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कोरोना का एक सच ये भी: जज्बात हुए बेअसर, रोगियों से अपनों ने ही मुंह मोड़ा, आपको झकझोर देंगे ये मामले
Mon, 22 Mar 2021 01:13 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Mon, 22 Mar 2021 01:13 PM IST
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सैम्पल लेते स्वास्थ्य कर्मी
- फोटो : अमर उजाला
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कोरोना काल में लोगों के जज्बातों की कशिश फीकी पड़ गई। इससे आपसी संबंधों में खटास आई। हालत यह हुई कि कोरोना संक्रमित होने पर लोग अपने बीमार परिजनों को अस्पताल में छोड़कर भाग खड़े हुए। रोगी की मौत होने पर कानपुर के हैलट प्रबंधन को पुलिस को सूचना देनी पड़ी।
तब लोग अंतिम संस्कार के लिए आए। इसके अलावा जो संक्रमित हुए, उनसे मेहमानों ने मुंह मोड़ लिया और रिश्तेदार परहेज करने लगे। हालत यह हुई कि स्वास्थ्य विभाग को इसके लिए अपील करनी पड़ी और पोस्टर लगाए गए।
बर्रा क्षेत्र के 65 साल के बुजुर्ग के कोरोना पॉजिटिव आने के बाद उनका बेटा छोड़कर भाग गया। न्यूरो साइंसेज कोविड अस्पताल से फोन किए जाते रहे, लेकिन पता नहीं चला। बाद में दिए गए पते पर पुलिस गई तो बेटा आया। वह कोरोना से डर गया था।
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इसी तरह एक वृद्धा के परिजन छोड़कर चले गए। बाद में तत्कालीन न्यूरो साइंसेज कोविड अस्पताल प्रभारी डॉ. प्रेम सिंह ने इसकी सूचना पुलिस को दी। उसके बाद से तीमारदार के दो कांटैक्ट नंबर रखने की व्यवस्था की गई और आधार कार्ड लिया जाता रहा।
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तब लोग अंतिम संस्कार के लिए आए। इसके अलावा जो संक्रमित हुए, उनसे मेहमानों ने मुंह मोड़ लिया और रिश्तेदार परहेज करने लगे। हालत यह हुई कि स्वास्थ्य विभाग को इसके लिए अपील करनी पड़ी और पोस्टर लगाए गए।
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बर्रा क्षेत्र के 65 साल के बुजुर्ग के कोरोना पॉजिटिव आने के बाद उनका बेटा छोड़कर भाग गया। न्यूरो साइंसेज कोविड अस्पताल से फोन किए जाते रहे, लेकिन पता नहीं चला। बाद में दिए गए पते पर पुलिस गई तो बेटा आया। वह कोरोना से डर गया था।
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इसी तरह एक वृद्धा के परिजन छोड़कर चले गए। बाद में तत्कालीन न्यूरो साइंसेज कोविड अस्पताल प्रभारी डॉ. प्रेम सिंह ने इसकी सूचना पुलिस को दी। उसके बाद से तीमारदार के दो कांटैक्ट नंबर रखने की व्यवस्था की गई और आधार कार्ड लिया जाता रहा।
वहीं कोरोना संक्रमित होने वाले लोगों को सामाजिक बहिष्कार जैसे हालातों का भी सामना करना पड़ा। इस पर तत्कालीन सीएमओ डॉ. अशोक शुक्ला ने अपील जारी की थी कि कोरोना संक्रमित मरीजों से सोशल बहिष्कार जैसा व्यवहार न करें। इससे उनकी सेहत की रिकवरी में देरी होगी। इसके अलावा कोरोना काल में शव के अंतिम दर्शन की रस्म भी प्रभावित हुई। लोगों के रिश्तेदारों ने शवों के अंतिम दर्शन के लिए आना बंद कर दिया।
