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जलवायु परिवर्तन से खतरनाक हुआ कोरोना का कुनबा, श्वसन तंत्र पर किया हमला
Wed, 03 Feb 2021 10:01 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Wed, 03 Feb 2021 10:01 PM IST
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कोरोना वायरस
- फोटो : अमर उजाला
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ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जलवायु परिवर्तन के चलते कोरोना का कुनबा खतरनाक हुआ है। बीते सालों में इस कुनबे से चार नए वायरस निकले हैं। अभी और निकलने की आशंका जताई जा रही है। इस वायरस का हमला श्वसन तंत्र पर होता है।
इस कारण श्वसन तंत्र की चिकित्सा विधा के सामने नई चुनौतियां पैदा हो गई हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पल्मोनरी डिजीजेज(नैपकॉन) में विश्व भर के वैज्ञानिकों ने इस पर मंथन किया। नैपकॉन के साइंटिफिक सेक्रेटरी और इंडियन चेस्ट सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसके कटियार ने यह जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि नैपकॉन के 30 सत्रों में कोरोना पर चर्चा हुई। कोरोना के कुनबे से साल 2003 में सार्स(सीवियर एक्यूट रेस्पेेरेटरी सिंड्रोम), साल 2012 में मर्स(मिडिल ईस्ट रेस्पेरेटरी सिंड्रोम) और साल 2019 में कोविड(कोरोना वायरस डिजीज) आया है।
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इसके बाद कोविड-19 का नया स्ट्रेन भी ब्रिटेन में आ गया। ये सांस तंत्र को प्रभावित करने वाले वायरस हैं। इसमें कई चुनौतियां जैसे फेफड़ों की नई तरह की फाइब्रोसिस, इनफ्लेटेड सेल से कोविड ठीक होने के बाद भी जटिलताएं आदि हैं।
27 से 31 जनवरी तक चली वर्चुअल नैपकॉन में नई गाइडलाइन तैयार करने और शोध करने पर मंथन किया गया। डॉ. कटियार ने बताया कि जटिलताओं पर काम किया जा रहा है। इसके बाद स्टैंडर्ड तरीके तैयार किए जाएंगे। इस बार नैपकॉन में कोरोना फोकस में रहा।
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इस कारण श्वसन तंत्र की चिकित्सा विधा के सामने नई चुनौतियां पैदा हो गई हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पल्मोनरी डिजीजेज(नैपकॉन) में विश्व भर के वैज्ञानिकों ने इस पर मंथन किया। नैपकॉन के साइंटिफिक सेक्रेटरी और इंडियन चेस्ट सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसके कटियार ने यह जानकारी दी।
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उन्होंने बताया कि नैपकॉन के 30 सत्रों में कोरोना पर चर्चा हुई। कोरोना के कुनबे से साल 2003 में सार्स(सीवियर एक्यूट रेस्पेेरेटरी सिंड्रोम), साल 2012 में मर्स(मिडिल ईस्ट रेस्पेरेटरी सिंड्रोम) और साल 2019 में कोविड(कोरोना वायरस डिजीज) आया है।
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इसके बाद कोविड-19 का नया स्ट्रेन भी ब्रिटेन में आ गया। ये सांस तंत्र को प्रभावित करने वाले वायरस हैं। इसमें कई चुनौतियां जैसे फेफड़ों की नई तरह की फाइब्रोसिस, इनफ्लेटेड सेल से कोविड ठीक होने के बाद भी जटिलताएं आदि हैं।
27 से 31 जनवरी तक चली वर्चुअल नैपकॉन में नई गाइडलाइन तैयार करने और शोध करने पर मंथन किया गया। डॉ. कटियार ने बताया कि जटिलताओं पर काम किया जा रहा है। इसके बाद स्टैंडर्ड तरीके तैयार किए जाएंगे। इस बार नैपकॉन में कोरोना फोकस में रहा।