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शहीद को दो फूल भी नहीं नसीब
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Mon, 14 Dec 2015 12:03 AM IST
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शहीदों की चिताओं पर लगेेंगे हर बरस मेले..। इन
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पंक्तियों को लिखने वाले कवि को यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि शहीदों की
शहादत को ऐसे भुला दिया जाएगा। 13 दिसंबर 01 को संसद में हुए आतंकी हमले
में तहसील क्षेत्र के कस्बे की रहने वाली कमलेश कुमारी शहीद हुई थी।
शहीद होने के बाद भारत सरकार ने शहीद के परिजनों को अशोक चक्र दिया था, पर हालत यह हो गई कि अब शहीद महिला की प्रतिमा पर शहादत के दिन दो फूल भी नसीब नहीं हुए। अफसर से लेकर नेताओं तक ने इस शहीद महिला को भुला दिया।
ज्ञात हो कि 13 दिसंबर 2001 को जब आतंकियों ने संसद पर हमला किया था, उस वक्त सीआरपीएफ की 88 महिला बटालियन में तैनात सिपाही सिकंदरपुर की रहने वाली कमलेश कुमारी की ड्यूटी वहीं पर थी। उस दौरान लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद की सुरक्षा के लिए कमलेश ने अपनी जान की आहुति देकर आतंकियों से लोहा लिया था और संसद पर कोई आंच नहीं आने दी थी।
कमलेश की शहादत की खबर जब उनके गांव सिकंदरपुर आई तो यहां शोक की लहर दौड़ गई थी। अगले दिन जब शहीद कमलेश कुमारी का शव आया तो अफसर और नेताओं का जमावड़ा लगा था। परिवार के आंसू पोंछने को अफसर से लेकर सरकार तक ने बड़े बड़े वादे किए थे।
इसके बाद सभी ने मुंह फेर लिया। यहां तक शहादत की अगली बरसी 2002 में ही कोई भी एक फूल तक चढ़ाने नहीं आया। परिजनों ने ही पहली बरसी पर कार्यक्रम किया। आज जब 14वीं वर्षगांठ हुई तो कोई भी गांव नहीं पहुंचा। हां इतना जरूर था कि दिल्ली में आयोजित शहादत कार्यक्रम में शहीद की पति को बुलाया गया था, पर गांव में आकर किसी भी अफसर और नेता को दो फूल चढ़ाने की याद तक नहीं आई।
शहीद कमलेश कुमारी की छोटी बेटी श्वेता ने रविवार सुबह मां की प्रतिमा को साफ किया और फूल चढ़ाकर श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर परिवार के अजीत सिंह, राजेश कुमार, कमलेश के भाई विवेक कुमार, डिंपल, अर्चना, कविता, आनामिका, रूबी, सुमित, श्यामू और मधु आदि ने भी फूल चढ़ाकर श्रद्धांजलि अर्पित की।
शहीद होने के बाद भारत सरकार ने शहीद के परिजनों को अशोक चक्र दिया था, पर हालत यह हो गई कि अब शहीद महिला की प्रतिमा पर शहादत के दिन दो फूल भी नसीब नहीं हुए। अफसर से लेकर नेताओं तक ने इस शहीद महिला को भुला दिया।
ज्ञात हो कि 13 दिसंबर 2001 को जब आतंकियों ने संसद पर हमला किया था, उस वक्त सीआरपीएफ की 88 महिला बटालियन में तैनात सिपाही सिकंदरपुर की रहने वाली कमलेश कुमारी की ड्यूटी वहीं पर थी। उस दौरान लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद की सुरक्षा के लिए कमलेश ने अपनी जान की आहुति देकर आतंकियों से लोहा लिया था और संसद पर कोई आंच नहीं आने दी थी।
कमलेश की शहादत की खबर जब उनके गांव सिकंदरपुर आई तो यहां शोक की लहर दौड़ गई थी। अगले दिन जब शहीद कमलेश कुमारी का शव आया तो अफसर और नेताओं का जमावड़ा लगा था। परिवार के आंसू पोंछने को अफसर से लेकर सरकार तक ने बड़े बड़े वादे किए थे।
इसके बाद सभी ने मुंह फेर लिया। यहां तक शहादत की अगली बरसी 2002 में ही कोई भी एक फूल तक चढ़ाने नहीं आया। परिजनों ने ही पहली बरसी पर कार्यक्रम किया। आज जब 14वीं वर्षगांठ हुई तो कोई भी गांव नहीं पहुंचा। हां इतना जरूर था कि दिल्ली में आयोजित शहादत कार्यक्रम में शहीद की पति को बुलाया गया था, पर गांव में आकर किसी भी अफसर और नेता को दो फूल चढ़ाने की याद तक नहीं आई।
शहीद कमलेश कुमारी की छोटी बेटी श्वेता ने रविवार सुबह मां की प्रतिमा को साफ किया और फूल चढ़ाकर श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर परिवार के अजीत सिंह, राजेश कुमार, कमलेश के भाई विवेक कुमार, डिंपल, अर्चना, कविता, आनामिका, रूबी, सुमित, श्यामू और मधु आदि ने भी फूल चढ़ाकर श्रद्धांजलि अर्पित की।