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डीएमएसआरडीई ने बनाया सबसे हल्का व सुरक्षित कवरऑल सूट, डॉक्टरों-पैरामेडिकल स्टाफ को रखेगा सुरक्षित
Sun, 03 May 2020 12:48 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा
अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sun, 03 May 2020 12:48 AM IST
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डीएमएसआरडीई ने बनाया सबसे हल्का व सुरक्षित कवरऑल सूट
- फोटो : amar ujala
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डिफेंस मैटीरियल स्टोर एंड रिसर्च एंड डेवलेपमेंट इस्टैबलिशमेंट (डीएमएसआरडीई) कानपुर के वैज्ञानिकों ने डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के लिए सबसे हल्का और सुरक्षित कवरऑल सूट तैयार किया है। महज 290 ग्राम के इस सूट को धोकर पांच बार इस्तेमाल किया जा सकता है। अमूमन दूसरे सूट एक बार ही इस्तेमाल में लाए जा सकते हैं और उनका वजन 400 से 500 ग्राम तक होता है।
इसकी कीमत 925 रुपये (जीएसटी अलग से) निर्धारित की गई है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने सैनिटाइजर भी बनाया है। इसे डेफसैन 2020 नाम दिया गया है। इन दोनों उत्पादों की तकनीकी भी औद्योगिक इकाइयों को हस्तांतरित कर दी गई हैं। डीएमएसआरडीई के निदेशक डॉ. एन ईश्वर प्रसाद के निर्देशन और अगुवाई में वैज्ञानिकों ने 10 दिन में दोनों उत्पाद तैयार किए हैं।
कवरऑल सूट विकसित करने वाली टीम के लीडर और वैज्ञानिक डॉ. बिश्वरंजन दास ने बताया कि सूट में पॉलिस्टर के कपड़े का इस्तेमाल किया गया है। यह बड़ी आसानी से देश में उपलब्ध है। एक खास गोंद का इस्तेमाल सिलाई वाले स्थानों पर किया गया है, जो सूट को पूरी तरह से सुरक्षित बनाता है। इस सूट को केंद्र सरकार की ओर से यूनीक सर्टिफिकेशन कोड (यूसीसी) का प्रमाण पत्र मिला है।
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इसकी कीमत 925 रुपये (जीएसटी अलग से) निर्धारित की गई है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने सैनिटाइजर भी बनाया है। इसे डेफसैन 2020 नाम दिया गया है। इन दोनों उत्पादों की तकनीकी भी औद्योगिक इकाइयों को हस्तांतरित कर दी गई हैं। डीएमएसआरडीई के निदेशक डॉ. एन ईश्वर प्रसाद के निर्देशन और अगुवाई में वैज्ञानिकों ने 10 दिन में दोनों उत्पाद तैयार किए हैं।
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कवरऑल सूट विकसित करने वाली टीम के लीडर और वैज्ञानिक डॉ. बिश्वरंजन दास ने बताया कि सूट में पॉलिस्टर के कपड़े का इस्तेमाल किया गया है। यह बड़ी आसानी से देश में उपलब्ध है। एक खास गोंद का इस्तेमाल सिलाई वाले स्थानों पर किया गया है, जो सूट को पूरी तरह से सुरक्षित बनाता है। इस सूट को केंद्र सरकार की ओर से यूनीक सर्टिफिकेशन कोड (यूसीसी) का प्रमाण पत्र मिला है।
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मतलब सरकार ने स्वदेशी तकनीक से बने इस सूट को सबसे सुरक्षित माना है। वजन कम होने के कारण इसे पहनने और काफी देर तक पहने रखने में आसानी होती है। सूट को बनाने में ऐसी तकनीक अपनाई गई है कि उसमें सूक्ष्म से सूक्ष्म वायरस भी प्रवेश नहीं कर पाएगा। बिश्वरंजन दास ने बताया कि इस सूट को बनाने में रोहितास कुमार सिंह, मनोज कुमार सिंह और देव सिंह का अहम योगदान है।
सैनिटाइजर से हाथ रहेंगे सुरक्षित, वायरस भी मरेगा
संस्थान के ही वैज्ञानिकों की दूसरी टीम ने एक खास सैनिटाइजर तैयार किया है। इसकी खासियत यह है कि इसके इस्तेमाल से जहां मर जाएंगे, वहीं हाथ की त्वचा भी पूरी तरह से सुरक्षित रहेगी। वैज्ञानिक डॉ. तंद्र नंदी और आलोक श्रीवास्तव ने इसे तैयार किया है। यह सैनिटाइजर बाजार में बिकने वाले अन्य सैनिटाइजर के मुकाबले काफी सस्ता भी है।
औद्योगिक इकाई को तकनीक की गई हस्तांतरित
संस्थान के निदेशक डॉ. एन ईश्वर प्रसाद ने बताया कि दोनों उत्पादों की तकनीक शहर की औद्योगिक इकाई को हस्तांतरित की जा चुकी है। कवरऑल सूट बनाने वाली कंपनी की एक महीने में एक लाख पीस तैयार करने की क्षमता है। इसी तरह सैनिटाइजर प्रतिदिन एक हजार लीटर बनाया जा सकता है।
सैनिटाइजर से हाथ रहेंगे सुरक्षित, वायरस भी मरेगा
संस्थान के ही वैज्ञानिकों की दूसरी टीम ने एक खास सैनिटाइजर तैयार किया है। इसकी खासियत यह है कि इसके इस्तेमाल से जहां मर जाएंगे, वहीं हाथ की त्वचा भी पूरी तरह से सुरक्षित रहेगी। वैज्ञानिक डॉ. तंद्र नंदी और आलोक श्रीवास्तव ने इसे तैयार किया है। यह सैनिटाइजर बाजार में बिकने वाले अन्य सैनिटाइजर के मुकाबले काफी सस्ता भी है।
औद्योगिक इकाई को तकनीक की गई हस्तांतरित
संस्थान के निदेशक डॉ. एन ईश्वर प्रसाद ने बताया कि दोनों उत्पादों की तकनीक शहर की औद्योगिक इकाई को हस्तांतरित की जा चुकी है। कवरऑल सूट बनाने वाली कंपनी की एक महीने में एक लाख पीस तैयार करने की क्षमता है। इसी तरह सैनिटाइजर प्रतिदिन एक हजार लीटर बनाया जा सकता है।