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पद्मश्री के लिए चुनी गईं प्रो. उषा यादव, यादों में बसा मायका, साहित्य में छाई ससुराल
Tue, 26 Jan 2021 09:23 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 26 Jan 2021 09:23 AM IST
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प्रो. उषा यादव
- फोटो : अमर उजाला
पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुनी गईं कानपुर की बेटी प्रो. उषा यादव के लेखन में मायके (कानपुर) से ज्यादा ससुराल (आगरा) की छाप देखने को मिलती है। वह बताती हैं कि कानपुर के लोग, यहां की बातें और खूब सारी खट्टी-मीठी यादें उनके जेहन में रची-बसी हैं।
लेकिन, शादी के बाद ससुराल आगरा पहुंचीं तो वहां के लोग, आसपास का माहौल, संस्कृति और बोलचाल उनके साहित्य का हिस्सा बन गया। फेथफुलगंज निवासी अपने पिता वरिष्ठ बाल साहित्यकार चंद्रपाल सिंह यादव मयंक के नक्शेकदम पर चलते हुए प्रो. उषा ने बाल साहित्य से अपने लेखन की शुरुआत की।
कक्षा नौ में पढ़ाई के दौरान लिखी गई उनकी पहली कविता स्कूल की पत्रिका में भी प्रकाशित हुई थी। उम्र के साथ उनका साहित्य भी हर उम्र का हो चला। कहानी संग्रह, उपन्यास, नाटक, काव्य, आलोचना, कला एवं संस्कृति समेत अन्य विधाओं में उनकी अब तक करीब 100 पुस्तकें विभिन्न प्रकाशनों से प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके साहित्य का आधा हिस्सा बच्चों को समर्पित है। उन्हें महिलाओं और बच्चों से जुड़े विषयों पर लिखने का शौक है।
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लेकिन, शादी के बाद ससुराल आगरा पहुंचीं तो वहां के लोग, आसपास का माहौल, संस्कृति और बोलचाल उनके साहित्य का हिस्सा बन गया। फेथफुलगंज निवासी अपने पिता वरिष्ठ बाल साहित्यकार चंद्रपाल सिंह यादव मयंक के नक्शेकदम पर चलते हुए प्रो. उषा ने बाल साहित्य से अपने लेखन की शुरुआत की।
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कक्षा नौ में पढ़ाई के दौरान लिखी गई उनकी पहली कविता स्कूल की पत्रिका में भी प्रकाशित हुई थी। उम्र के साथ उनका साहित्य भी हर उम्र का हो चला। कहानी संग्रह, उपन्यास, नाटक, काव्य, आलोचना, कला एवं संस्कृति समेत अन्य विधाओं में उनकी अब तक करीब 100 पुस्तकें विभिन्न प्रकाशनों से प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके साहित्य का आधा हिस्सा बच्चों को समर्पित है। उन्हें महिलाओं और बच्चों से जुड़े विषयों पर लिखने का शौक है।
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