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kanpur dehat : गांवों में आशा व एएनएम तैनात फिर भी जून में दाइयों ने घरों में करा डाले 221 प्रसव
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कानपुर देहात। मातृ-शिशु मृत्युदर कम करने के लिए सरकार की प्राथमिकता संस्थागत प्रसव पर है। इसके लिए गांव-गांव हेल्थ वेलनेस सेंटर से लेकर पीएचसी तक संचालित की जा रही हैं। वहीं, आशा, आंगनबाड़ी व एएनएम तक को ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय कर गर्भवती के स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही है।
इन सब के बावजूद ग्रामीण इलाकों में अभी भी दाइयों के हाथों प्रसव कराए जा रहे हैं। जनपद में जून में 221 प्रसव दाइयों के माध्यम से घरों में कराए गए हैं। यह खुलासा स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में ही हुआ है।
गरीबों को निशुल्क प्रसव की व्यवस्था के लिए सरकार की ओर से हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। सरकार ने आशाओं और एएनएम को गांव-गांव तैनात किया गया है।
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इन पर गर्भवती के स्वास्थ्य पर नजर रखने के साथ ही उन्हें सरकारी योजना का लाभ दिलवाने व सुरक्षित प्रसव कराने की जिम्मेदारी है। इसके लिए सरकार उन्हें मानदेय भी भुगतान करती।
इन सब के बाद भी जनपद के हालात यह हैं कि स्वास्थ्य विभाग की जून में तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार 221 बच्चों का जन्म घर में दाइयों के माध्यम से हुआ है। इस वजह से उन्हें न तो सरकार की योजना का लाभ मिला और न ही बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल पाई।
घर पर प्रसव के मामले में मैथा ब्लॉक की एएनएम और आशा सबसे ज्यादा लापरवाह हैं। जून में मैथा ब्लॉक में सबसे ज्यादा 44 प्रसव घर में हुए हैं। जबकि सरवनखेड़ा में दाइयों ने 42 प्रसव घरों में कराए हैं। इससे साफ है कि गांवों में आशा व एएनएम कितनी सक्रिय हैं।
घर में प्रसाव के दौरान कई बार प्रसूता या नवजात की हालत बिगड़ने का खतरा बना रहता है। तबीयत बिगड़ने पर इन प्रसूता या नवजात को स्वास्थ्य केंद्र ले जाया जाता है। इस पर चिकित्सा चुनौती से डॉक्टर जूझते हैं।
गांव में गर्भवतियों की सूची आशा के पास होती है। उन्हें गर्भवती व परिजनों से समन्वय बनाना होता है। आशा इसमें लापरवाही करतीं हैं। घरों में प्रसव जिन क्षेत्रों में ज्यादा हो रहे हैं, वहां की आशा कार्यकर्ता को निर्देशित किया जाएगा कि संस्थागत प्रसव के लिए परिजनों को जागरूक करें। - डॉ. एके सिंह, सीएमओ।
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इन सब के बावजूद ग्रामीण इलाकों में अभी भी दाइयों के हाथों प्रसव कराए जा रहे हैं। जनपद में जून में 221 प्रसव दाइयों के माध्यम से घरों में कराए गए हैं। यह खुलासा स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में ही हुआ है।
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गरीबों को निशुल्क प्रसव की व्यवस्था के लिए सरकार की ओर से हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। सरकार ने आशाओं और एएनएम को गांव-गांव तैनात किया गया है।
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इन पर गर्भवती के स्वास्थ्य पर नजर रखने के साथ ही उन्हें सरकारी योजना का लाभ दिलवाने व सुरक्षित प्रसव कराने की जिम्मेदारी है। इसके लिए सरकार उन्हें मानदेय भी भुगतान करती।
इन सब के बाद भी जनपद के हालात यह हैं कि स्वास्थ्य विभाग की जून में तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार 221 बच्चों का जन्म घर में दाइयों के माध्यम से हुआ है। इस वजह से उन्हें न तो सरकार की योजना का लाभ मिला और न ही बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल पाई।
घर पर प्रसव के मामले में मैथा ब्लॉक की एएनएम और आशा सबसे ज्यादा लापरवाह हैं। जून में मैथा ब्लॉक में सबसे ज्यादा 44 प्रसव घर में हुए हैं। जबकि सरवनखेड़ा में दाइयों ने 42 प्रसव घरों में कराए हैं। इससे साफ है कि गांवों में आशा व एएनएम कितनी सक्रिय हैं।
घर में प्रसाव के दौरान कई बार प्रसूता या नवजात की हालत बिगड़ने का खतरा बना रहता है। तबीयत बिगड़ने पर इन प्रसूता या नवजात को स्वास्थ्य केंद्र ले जाया जाता है। इस पर चिकित्सा चुनौती से डॉक्टर जूझते हैं।
गांव में गर्भवतियों की सूची आशा के पास होती है। उन्हें गर्भवती व परिजनों से समन्वय बनाना होता है। आशा इसमें लापरवाही करतीं हैं। घरों में प्रसव जिन क्षेत्रों में ज्यादा हो रहे हैं, वहां की आशा कार्यकर्ता को निर्देशित किया जाएगा कि संस्थागत प्रसव के लिए परिजनों को जागरूक करें। - डॉ. एके सिंह, सीएमओ।