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अमृत महोत्सव: नेहरू जी ने रखी थी तिलक हॉल की नींव, आंदोलनों को धार देने महात्मा गांधी यहां सात बार आए थे
Tue, 09 Aug 2022 01:36 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 09 Aug 2022 01:36 PM IST
सार
तिलक हॉल के निर्माण के बाद 1942 की अगस्त क्रांति (भारत छोड़ो आंदोलन) समेत कई आंदोलनों की रणनीति इसी हॉल में बैठकर बनी थी। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों की गिरफ्तारी भी इस हॉल से हुई थी। आंदोलनों को धार देने के लिए महात्मा गांधी खुद ही सात बार यहां आ चुके हैं।
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शिवाला स्थित तिलक हॉल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
आजादी के आंदोलनों की पृष्ठभूमि रहे शिवाला स्थित तिलक हॉल ने गुलामी जंजीरें तोड़ते हुए नए भारत को भी देखा है। 15 अगस्त 1947 की उस सुबह का भी गवाह है, जब देश ने आजादी पाई थी। 1925 में कानपुर में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान तिलक हॉल को बनाने का फैसला लिया गया था।
1925 में नवाबों से जमीन खरीदी गई, 24 सितंबर 1931 को जवाहर लाल नेहरू ने नींव रखी और 24 जुलाई 1934 को महात्मा गांधी ने इसका उद्घाटन किया था। उस वक्त इसके प्रबंधक नारायण प्रसाद अरोड़ा थे। यह तिलक मेमोरियल सोसाइटी की संपत्ति है, जिसके वर्तमान चेयरमैन, पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेसी नेता श्रीप्रकाश जायसवाल हैं।
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता 84 साल के शंकर दत्त मिश्रा बताते हैं कि निर्माण के समय यहां केवल टीन शेड हुआ करता था। पास में पार्क है, जिसमें क्रांतिकारी बैठक करते और व्यायामशाला में लाठी चलाना सीखते थे। फिलहाल पार्क को नगर निगम को सौंप दिया गया है। अब उसका नाम श्रद्धानंद पार्क है।
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1925 में नवाबों से जमीन खरीदी गई, 24 सितंबर 1931 को जवाहर लाल नेहरू ने नींव रखी और 24 जुलाई 1934 को महात्मा गांधी ने इसका उद्घाटन किया था। उस वक्त इसके प्रबंधक नारायण प्रसाद अरोड़ा थे। यह तिलक मेमोरियल सोसाइटी की संपत्ति है, जिसके वर्तमान चेयरमैन, पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेसी नेता श्रीप्रकाश जायसवाल हैं।
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वरिष्ठ कांग्रेसी नेता 84 साल के शंकर दत्त मिश्रा बताते हैं कि निर्माण के समय यहां केवल टीन शेड हुआ करता था। पास में पार्क है, जिसमें क्रांतिकारी बैठक करते और व्यायामशाला में लाठी चलाना सीखते थे। फिलहाल पार्क को नगर निगम को सौंप दिया गया है। अब उसका नाम श्रद्धानंद पार्क है।
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तिलक हॉल के निर्माण के बाद 1942 की अगस्त क्रांति (भारत छोड़ो आंदोलन) समेत कई आंदोलनों की रणनीति इसी हॉल में बैठकर बनी थी। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों की गिरफ्तारी भी इस हॉल से हुई थी। आंदोलनों को धार देने के लिए महात्मा गांधी खुद ही सात बार यहां आ चुके हैं।
कांग्रेस की विचारधारा से अलग होने के बावजूद चंद्रशेखर आजाद भी अक्सर तिलक हॉल आया करते थे। तीन बार सुभाष चंद्र बोस भी यहां पर आए हैं। तिलक हॉल के कार्यालय सचिव राधेश्याम कश्यप ने बताया कि हर साल 15 अगस्त में यहां आजादी का जश्न मनाया जाता है। जश्न 14 अगस्त की रात से ही शुरू हो जाता है। इस समय यहां पर कांग्रेस पार्टी का कार्यालय संचालित है। इसके साथ में अशोक लाइब्रेरी है, जिसमें गांधी साहित्य की किताबें मौजूद हैं।
कांग्रेस की विचारधारा से अलग होने के बावजूद चंद्रशेखर आजाद भी अक्सर तिलक हॉल आया करते थे। तीन बार सुभाष चंद्र बोस भी यहां पर आए हैं। तिलक हॉल के कार्यालय सचिव राधेश्याम कश्यप ने बताया कि हर साल 15 अगस्त में यहां आजादी का जश्न मनाया जाता है। जश्न 14 अगस्त की रात से ही शुरू हो जाता है। इस समय यहां पर कांग्रेस पार्टी का कार्यालय संचालित है। इसके साथ में अशोक लाइब्रेरी है, जिसमें गांधी साहित्य की किताबें मौजूद हैं।