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पुण्यतिथि विशेष: ‘नीरज’! आह! आज कानपुर को याद तुम्हारी आई फिर
Mon, 20 Jul 2020 10:05 AM IST
शिखा पांडेय
शांतनु त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
शांतनु त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Mon, 20 Jul 2020 10:05 AM IST
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पद्मश्री गोपालदास नीरज
- फोटो : अमर उजाला
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‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे.....’ लिखने वाले, गीत-कविता के अमर गायक पद्मश्री गोपालदास ‘नीरज’ की रविवार को दूसरी पुण्यतिथि पर उन्हें कानपुरवासियों ने याद किया। ‘नीरज’ का कानपुर से वैसा ही रिश्ता रहा जैसे गुरु-शिष्य का। यहीं रहकर उनकी प्रतिभा को नए आयाम मिले। यही वजह थी कि उन्होंने कानपुर के नाम पाती लिखी कानपुर! आह! आज तेरी याद आई फिर....।
कानपुर में रहकर उन्होंने जीवन संघर्ष किया, जिसने गोपालदास को ‘नीरज’ और बाद में ‘पद्मश्री’ बनाने में बहुत मदद की। कानपुर के नाम पाती की ही कुछ पंक्तियां हैं, जो दर्शाती हैं कानपुर के प्रति उनका लगाव और संघर्ष की दास्तान।
‘फर्श पर तेरे ‘तिलक हाल’ के अब भी जाकर
ढीठ बचपन मेरे गीतों का खेल खेल आता है।
आज ही तेरे ‘फूलबाग’ की हर पत्ती पर
ओस बनके मेरा दर्द बरस जाता है।
करती टाइप किसी ऑफिस की किसी टेबिल पर
आज भी बैठी कहीं होगी थकावट मेरी।
खोई-खोई-सी परेशान किसी उलझन में
किसी फाइल पे झुकी होगी लिखावट मेरी।
‘कुरसवां’ की वह अंधेरी-सी हवादार गली
मेरे ‘गुंजन’ ने जहां पहली किरन देखी थी।
मेरी बदनाम जवानी के बुढ़ापे ने जहां
जिंदगी भूख के शोलों में दफन देखी थी।’
ऐसा प्रत्याशी नहीं देखा होगा, जो भ्रष्टों का वोट अस्वीकारे
वर्ष-1967 के आम चुनाव में गोपालदास ‘नीरज’ ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में कानपुर से चुनाव लड़ा। उन्होंने अपनी चुनावी सभाओं में लोगों से अपील की, ‘जो भ्रष्ट या चोर हों, वे उन्हें वोट न दें। यही बात लोगों को अपील कर गई और उन्हें बड़ी संख्या में वोट मिले।
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डीएवी में पढ़े, फिर नौकरी भी की
गोपालदास ‘नीरज’ ने कानपुर के डीएवी कॉलेज में पढ़ाई की। फिर इसी कॉलेज में नौकरी भी। नौकरी के दौरान भी वह कविताएं लिखते रहे।
नाम सुनते ही चाहने वालों ने ट्रेन में सीट कर दी खाली
कवि कमलेश द्विवेदी की पद्मश्री गोपालदास ‘नीरज’ से बहुत निकटता रही। उन्होंने बताया कि एक बार ‘नीरज’ कवि सम्मेलन में शामिल होने कानपुर आए थे। वापसी में अलीगढ़ जाना था, एसी कोच में रिजर्वेशन नहीं मिल सका, तो स्लीपर कोच का टिकट लेकर ट्रेन में बैठाने गया। ट्रेन खचाखच भरी थी। कहीं बैठने की जगह नहीं थी। जब कोच में जाकर कहा कि गोपालदास ‘नीरज’ को सफर करना है, तो लोगों ने कहा, ‘आप उन्हें ले आइए।’ शायद लोगों को यह लग रहा था कि जगह बनाने के लिए झूठ बोल रहा हूं। जैसे ही उन्हें लेकर मैं कोच में घुसा, तो कई यात्रियों ने तो उनके पैर छुए और पूरी बर्थ उनके लिए खाली कर दी। ‘नीरज’ के चाहने वाले हर उम्र के लोग रहे।
अपनी रचना सुनकर भड़के नहीं, दी दाद
‘नीरज’ के साथ कई बार मंच साझा कर चुके शिवकुमार सिंह ‘कुंवर’ ने बताया कि एक बार एनटीसी की ओर से कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। उसमें ‘नीरज’ जी भी आए थे। एक कवयित्री ने अपनी रचना पढ़ी। मैं ‘नीरज’ जी के बगल में बैठा था। उन्होंने मुझसे कहा, ‘यह तो मेरी रचना है।’ इस पर मैंने कहा, ‘मैं अभी कवयित्री से कहता हूं कि तुमने चोरी की रचना सुनाई है।’ इस पर ‘नीरज’ ने मना कर दिया और रचना सुनने के बाद कवयित्री की प्रशंसा भी की। वह बहुत विशाल हृदय थे।
