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कानपुर: झोलाछाप ने बच्चेदानी की सफाई में आंत फाड़ी, मरते-मरते बची महिला, ओवर डोज से 15 दिन रही बेहोश
Fri, 22 Oct 2021 01:48 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Fri, 22 Oct 2021 01:48 AM IST
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हैलट अस्पताल
- फोटो : amar ujala
कानपुर के एक निजी अस्पताल के झोलाछाप ने एक महिला की बच्चेदानी की सफाई के दौरान उसकी आंत ही फाड़ दी। हालत बिगड़ी तो दूसरे निजी अस्पताल भेज दिया। आंत फटने की वजह से पाखाने का रास्ता पेट से बनाने के लिए इस अस्पताल में रोगी को इतना एनेस्थीसिया दिया गया कि उसे 15 दिन होश ही नहीं आया।
रोगी के मरने की नौबत आने पर हैलट भेज दिया। यहां सर्जरी व एनेस्थीसिया विभाग के विशेषज्ञों ने बड़ी मशक्कत से रोगी की जान बचाई। गुरुवार को उसे डिस्चार्ज कर दिया गया। गोपाल नगर नौबस्ता के रहने वाले अंकुर की पत्नी लक्ष्मी (30) को बच्चेदानी की सफाई के लिए निजी अस्पताल में भर्ती किया गया।
झोलाछाप की गलती की वजह से वह मौत के मुंह में पहुंच गई। 14 सितंबर को जब हैलट में भर्ती किया गया तो उसके पूरे जिस्म में संक्रमण फैल गया था। फेफड़े निमोनिया की वजह से सफेद पड़ गए और गुर्दों ने काम करना बंद कर दिया। उसे डॉ. निशांत सक्सेना के अंडर में भर्ती किया गया। इसके बाद एनेस्थीसिया विभाग के आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया।
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डॉ. ऋतुराज सिंह, डॉ. योगेंद्र और डॉ. नेहा की टीम रोगी का इलाज करती रही। रोगी 28 दिन वेंटिलेटर पर रही। उसकी डायलिसिस की गई और ब्रोंकोस्कोपी से फेफड़ों से पानी निकाला गया। जीएसवीएम मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने बताया कि डॉक्टरों की मेहनत से रोगी की जान बच गई।
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रोगी के मरने की नौबत आने पर हैलट भेज दिया। यहां सर्जरी व एनेस्थीसिया विभाग के विशेषज्ञों ने बड़ी मशक्कत से रोगी की जान बचाई। गुरुवार को उसे डिस्चार्ज कर दिया गया। गोपाल नगर नौबस्ता के रहने वाले अंकुर की पत्नी लक्ष्मी (30) को बच्चेदानी की सफाई के लिए निजी अस्पताल में भर्ती किया गया।
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झोलाछाप की गलती की वजह से वह मौत के मुंह में पहुंच गई। 14 सितंबर को जब हैलट में भर्ती किया गया तो उसके पूरे जिस्म में संक्रमण फैल गया था। फेफड़े निमोनिया की वजह से सफेद पड़ गए और गुर्दों ने काम करना बंद कर दिया। उसे डॉ. निशांत सक्सेना के अंडर में भर्ती किया गया। इसके बाद एनेस्थीसिया विभाग के आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया।
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डॉ. ऋतुराज सिंह, डॉ. योगेंद्र और डॉ. नेहा की टीम रोगी का इलाज करती रही। रोगी 28 दिन वेंटिलेटर पर रही। उसकी डायलिसिस की गई और ब्रोंकोस्कोपी से फेफड़ों से पानी निकाला गया। जीएसवीएम मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने बताया कि डॉक्टरों की मेहनत से रोगी की जान बच गई।