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चुनावी रण: अखिलेश या धर्मेंद्र, इत्रनगरी में सपा ने बढ़ाया सियासी सस्पेंस, पार्टी के इस दांव ने चौंकाया
Thu, 22 Feb 2024 04:57 PM IST
शिखा पांडेय
तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज
तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज
Published by: शिखा पांडेय
Updated Thu, 22 Feb 2024 04:57 PM IST
सार
Lok Sabha Elections: सपा से जुड़ी जानकारी रखने वालों का कहना है कि पार्टी प्रमुख ने अभी यहां का पत्ता सोची समझी रणनीति के तहत नहीं खोला है। ज्यादातर का मानना है कि बदायूं के बदले हालात की वजह कर धर्मेंद्र यादव को आजमगढ़ और कन्नौज में से किसी एक सीट से लड़ाया जाएगा।
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अखिलेश यादव व धर्मेंद्र यादव
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
समाजवादी पार्टी की ओर से बदायूं से पूर्व सांसद धर्मेंद यादव को हटाकर आजमगढ़ के साथ-साथ कन्नौज लोकसभा का प्रभारी बनाया गया है। सपा के इस दांव को कार्यकर्ताओं के साथ ही विपक्षी पार्टियों के नेता भी समझ नहीं पा रहे हैं। चूंकि खुद यहां से पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के ही चुनाव लड़ने की संभावना जताई जाती रही है, ऐसे में धर्मेंद्र यादव को प्रभारी बनाने को लेकर सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।
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अपने असिस्तव के बाद से ही लगातार दो दशक से भी ज्यादा समय तक इत्रनगरी को अपना सियासी गढ़ बना चुकी सपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में इसे गवा दिया था। ऐसे में अपने इस किले को फिर से हासिल करने के लिए सपा की ओर से बदली हुई रणनीति के तहत कदम उठाया जा रहा है। चूंकि यहां से दो बार सांसद रहने के बाद पिछला चुनाव हार चुकीं डिंपल यादव को मैनपुरी शिफ्ट कर दिया गया है। उनकी जगह पर यहां फिर से सपा मुखिया अखिलेश यादव के ही ताल ठोकने की चर्चा रही है। खुद अखिलेश भी यहां कई कार्यक्रम में इसका इशारा दे चुके हैं। उनके चुनाव लड़ने की चर्चा से ही यहां पार्टी कार्यकर्ता उत्साहित हैं।
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पार्टी पिछले चुनाव में मिली कसक को भूलकर नए सिरे से कामयाबी का जतन करने में जुटी है। इसी बीच बदायूं के बदले हालात के तहत वहां पूर्व कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव को टिकट देने और पूर्व घोषित प्रत्याशी धर्मेंद्र यादव को वहां से हटाकर आजमगढ़ के साथ ही कन्नौज लोकसभा क्षेत्र का प्रभारी बनाने से सियासी मायने निकाले जाने लगे हैं। सपा से जुड़ी जानकारी रखने वालों का कहना है कि पार्टी प्रमुख ने अभी यहां का पत्ता सोची समझी रणनीति के तहत नहीं खोला है। ज्यादातर का मानना है कि बदायूं के बदले हालात की वजह कर धर्मेंद्र यादव को आजमगढ़ और कन्नौज में से किसी एक सीट से लड़ाया जाएगा। आखिरी समय में उन्हें इन दोनों में से किसी एक सीट पर शिफ्ट किया जाएगा, इस पर कार्यकर्ताओं की निगाह है। सपा के जिलाध्यक्ष कलीम खां कहते हैं कि पार्टी जिसे टिकट देगी, उसे यहां से दमदारी से चुनाव लड़ाकर जिताया जाएगा। सभी कार्यकर्ता पार्टी के फैसले के साथ हैं।
...तो सपा से कन्नौज के छठे उम्मीदवार होंगे धर्मेंद यादव
अगर सपा ने धर्मेंद्र यादव को ही कन्नौज से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो वह इस सीट से पार्टी के छठे चेहरा होंगे। अब तक इस सीट से सपा के टिकट पर पांच नेताओं ने चुनाव लड़ा है। उनमें से चार को कायमाबी मिली है। अपने गठन के बाद इस सीट पर सपा के चुनाव निशान पर 1996 के चुनाव में सबसे पहले प्रत्याशी पूर्व सांसद छोटेलाल यादव थे। इस चुनाव में सपा को कामयाबी नहीं मिली थी। अगले चुनाव 1998 में यहां सैफई परिवार से प्रदीप यादव को प्रत्याशी बनाया गया। उनकी जीत से पार्टी ने यहां पहली बार कामयाबी हासिल की। 1999 के लोकसभा चुनाव में पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव सांसद बने। उनके इस्तीफा देने के बाद सन् 2000 में हुए उपचुनाव में यहां से पहली बार अखिलेश यादव सांसद चुने गए। उन्होंने 2004 और 2009 का चुनाव भी जीता। वर्ष 2012 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सीट छोड़ी तो पहली बार डिंपल यादव उसी वर्ष हुए उपचुनाव में निर्विरोध चुनाव जीतीं। वर्ष 2014 में भी उन्हें जीत मिली, लेकिन वर्ष 2019 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब वर्ष 2024 में अगर धर्मेंद्र यावद उम्मीदवार होंगे तो वह इस सीट से पार्टी के छठे उम्मीदवार होंगे।
अगर सपा ने धर्मेंद्र यादव को ही कन्नौज से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो वह इस सीट से पार्टी के छठे चेहरा होंगे। अब तक इस सीट से सपा के टिकट पर पांच नेताओं ने चुनाव लड़ा है। उनमें से चार को कायमाबी मिली है। अपने गठन के बाद इस सीट पर सपा के चुनाव निशान पर 1996 के चुनाव में सबसे पहले प्रत्याशी पूर्व सांसद छोटेलाल यादव थे। इस चुनाव में सपा को कामयाबी नहीं मिली थी। अगले चुनाव 1998 में यहां सैफई परिवार से प्रदीप यादव को प्रत्याशी बनाया गया। उनकी जीत से पार्टी ने यहां पहली बार कामयाबी हासिल की। 1999 के लोकसभा चुनाव में पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव सांसद बने। उनके इस्तीफा देने के बाद सन् 2000 में हुए उपचुनाव में यहां से पहली बार अखिलेश यादव सांसद चुने गए। उन्होंने 2004 और 2009 का चुनाव भी जीता। वर्ष 2012 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सीट छोड़ी तो पहली बार डिंपल यादव उसी वर्ष हुए उपचुनाव में निर्विरोध चुनाव जीतीं। वर्ष 2014 में भी उन्हें जीत मिली, लेकिन वर्ष 2019 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब वर्ष 2024 में अगर धर्मेंद्र यावद उम्मीदवार होंगे तो वह इस सीट से पार्टी के छठे उम्मीदवार होंगे।