कोरोना से नवजात जीते जंग
कोरोना से नवजात शिशुओं ने जंग जीती है। जच्चाबच्चा अस्पताल में कोरोना संक्रमित गर्भवतियों में 11 के शिशु भी कोरोना संक्रमित हो गए थे। उन्हें बालरोग अस्पताल के एनआईसीयू में भर्ती करके इलाज किया गया। इनमें से किसी की मौत नहीं हुई।
शिशुओं का रिकवरी रेट शत-प्रतिशत रहा है। सिर्फ एक बच्चे में संक्रमण लेवल अधिक होने के कारण रेमडेसिविर दवा चलाई गई। बालरोग विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत राव का कहना है कि नवजात शिशुओं का रिकवरी रेट शत-प्रतिशत रहा।
कोरोना से नवजात जीते जंग
कोरोना से नवजात शिशुओं ने जंग जीती है। जच्चाबच्चा अस्पताल में कोरोना संक्रमित गर्भवतियों में 11 के शिशु भी कोरोना संक्रमित हो गए थे। उन्हें बालरोग अस्पताल के एनआईसीयू में भर्ती करके इलाज किया गया। इनमें से किसी की मौत नहीं हुई।
शिशुओं का रिकवरी रेट शत-प्रतिशत रहा है। सिर्फ एक बच्चे में संक्रमण लेवल अधिक होने के कारण रेमडेसिविर दवा चलाई गई। बालरोग विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत राव का कहना है कि नवजात शिशुओं का रिकवरी रेट शत-प्रतिशत रहा।
ऐसे भी कोरोना योद्धा: संक्रमित हुए तो मरीजों की सेवा में जुटे
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के बालरोग विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत राव ने कोरोना वॉरियर के रूप में अलग मिसाल कायम की है। पिछले साल सितंबर में हैलट के न्यूरो साइंसेज कोविड अस्पताल में डॉ. राव की ड्यूटी लगी थी। एक दिन बाद उनमें कोरोना जैसे लक्षण उभरे तो जांच कराई।
रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद 14 दिन कोविड वार्ड में रहे। बिस्तर पर पड़े रहकर दवाएं खाने और संक्रमण ठीक होने का इंतजार करने के बजाय वह काम जुट गए। सुबह दूसरे संक्रमित मरीजों को समय से नाश्ता कराना, खाना खिलाना और उनको दवाएं देने का काम शुरू कर दिया।
वार्ड में गंदगी हुई तो स्वीपर को बुलाने के बजाय खुद साफ करते। साथ ही पूरे वार्ड में पोंछा भी लगाते। वह हर वक्त खुद को काम में व्यस्त रखते रहे। उस वक्त अस्पताल का स्टाफ कोरोना संक्रमित के पास आने से कतराता था। डॉ. राव कहते हैं कि दूसरों की सेवा करने से सुखद अनुभव हुआ। इससे मेरी खुद की सेहत जल्दी सुधरी और कोरोना निगेटिव हो गए।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के बालरोग विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत राव ने कोरोना वॉरियर के रूप में अलग मिसाल कायम की है। पिछले साल सितंबर में हैलट के न्यूरो साइंसेज कोविड अस्पताल में डॉ. राव की ड्यूटी लगी थी। एक दिन बाद उनमें कोरोना जैसे लक्षण उभरे तो जांच कराई।
रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद 14 दिन कोविड वार्ड में रहे। बिस्तर पर पड़े रहकर दवाएं खाने और संक्रमण ठीक होने का इंतजार करने के बजाय वह काम जुट गए। सुबह दूसरे संक्रमित मरीजों को समय से नाश्ता कराना, खाना खिलाना और उनको दवाएं देने का काम शुरू कर दिया।
