जहरीली शराब: यहां आबकारी की मक्कारी और 'जहर से यारी' ने ली कई जानें
आबकारी अफसरों के नकारेपन से फल-फूल रहा नकली शराब का धंधा
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कानपुर में पुलिस और एसटीएफ ने तमाम बार नकली शराब की फैक्ट्रियां और शराब में प्रयुक्त होने वाला खतरनाक रसायन (रेक्टीफायड लिकर) पकड़ा है, लेकिन आबकारी अफसरों ने कभी इन्हें पकड़ने की जहमत नहीं उठाई और न ही बड़ी रिकवरी की। और तो और पकड़ी गई फैक्ट्रियों की जांच तक करना मुनासिब नहीं समझा। आबकारी अफसरों के इसी नकारेपन की फसल है जहरीली शराब, जिसने कानपुर नगर और देहात में 12 लोगों की जान ले ली।
शराब कारोबार से जुड़े एक शख्स का कहना है कि आबकारी अफसर और कर्मचारियों का ध्यान सिर्फ कमाई में रहता है। क्षेत्रीय से लेकर जिला अफसर और उससे ऊपर तक सरकारी शराब की दुकानों व ठेकों से महीना तय है। दुकान की बिक्री के हिसाब से रकम पहुंचाई जाती है। यही वजह है कि आबकारी अफसर शराब, बीयर और देशी शराब की दुकानों में चेकिंग के नाम पर केवल औपचारिकता निभाते हैं।
अफसर दुकान व ठेके का स्टॉक और रजिस्टर का मिलान भी अपने तरीके से करते हैं। यही वजह है कि सचेंडी और रूरा के सरकारी ठेकों में नकली और गैर प्रांत की शराब बिक रही थी, लेकिन आबकारी अफसर इससे अनजान रहे। इसका खुलासा सचेंडी के दूल गांव के ठेके से मिली एक्सपायरी डेट और मिलावटी व नकली शराब की बरामदगी से हुआ है।
इसी क्षेत्र के बिनौर में महेश सिंह के ठेके से तो उत्तराखंड की शराब और एक्सपायरी डेट (मार्च 2018) की 30 पेटी माधुरी की 42 नंबर बैच की शराब बरामद हुई। इसके अलावा माधुरी शराब के रैपर, बोतल के ढक्कन व अन्य सामान भी बरामद हुआ है, जिससे साफ है कि महेश के तार नकली शराब बनाने वालों से भी जुड़े हैं। रूरा में भी सरकारी ठेके पर नकली और जहरीली शराब बरामद हुई है।