UP: दम तोड़ रहा है घी का कारोबार, नहीं मिल रहा ओडीओपी का ऑक्सीजन, कारोबारी बोले- अब सिकुड़ गया काम
Auraiya News: ओडीओपी में आने के बाद देशी घी का कारोबार ऊंचाइयों तक पहुंचने की उम्मीद बंधी, लेकिन प्रचार-प्रसार की कमी और सरकारी कार्यालय व बैंक के बीच तालमेल की कमी ने लोगों को इससे और दूर कर दिया।
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कभी गांव-गांव भट्ठी पर तैयार होने वाले देशी घी का कारोबार अब दम तोड़ता जा रहा है। तीन से चार दशक पहले तक यहां कुटीर उद्योग के तौर पर बनने वाला घी अब सिर्फ कुछ लोगों तक सीमित हो गया है। सरकार ने इसे एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) में तो शामिल करवा दिया, लेकिन स्थानीय अर्थव्यवस्था को इससे मजबूती नहीं मिली।
आजादी के पहले और उसके बाद भी रसोई की शान रही औरैया के घी की खुशबू बदलते वक्त के साथ कम पड़ती गई। शुद्ध घी बनाने की लागत बढ़ी तो कारोबार सिमट गया। पहले पशुपालन पर निर्भर रहने वाले लोग दूध की खपत नहीं होने पर उससे घी बनाते थे। गांव-गांव भट्ठियों पर घी बनाने का काम होता था। बदलते वक्त के साथ पशुपालन का काम भी सिमटा और घी बनाने का काम भी कम होता गया।
दूध कंपनियों की पहुंच गांव तक बढ़ी तो पशुपालकों ने मुनाफा कमाने के लिए दूध को डेयरियों तक पहुंचाना शुरू कर दिया। इससे भी घी बनाने का दायरा सिमटता गया। नतीजा यह कि पिछले करीब दो दशक में यहां यह काम दम तोड़ने की कगार पर पहुंच गया है। ऐसे में सात साल पहले शासन ने जिले के इस पुराने और प्रसिद्ध कारोबार को ओडीओपी योजना के माध्यम से फिर से पूर्व की स्थिति में लाने का प्रयास शुरू किया।
ओडीओपी भी नहीं दे सकी है संजीवनी
ओडीओपी में आने के बाद देशी घी का कारोबार ऊंचाइयों तक पहुंचने की उम्मीद बंधी, लेकिन प्रचार-प्रसार की कमी और सरकारी कार्यालय व बैंक के बीच तालमेल की कमी ने लोगों को इससे और दूर कर दिया। लिहाजा ओडीओपी भी इस दम तोड़ते कारोबार को संजीवनी नहीं दे सकी है। फिर भी सरकारी महकमा ट्रेनिंग कराकर ही अपनी पीठ थपथपाकर रहा है।
ब्रांडेड उत्पाद ने खत्म किया लोकल कारोबार
शहर के प्रसिद्ध घी कारोबारी अनूप गुप्ता बताते हैं कि ब्रांडेड घी ने यहां के लोकल उत्पाद को नुकसान पहुंचाया है। पहले यहां शहर में जगह-जगह छोटी-बड़ी मंडियां सजती थीं। रोजाना दो से तीन टन घी की बिक्री होती थी। अब मंडी खत्म हो गईं हैं। छोटे कारोबारियों ने भी काम बंद कर दिया है। चुनिंदा लोग ही अपने इस पुश्तैनी कारोबार को किसी तरह आगे बढ़ा रहे हैं। वह बताते हैं कि ओडीओपी के तहत औरैया के घी को शामिल करने पर यहां इस कारोबार से जुड़े लोगों को उम्मीद थी कि सरकारी मदद मिलने से इस कारोबार में नई जान आ सकेगी। सात साल बाद भी योजना के नाम पर हाथ खाली हैं।
एक नजर में घी का कारोबार
- दो दशक पहले तक रोजाना 30 से 35 क्विंटल घी की होती थी बिक्री।
- अब एक दिन में बमुश्किल 100 किलो ही घी बेच पा रहे हैं पुराने कारोबारी।
- ग्रामीण क्षेत्र में एक हजार से ज्यादा भट्ठियों पर तैयार होता था घी।
- शहर में अलग-अलग लगती थी मंडी, 50 से ज्यादा थीं घी की दुकानें।
- अब मंडियां खत्म हो गईं, आधा दर्जन दुकानों तक ही सिमटा कारोबार।
गांव-गांव बनता था घी
देशी घी के अपने पुश्तैनी कारोबार से जुड़े मनोज गुप्ता बताते हैं कि बदलते वक्त के साथ देशी घी का स्थानीय कारोबार सिमटा है। तीन से चार दशक पहले तक औरैया में घी बनाने का काम गांव-गांव होता था। पिछड़ा क्षेत्र होने के कारण पशुपाल करने वाले लोग दूध से घी तैयार करते थे। वह उसे यहां शहर में लगने वाली मंडी तक लाते थे। फिर उसे आसपास के शहरों में बेचा जाता था। ग्राहकों का मिजाज बदला है। वह लोकल उत्पाद के बजाए पैकिंग वाले घी को तरजीह दे रहे हैं। कारोबार सिमटा तो भट्ठियां बंद होने लगीं। ओडीओपी से मदद लेने की काफी कोशिश की, लेकिन विभाग और बैंक के बीच भागदौड़ करने के बाद भी कामयाबी नहीं मिली। अपनी ही पूंजी से कारोबार हो रहा है। बाजार उपलब्ध करवाने के लिए भी सरकारी तंत्र काम नहीं आ रहा है।
ट्रेनिंग तक सिमटी योजना, कारोबार को नहीं मिल रहा बाजार
ओडीओपी के तहत घी बनाने और बेचने के काम को तेजी देने के लिए जिला उद्योग प्रोत्साहन एवं उद्यमिता विकास केंद्र की ओर से समय-समय पर पात्र अभ्यर्थियों का चयन करके उन्हें ट्रेनिंग दिलवाई जा रही है। पिछले सात साल में अब तक एक हजार से ज्यादा अभ्यर्थियों को ट्रेनिंग दी जा चुकी है। उनमें से इच्छुक लोगों को लोन भी मिला है। बावजूद इसके योजना को कामयाबी का पंख नहीं लग सका है।
एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत औरैया जिले के घी को शामिल किया है। सरकार की ओर से तय नियम के तहत विभाग काम कर रहा है। पात्रों को चिन्हित कर उन्हें एक्सपर्ट से ट्रेनिंग दिलवाई जा रही है। बैंक से लोन दिलवाने का भी प्रावधान है। कइयों ने लिया भी है। कारोबार को बाजार तक पहुंचाने के लिए प्रयास किया जा रहा है। -दुर्गेश कुमार, उपायुक्त उद्योग, कन्नौज