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एक थी एल्गिन! महारानी एलिजाबेथ को भी पसंद थीं यहां की तौलिया

Sat, 17 Feb 2018 03:04 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर Updated Sat, 17 Feb 2018 03:04 PM IST
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Queen Elizabeth also liked elgin mill towel
डेमो पिक
कानपुर को उत्तर भारत का मैनेचेस्टर की पहचान दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले एल्गिन मिल के बाहर अब सन्नाटा पसरा रहता है। गेट के बाहर मिल बंदी होने का नोटिस बोर्ड आज भी टंगा है। कभी इस मिल की बनी तौलिया लंदन की महारानी को खूब भाती थी। यहां का बना ज्यादातर माल लंदन एक्सपोर्ट होता था। लेकिन अब मिल एक खंडहर है। अमर उजाला ने मिल बंदी के कारणों की पड़ताल की तो कुछ तथ्य सामने आए।  
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1864 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ के पिता एडवर्ड एल्गिन के नाम पर मिल की स्थापना की गई थी। यहां बनने वाली साठिया चद्दर, तौलिया, बेड शीट, 660 नंबर चादर, जींस का कपड़ा, लंकलाट के बने कपड़ों की तूती देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी बोलती थी।
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उस दौर की यहां बनी तौलिया और चद्दर को अंग्रेज लंदन लेकर जाते थे। 15 हजार से अधिक मजदूर काम करते थे। आजादी के बाद 11 जून 1981 को मिल का भारत सरकार ने अधिग्रहण कर लिया। सरकार ने इसे बीआईसी (ब्रिटिश इंडिया कॉर्पोरेशन) की सहायक कंपनी के तौर पर स्थापित कर दिया।
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कुछ वर्षों तक उत्पादन के लिए सरकार कार्यशील पूंजी देती रही। इसके बाद चुनावी फायदा देख सरकार उत्पादन मद में सहायता न देकर केवल वेतन मद की ही धनराशि देती रही। 1982 तक यहां पर उत्पादन ठीक था। जब मिल में शिफ्ट बदली जाती थी तब मजदूरों का रेला निकलता था।

ग्रीनपार्क छोर से लेकर नवाबगंज छोर की सड़कों पर चाय, खोमचों की दुकानें सजी रहती थीं। लेकिन इसके बाद से मिल की हालत खस्ता होती चली गई। तत्कालीन चेयरमैन ने मिल चलाने के लिए 9 बैंकों से करोड़ों का लोन लिया। लेकिन मिल चल नहीं पाई। यही लोन मिल बंदी का कारण बना। 1992 को मिल को बीमार घोषित कर दिया गया। 1994 से मिल बंदी की आधिकारिक घोषणा कर दी गई। 



8 मई 2001 को अटल सरकार मिल में कर्मचारियों ने वीआरएस लेकर इस शर्त को माना कि जब मिल चलेगी तो उन्हें रोजगार दिया जाएगा। इसके बाद न तो मिल चली न रोजगार मिला। मिल चलाने के लिए करीब 15 सालों से संघर्ष कर रहे मजदूर यहां अभी प्रतिदिन धरना देते हैं।

बंदी के ये भी कारण
-मिल को कभी तकनीकी दक्ष प्रशासनिक अधिकारी चेयरमैन सरकार ने नहीं दिया।
-ऐसे चेयरमैन आए जिन्होंने बैंकों से भारी-भरकम लोन तो लिया लेकिन उसे चुका नहीं पाए
-अफसरशाही के कारण मिल के खर्च बढ़ते गए और उत्पादन कम होता गया
-मिल उत्पाद तो अच्छे बनाती रही लेकिन समय के साथ उत्पादों के बाजार नहीं मिले
-सरकारी मिल बनने के बाद भारीभरकम वेतन सरकार वहन नहीं कर सकी
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