सोशल मीडिया पर शब्द सुमन
कवि प्रबुद्ध तिवारी ने बताया कि उन्होंने कई मंच ‘नीरज’ के साथ साझा किए। उनकी पुण्यतिथि पर शब्द-सुमन अर्पित किए हैं। कवि-गीतकार अरुण तिवारी ने ‘आए तुम बहुत याद आए’ लिखकर फेसबुक पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। कवि मुकेश श्रीवास्तव, अंसार कम्बरी आदि ने भी उनकी याद को शब्दांजलि दी।
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कानपुर में रहकर उन्होंने जीवन संघर्ष किया, जिसने गोपालदास को ‘नीरज’ और बाद में ‘पद्मश्री’ बनाने में बहुत मदद की। कानपुर के नाम पाती की ही कुछ पंक्तियां हैं, जो दर्शाती हैं कानपुर के प्रति उनका लगाव और संघर्ष की दास्तान।
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‘फर्श पर तेरे ‘तिलक हाल’ के अब भी जाकर
ढीठ बचपन मेरे गीतों का खेल खेल आता है।
आज ही तेरे ‘फूलबाग’ की हर पत्ती पर
ओस बनके मेरा दर्द बरस जाता है।
करती टाइप किसी ऑफिस की किसी टेबिल पर
आज भी बैठी कहीं होगी थकावट मेरी।
खोई-खोई-सी परेशान किसी उलझन में
किसी फाइल पे झुकी होगी लिखावट मेरी।
‘कुरसवां’ की वह अंधेरी-सी हवादार गली
मेरे ‘गुंजन’ ने जहां पहली किरन देखी थी।
मेरी बदनाम जवानी के बुढ़ापे ने जहां
जिंदगी भूख के शोलों में दफन देखी थी।’
ऐसा प्रत्याशी नहीं देखा होगा, जो भ्रष्टों का वोट अस्वीकारे
वर्ष-1967 के आम चुनाव में गोपालदास ‘नीरज’ ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में कानपुर से चुनाव लड़ा। उन्होंने अपनी चुनावी सभाओं में लोगों से अपील की, ‘जो भ्रष्ट या चोर हों, वे उन्हें वोट न दें। यही बात लोगों को अपील कर गई और उन्हें बड़ी संख्या में वोट मिले।
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डीएवी में पढ़े, फिर नौकरी भी की
गोपालदास ‘नीरज’ ने कानपुर के डीएवी कॉलेज में पढ़ाई की। फिर इसी कॉलेज में नौकरी भी। नौकरी के दौरान भी वह कविताएं लिखते रहे।
नाम सुनते ही चाहने वालों ने ट्रेन में सीट कर दी खाली
कवि कमलेश द्विवेदी की पद्मश्री गोपालदास ‘नीरज’ से बहुत निकटता रही। उन्होंने बताया कि एक बार ‘नीरज’ कवि सम्मेलन में शामिल होने कानपुर आए थे। वापसी में अलीगढ़ जाना था, एसी कोच में रिजर्वेशन नहीं मिल सका, तो स्लीपर कोच का टिकट लेकर ट्रेन में बैठाने गया। ट्रेन खचाखच भरी थी। कहीं बैठने की जगह नहीं थी। जब कोच में जाकर कहा कि गोपालदास ‘नीरज’ को सफर करना है, तो लोगों ने कहा, ‘आप उन्हें ले आइए।’ शायद लोगों को यह लग रहा था कि जगह बनाने के लिए झूठ बोल रहा हूं। जैसे ही उन्हें लेकर मैं कोच में घुसा, तो कई यात्रियों ने तो उनके पैर छुए और पूरी बर्थ उनके लिए खाली कर दी। ‘नीरज’ के चाहने वाले हर उम्र के लोग रहे।
अपनी रचना सुनकर भड़के नहीं, दी दाद
‘नीरज’ के साथ कई बार मंच साझा कर चुके शिवकुमार सिंह ‘कुंवर’ ने बताया कि एक बार एनटीसी की ओर से कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। उसमें ‘नीरज’ जी भी आए थे। एक कवयित्री ने अपनी रचना पढ़ी। मैं ‘नीरज’ जी के बगल में बैठा था। उन्होंने मुझसे कहा, ‘यह तो मेरी रचना है।’ इस पर मैंने कहा, ‘मैं अभी कवयित्री से कहता हूं कि तुमने चोरी की रचना सुनाई है।’ इस पर ‘नीरज’ ने मना कर दिया और रचना सुनने के बाद कवयित्री की प्रशंसा भी की। वह बहुत विशाल हृदय थे।
सोशल मीडिया पर शब्द सुमन
कवि प्रबुद्ध तिवारी ने बताया कि उन्होंने कई मंच ‘नीरज’ के साथ साझा किए। उनकी पुण्यतिथि पर शब्द-सुमन अर्पित किए हैं। कवि-गीतकार अरुण तिवारी ने ‘आए तुम बहुत याद आए’ लिखकर फेसबुक पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। कवि मुकेश श्रीवास्तव, अंसार कम्बरी आदि ने भी उनकी याद को शब्दांजलि दी।