वार्ड में गंदगी हुई तो स्वीपर को बुलाने के बजाय खुद साफ करते। साथ ही पूरे वार्ड में पोंछा भी लगाते। वह हर वक्त खुद को काम में व्यस्त रखते रहे। उस वक्त अस्पताल का स्टाफ कोरोना संक्रमित के पास आने से कतराता था। डॉ. राव कहते हैं कि दूसरों की सेवा करने से सुखद अनुभव हुआ। इससे मेरी खुद की सेहत जल्दी सुधरी और कोरोना निगेटिव हो गए।
बड़ी चुनौती थी... रोगी का इलाज करूं या स्टाफ संभालूं
कानपुर के पहले कोरोना रोगी विजय नारायण राय का इलाज उर्सला अस्पताल के सीनियर फिजिशियन डॉ. शैलेंद्र तिवारी ने किया था। पहले रोगी के इलाज को उन्होंने चुनौती की तरह लिया। केंद्र सरकार की कोविड गाइड लाइन पर इलाज शुरू किया। उस वक्त कोरोना रोगी के इलाज में दोहरी चुनौती थी। एक तो रोगी के इलाज का तरीका और दूसरा अस्पताल के स्टाफ को संभालना।
हर शख्स डरा हुआ था। इससे मैं खुद रोगी के पास जाता, जिससे दूसरा स्टाफ भी जाने में नहीं हिचकता। डॉ. शैलेंद्र के मुताबिक, आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) की गाइड लाइन को फॉलो किया। सबसे ज्यादा ध्यान रोगी के ब्लड प्रेशर नियंत्रण और सांस तंत्र पर रखा। इससे संक्रमण नियंत्रण में आता चला गया।
जिला प्रशासन ने हैलट के बजाय रोगी को उर्सला में भर्ती किया और मेरे ऊपर भरोसा जताया। इससे दबाव भी अधिक था। डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ की काउंसलिंग करनी पड़ती कि रोगी के पास जाएं। उन्हें हिम्मत बंधाते रहें। उसके बाद 10 अगस्त वर्ष 2020 को मैं खुद संक्रमित हो गया।
डॉ. शैलेंद्र बताते हैं कि खुद संक्रमित होने के बाद भी क्वारंटीन होकर इलाज करते रहे। लेकिन, हाई ब्लड शुगर होने से संक्रमण बढ़ गया और निमोनिया के लक्षण उभर आए। हालत गंभीर होने लगी। इसके बाद सर्वोदयनगर स्थित निजी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। डॉक्टर दोस्तों की भी यही सलाह रही। 11 दिन तक अस्पताल के आईसीयू में भर्ती रहे। इसके बाद संक्रमण से मुक्त हुए। उनका कहना है कि लक्षण उभरने पर तुरंत जांच कराकर इलाज शुरू कर देना चाहिए। जल्दी इलाज होने पर तबियत ठीक हो जाती है। इसे छिपाना या लापरवाही करना ही घातक हो जाता है।
कानपुर के पहले कोरोना रोगी विजय नारायण राय का इलाज उर्सला अस्पताल के सीनियर फिजिशियन डॉ. शैलेंद्र तिवारी ने किया था। पहले रोगी के इलाज को उन्होंने चुनौती की तरह लिया। केंद्र सरकार की कोविड गाइड लाइन पर इलाज शुरू किया। उस वक्त कोरोना रोगी के इलाज में दोहरी चुनौती थी। एक तो रोगी के इलाज का तरीका और दूसरा अस्पताल के स्टाफ को संभालना।
हर शख्स डरा हुआ था। इससे मैं खुद रोगी के पास जाता, जिससे दूसरा स्टाफ भी जाने में नहीं हिचकता। डॉ. शैलेंद्र के मुताबिक, आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) की गाइड लाइन को फॉलो किया। सबसे ज्यादा ध्यान रोगी के ब्लड प्रेशर नियंत्रण और सांस तंत्र पर रखा। इससे संक्रमण नियंत्रण में आता चला गया।
