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रानी विक्टोरिया के घर गए हैं इस ठठेरा बस्ती के बर्तन
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Mon, 13 Feb 2017 02:00 PM IST
सार
सरकारों की अनदेखी से लगा ‘जोर का झटका’
बुंदेलखंड के ठठेरे फीकी कर देते मुरादाबाद की चमक
ठठेरों के बनाए बर्तनों पर फिदा हुईं थीं महारानी विक्टोरिया
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ठठराही में पीतल बर्तन की मरम्मत करता सुरेश ठठेर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ठठेरों की बसाई बस्ती ठठराही तो है पर ठन-ठन की आवाज नहीं। गिनेचुने ठठेरे ही पुश्तैनी कारोबार को जिंदा किए हैं। हर राजनीतिज्ञ दल को वोट दे चुके ठठेरे अनदेखी का शिकार हो गए। कभी उनके हाथों बनाए पीतल-तांबा के बर्तनोें की इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की आंखें में चकाचौंध थीं, लेकिन अब कोई पुरसाहाल नहीं है। सरकारें ध्यान देतीं तो ठठराही के ठठेरे बर्तनों की सबसे बड़ी मंडी मुरादाबाद की चमक फीकी कर देते।
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रात-दिन ठठेरों की ठन-ठन गूंजती थी यहां
डेमो
पीतल और तांबा के बर्तन बनाने वालों ने शहर के मध्य स्थित ठठराही (झंडा चौराहा) आबाद की थी। यहां रात-दिन ठठेरों की ठन-ठन गूंजती थी। आकर्षक बर्तनों को स्वरूप देने के लिए उनके हाथों चल रहे हथौडे़ आसपास का सन्नाटा तोड़ते रहते थे। लगभग आधा सैकड़ा ठठेरे यहां रातदिन बर्तन के कारोबार से जीविका चला रहे थे। और भी तमाम परिवारों को रोजगार मिला हुआ था। अच्छी खासी आमदनी का जरिया था। कुछ ठठेर तो धन्नासेठ तक कहे जाते थे। इस कारोबार से जुडे़ बुजुर्ग भगवानदास बताते हैं कि देश की आजादी के पहले टूंढे़ चौधरी और गढ़ू दुर्गा प्रसाद ने बर्तन बनाने का काम शुरू किया था। कारोबार खूब पनपा तो बाद में आसपास के क्षेत्रों से लगभग आधा सैकड़ा ठठेरे जाति के लोग यहां आकर बस गए और इसी कारोबार में रम गए।
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महारानी विक्टोरिया के महल में भी पहुंचे इन भारतीय ठठेरों के हाथ के बर्तन
डेमो
यहां के ठठेरों के हाथों बनाए गए बर्तन फतेहपुर, कानपुर, इलाहाबाद, रायबरेली और मध्य प्रदेश के पन्ना, सतना व छतरपुर समेत दिल्ली, मद्रास, कोलकाता तक जाते थे। बिना मशीनों के तैयार किए गए इन बर्तनों की रौनक और चमक ऐसी थी कि इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के महल में भी यह बर्तन पहुंच गए थे। टूंढे़ चौधरी और गढ़ू दुर्गा प्रसाद के हाथों बनी पीतल और तांबे की सुराही और नक्काशीदार गिलास यहां से अंग्रेज ले गए थे। यह महारानी विक्टोरिया को बहुत पसंद आए थे। उन्होंने दोनों ठठेरों को ईनाम भी दिया था।
अंग्रेजी शासन में काम को मिलता था काफी प्रोत्साहन
डेमो
सुरेश ठठेर ने बताया कि अंग्रेजी शासन में इस काम को काफी प्रोत्साहन मिला। ठठेरों की हर समस्या का समाधान होता था। लेकिन अब जनप्रतिनिधियों और नेताओं के नजरें फेर लेने से यह कारोबार मंद पड़ गया। स्टील और अन्य धातुओं के बर्तनों की मंाग बढ़ने से भी इस धंधे को ‘जोर का झटका’ लगा। अब हालत यह है कि ठठराही में सिर्फ तीन लोग ही कारोबार जिंदा किए हैं। इनमें वह खुद और बिहारीलाल व रमेश ठठेर शामिल हैं। दो बर्तन बनाने वाले कारोबारी प्यालों व बबलू खुटला में बस गए। अन्य कई ने इस धंधे को छोड़कर दूसरा काम शुरू कर दिया। उन्हें मलाल है कि इस कारोबार पर सरकारें या जनप्रतिनिधि ध्यान देते तो बुंदेलखंड के ठठेरे मुरादाबाद जैसी मंडी को पीछे छोड़ देते।
हुनर सीखने को लगती थी भीड़, अब दिलचस्पी नहीं
डेमो
हुनर सीखने को लगती थी भीड़, अब दिलचस्पी नहीं
ठठराही में जब बर्तन बनाने का काम शुरू होता था तो लोगों को इस रास्ते से गुजरते वक्त अपने कान बंद करना पड़ते थे’। यह कहना है ठठेर सुरेश व बिहारीलाल का। ठठेरों ने बताया कि 80 साल से उनके यहां यह पुश्तैनी काम हो रहा है। पहले बर्तन बनाने का हुनर सीखने के लिए मजदूरों की भीड़ रहती थी, लेकिन अब इसमें किसी को दिलचस्पी नहीं है। मजदूर भी नहीं मिलते। बर्तन बनाने में कड़ी मेहनत लगती है। धधकती भट्ठी में काम करना पड़ता है। बहुत डस्ट उड़ती है। इसलिए मजदूरों को यह काम पसंद नहीं है। मजबूरी में वह और उनका परिवार मिलकर बर्तन तैयार करते हैं। प्रतिदिन 500 रुपये तक कमाई हो जाती है। दुकानदारों से प्राप्त पुराने बर्तनों को दुरुस्त करते हैं।
ठठराही में जब बर्तन बनाने का काम शुरू होता था तो लोगों को इस रास्ते से गुजरते वक्त अपने कान बंद करना पड़ते थे’। यह कहना है ठठेर सुरेश व बिहारीलाल का। ठठेरों ने बताया कि 80 साल से उनके यहां यह पुश्तैनी काम हो रहा है। पहले बर्तन बनाने का हुनर सीखने के लिए मजदूरों की भीड़ रहती थी, लेकिन अब इसमें किसी को दिलचस्पी नहीं है। मजदूर भी नहीं मिलते। बर्तन बनाने में कड़ी मेहनत लगती है। धधकती भट्ठी में काम करना पड़ता है। बहुत डस्ट उड़ती है। इसलिए मजदूरों को यह काम पसंद नहीं है। मजबूरी में वह और उनका परिवार मिलकर बर्तन तैयार करते हैं। प्रतिदिन 500 रुपये तक कमाई हो जाती है। दुकानदारों से प्राप्त पुराने बर्तनों को दुरुस्त करते हैं।