र को बेहतर बनाती है और पीला मोजेक वायरस जैसे रोगों के प्रति सहनशील है। इसकी अति-शीघ्र परिपक्वता और विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों में अनुकूलन क्षमता इसे धान और गेहूं की फसल के बीच उगाने के लिए उपयुक्त बनाती है। यह किस्म प्रति हेक्टेयर 8 से 10 क्विंटल तक उपज दे सकती है जो पारंपरिक किस्मों से बेहतर है। डॉ. जीपी दीक्षित ने बताया कि इसकी अनुकूलन क्षमता इसे विभिन्न फसल पैटर्न में फिट होने और विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में उगाने के योग्य बनाती है। धान-गेहूं या धान-धान वाले क्षेत्रों में, फसल की कटाई के बाद खाली रहने वाले समय में इसकी खेती की जा सकती है, जिससे किसानों को अधिक लाभ होता है।


उत्कृष्ट कार्य करने के लिए डाॅ. एमएच. कोडंडाराम को उत्कृष्ट वैज्ञानिक पुरस्कार (वरिष्ठ श्रेणी), डाॅ. सुजयानंद जीके को उत्कृष्ट वैज्ञानिक पुरस्कार (युवा श्रेणी), तकनीकी वर्ग में आरकेएस यादव, वित्त एवं लेखा अधिकारी वर्ग में कुणाल कालरा, प्रशासनिक वर्ग में मीनाक्षी वार्ष्णेय को सर्वोत्तम कार्यकर्ता अवार्ड से पुरस्कृत किया गया। डाॅ. नरेंद्र कुमार एवं टीम को शोध एवम विकास गतिविधियों के लिए उत्कृष्ट टीम अवार्ड मिला। कानपुर देहात अमरौधा ब्लॉक के श्यामकुंवर सिनर्जी एग्रो प्रोड्यूसर के निदेशक शांतनु मिश्रा को भी सम्मानित किया गया।
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