जिला प्रशासन ने हैलट के बजाय रोगी को उर्सला में भर्ती किया और मेरे ऊपर भरोसा जताया। इससे दबाव भी अधिक था। डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ की काउंसलिंग करनी पड़ती कि रोगी के पास जाएं। उन्हें हिम्मत बंधाते रहें। उसके बाद 10 अगस्त वर्ष 2020 को मैं खुद संक्रमित हो गया।
डॉ. शैलेंद्र बताते हैं कि खुद संक्रमित होने के बाद भी क्वारंटीन होकर इलाज करते रहे। लेकिन, हाई ब्लड शुगर होने से संक्रमण बढ़ गया और निमोनिया के लक्षण उभर आए। हालत गंभीर होने लगी। इसके बाद सर्वोदयनगर स्थित निजी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। डॉक्टर दोस्तों की भी यही सलाह रही। 11 दिन तक अस्पताल के आईसीयू में भर्ती रहे। इसके बाद संक्रमण से मुक्त हुए। उनका कहना है कि लक्षण उभरने पर तुरंत जांच कराकर इलाज शुरू कर देना चाहिए। जल्दी इलाज होने पर तबियत ठीक हो जाती है। इसे छिपाना या लापरवाही करना ही घातक हो जाता है।
हैलट में 30 से 130 हो गए वेंटिलेटर
कोरोना काल में कानपुर के हैलट अस्पताल में इंटेंसिव केयर के संसाधन बढ़ गए। कोरोना आने के पहले हैलट में महज 30 वेंटिलेटर थे। इनमें कुछ खराब थे। मेडिसिन और एनेस्थीसिया विभाग के आईसीयू से ही काम चल रहा था। लेकिन, कोरोना काल में जैसे ही इंटेंसिव केयर की जरूरत पड़ी, शासन ने यहां वेंटिलेटर, बाई पेप, एचएफएनसी आदि उपलब्ध करा दिए।
अब यहां 130 वेंटिलेटर हैं। साथ ही न्यूरो साइंसेज अस्पताल में अलग से एक आईसीयू की व्यवस्था हो गई। संसाधन बढ़ने का लाभ आगे भी रोगियों को मिलता रहेगा। अस्पताल में एमआरआई मशीन, सीटी स्कैन मशीन और डिजिटल अल्ट्रासाउंड आदि की संख्या बढ़ गई है।
शासन ने महंगी जांचों के लिए उपकरणों के लिए बजट पास कर दिया है। न्यूरो साइंसेज में अलग से लैब की भी व्यवस्था हो रही है। इसके अलावा अस्पताल में 40 बेड की नई डायलिसिस यूनिट का प्रस्ताव पास हो गया है। इससे गुर्दा रोगियों को आसानी हो जाएगी। अभी एक डायलिसिस यूनिट मेडिसिन विभाग में ही थी।
कोरोना काल में कानपुर के हैलट अस्पताल में इंटेंसिव केयर के संसाधन बढ़ गए। कोरोना आने के पहले हैलट में महज 30 वेंटिलेटर थे। इनमें कुछ खराब थे। मेडिसिन और एनेस्थीसिया विभाग के आईसीयू से ही काम चल रहा था। लेकिन, कोरोना काल में जैसे ही इंटेंसिव केयर की जरूरत पड़ी, शासन ने यहां वेंटिलेटर, बाई पेप, एचएफएनसी आदि उपलब्ध करा दिए।
अब यहां 130 वेंटिलेटर हैं। साथ ही न्यूरो साइंसेज अस्पताल में अलग से एक आईसीयू की व्यवस्था हो गई। संसाधन बढ़ने का लाभ आगे भी रोगियों को मिलता रहेगा। अस्पताल में एमआरआई मशीन, सीटी स्कैन मशीन और डिजिटल अल्ट्रासाउंड आदि की संख्या बढ़ गई है।
शासन ने महंगी जांचों के लिए उपकरणों के लिए बजट पास कर दिया है। न्यूरो साइंसेज में अलग से लैब की भी व्यवस्था हो रही है। इसके अलावा अस्पताल में 40 बेड की नई डायलिसिस यूनिट का प्रस्ताव पास हो गया है। इससे गुर्दा रोगियों को आसानी हो जाएगी। अभी एक डायलिसिस यूनिट मेडिसिन विभाग में ही थी।