खाकी का मान: कानपुर के सिपाही आशीष शुक्ला ने ड्यूटी के साथ रचा इतिहास, UP PCS में 41वीं रैंक पाकर बने अफसर
Kanpur News: अमेठी के एक छोटे से गांव से निकलकर खाकी वर्दी पहनने वाले आशीष शुक्ला ने साबित किया कि अगर इरादे फौलादी हों, तो 24 घंटे की ड्यूटी भी सपनों के आड़े नहीं आती।
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कहते हैं कि "मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।" इस कहावत को सच कर दिखाया है उत्तर प्रदेश पुलिस के एक जांबाज सिपाही आशीष शुक्ला ने। कानपुर पुलिस कमिश्नरेट में तैनात आरक्षी आशीष शुक्ला ने वह मुकाम हासिल किया है, जो लाखों युवाओं का सपना होता है। उन्होंने अपनी कठिन ड्यूटी और कानून व्यवस्था को संभालने की जिम्मेदारी के बीच समय निकालकर न सिर्फ पढ़ाई की, बल्कि देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक UPPSC में 41वीं रैंक हासिल कर सबको चौंका दिया है। अब आशीष शुक्ला कमर्शियल टैक्स ऑफिसर के रूप में अपनी सेवाएं देंगे।
मिठाई बांटकर साझा की सफलता की मिठास
जैसे ही परीक्षा के परिणाम घोषित हुए और आशीष का नाम चयनित अभ्यर्थियों की सूची में 41वें स्थान पर चमका, कानपुर पुलिस महकमे में खुशी की लहर दौड़ गई। अपनी इस ऐतिहासिक सफलता के बाद आशीष ने सबसे पहले अपने साथी पुलिसकर्मियों और अधिकारियों का मुंह मीठा कराया। कानपुर पुलिस कमिश्नरेट में तैनात अन्य सिपाहियों और अधिकारियों ने आशीष को कंधों पर उठा लिया। आशीष का कहना है कि यह सफलता केवल उनकी नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की है जिन्होंने उन्हें हर कदम पर प्रोत्साहित किया।
अमेठी के शुक्ल बाजार से शुरू हुआ सफर
आशीष शुक्ला मूल रूप से उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के एक छोटे से कस्बे शुक्ल बाजार के रहने वाले हैं। एक साधारण परिवार में जन्मे आशीष की शुरुआती शिक्षा ग्रामीण परिवेश में हुई। उनकी मेधा को देखते हुए उनका चयन जवाहर नवोदय विद्यालय, अमेठी में हुआ, जहाँ से उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। नवोदय विद्यालय के अनुशासित वातावरण ने ही उनमें बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का जज्बा पैदा किया।
पिता का साया उठा, पर मां बनीं ढाल
आशीष के जीवन का सफर इतना आसान नहीं था। उनके पिता लखनऊ यूनिवर्सिटी के एक विद्वान (Scholar) थे। आशीष हमेशा से अपने पिता को अपनी प्रेरणा मानते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। पिता के आकस्मिक निधन ने परिवार पर दुखों का पहाड़ तोड़ दिया। ऐसे कठिन समय में आशीष की मां ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने न केवल घर संभाला, बल्कि आशीष के भीतर अधिकारी बनने की जो लौ पिता ने जलाई थी, उसे बुझने नहीं दिया। आशीष अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय अपनी मां के त्याग और उनके अटूट विश्वास को देते हैं।
2018 में पहनी थी सिपाही की वर्दी
आशीष की कर्मठता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने साल 2018 में उत्तर प्रदेश पुलिस की भर्ती परीक्षा पास की थी। बतौर आरक्षी ज्वाइन करने के बाद उनकी तैनाती कानपुर में हुई। एक सिपाही की नौकरी में ड्यूटी के घंटे तय नहीं होते। कभी वीआईपी मूवमेंट, कभी त्यौहारों की ड्यूटी तो कभी रात की गश्त। इन सबके बीच किसी के लिए भी पढ़ाई के लिए समय निकालना नामुमकिन सा लगता है, लेकिन आशीष ने अपनी किताबों से नाता नहीं तोड़ा। वे ड्यूटी से थके-हारे आने के बाद भी देर रात तक पढ़ाई करते थे।
पुलिस अधिकारियों का मिला भरपूर सहयोग
अक्सर माना जाता है कि पुलिस की नौकरी में उच्च शिक्षा के लिए समय मिलना मुश्किल है, लेकिन आशीष के मामले में कानपुर के वरिष्ठ अधिकारियों ने मिसाल पेश की। आशीष ने अपनी सफलता के बाद डीसीपी एस एम कासिम आबिदी, एडीसीपी सुमित रामटेके और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों का विशेष आभार व्यक्त किया। आशीष का कहना है कि जब उनके अधिकारियों को पता चला कि उनके बीच का एक सिपाही यूपीएससी की तैयारी कर रहा है, तो उन्होंने उसे न केवल प्रोत्साहित किया बल्कि पढ़ाई के लिए आवश्यक सहयोग और मार्गदर्शन भी दिया।
41वीं रैंक और नया दायित्व
वर्ष 2024 के परीक्षा परिणामों में आशीष शुक्ला ने अपनी मेहनत का लोहा मनवाया। 41वीं रैंक हासिल करना उनकी शैक्षणिक योग्यता और प्रशासनिक समझ का प्रमाण है। अब वे कमर्शियल टैक्स ऑफिसर के पद पर तैनात होकर प्रदेश की राजस्व व्यवस्था को मजबूती देंगे। एक सिपाही से लेकर एक राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) बनने तक का यह सफर उत्तर प्रदेश पुलिस के हजारों जवानों के लिए एक नई प्रेरणा बन गया है।