भारतीय और यूरोपियन सर्जन ने साथ मिलकर किया ‘गोल्ड नी’ का अविष्कार
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डॉ सिंह ने पत्रकारों को बताया कि मल्टी रेडियल टाईबेनियम युक्त गोल्ड नी में यूनी-एक्सियल विटामिन-ई भी मिलाया गया है। विटामिन-ई अच्छा एंटी ऑक्सीडेंट (दवाओं का दुष्प्रभाव कम करने वाला) है। इसकी वजह से कृत्रिम घुटने खराब नहीं होते। गोल्ड नी इंप्लांट आसानी से 30-35 साल तक चलता है और सही जीवनशैली अपनाकर डॉक्टरों के परामर्श से चला जाए तो जीवन भर भी काम कर सकता है। अमेरिका में 20 साल से इस तकनीक से ऑपरेशन हो रहे हैं और आज तक वहां एक भी केस खराब नहीं हुआ। इस तकनीक से घुटना बदलने के बाद 90 किलो वजन का मरीज भी रोज 10 किलोमीटर तक पैदल चल सकता है। लागत में भी कोई खास फर्क नहीं है। जीरो एरर तकनीक से घुटने की नसें-लिगामेंट नहीं कटते, इससे पैर कमजोर होने जैसी आशंका बिल्कुल खत्म हो जाती है। डॉ.मार्टिन ने बताया कि भारतीयों के हिसाब से यह कृत्रिम घुटना सबसे ज्यादा मुफीद है। कंप्यूटर चिप इंटीग्रेटेड उपकरणों से ऑपरेशन होता है। बिल्कुल प्राकृतिक रूप से काम करता है। यह विशेषरूप से भारतीयों के लिए ही डिजायन किया गया है क्योंकि यहां पर जीवनशैली यूरोपियन देशों की तुलना में बिल्कुल अलग है।
हड्डियों को स्वस्थ रखने के तरीके
लाइफ स्टाइल में सुधार करें, फास्ट फूड से दूर रहें, पौष्टिक भोजन करें, भोजन संपूर्ण हो यानी शाकाहारी हों तो दाल, रोटी, हरी सब्जी, सलाद, मौसमी फल, दूध, पनीर, ड्राई फ्रूट्स सबकी पर्याप्त मात्रा जरूर लें। ऐसा नहीं कि एक दिन दाल खा ली और दूसरे दिन सब्जी। थाली में थोड़ी-थोड़ी मात्रा सबकी होनी चाहिए। इसी तरह नानवेज खाने वाले भी डाइट पर ध्यान दें और तेल, मसाला, प्रिजरवेटिव से बने खाद्य पदार्थ से हमेशा बचें। खास सलाह यह कि हड्डी के रोगी अपने रोग के अनुसार विशेषज्ञ डॉक्टर से डाइट चार्ट जरूर बनवाएं और सख्ती से पालन करें। इसके साथ नियमित व्यायाम भी दवा जितना ही जरूरी है। बिना व्यायाम रोग पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता।