फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kannauj News ›   Subrata got ticket to hoist saffron on SP's stronghold

Kannauj News: सपा के गढ़ पर भगवा फहराने का सुब्रत को मिला टिकट

Mon, 04 Mar 2024 12:02 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Mon, 04 Mar 2024 12:02 AM IST
विज्ञापन
Subrata got ticket to hoist saffron on SP's stronghold
कन्नौज। सांसद रहते लगातार दूसरी बार और कुल चौथी बार पार्टी का भरोसा जीतने वाले सुब्रत पाठक को टिकट मिलने के पीछे अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा हो रही है।
विज्ञापन

कई पहलुओं में सबसे अहम सपा के किले को ध्वस्त करने के इनाम के तौर पर देखा जा रहा है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन सांसद डिंपल यादव को हराने के बाद सपा को शिकस्त देने का सिलसिला वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी रहा। इस चुनाव में सपा को सभी सीट पर शिकस्त देकर भाजपा ने पहली बार क्लीन स्वीप किया था।

वर्ष 1992 में वजूद में आने के बाद से ही सपा ने कन्नौज को अपना सियासी गढ़ बना लिया था। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान सपा हर बार अपने इस किला को मजबूत करती जा रही थी। वर्ष 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में सपा ने पहली बार जीत हासिल की। यह सिलसिला दो दशक के दौरान अगले सात चुनाव तक जारी रहा।
विज्ञापन

वर्ष 1999 में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के यहां से सांसद बनने के बाद इस संसदीय सीट को वीआईपी का रुतबा हासिल हो गया। उनके बाद अखिलेश यादव और डिंपल यादव की सियासी इंट्री से भी सपा यहां मजबूत होती गई। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में तो सपा ने यहां की तीनों सीट जीतकर भाजपा सहित सभी पार्टियों को करारी शिकस्त दे डाली। ऐसे में सपा के इस गढ़ में भाजपा का झंडा लहराना चुनौती थी। सुब्रत पाठक ने छात्र जीवन के बाद से ही भाजपा का झंडा उठाकर सपा को चुनौती देनी शुरू कर दी थी।
विज्ञापन
विज्ञापन

वह भाजयुमो और भाजपा के जिलाध्यक्ष रहते हुए सपा पर लगातार हमलावर रहे। इसी वजह कर पार्टी ने उन्हें सबसे पहले वर्ष 2009 में अखिलेश यादव के सामने मैदान में उतारा। उस चुनाव में सुब्रत को कामयाबी नहीं मिली, लेकिन चुनाैती जरूर दी। फिर वर्ष 2014 के चुनाव में भी हार मिली। आखिरकार वर्ष 2019 में कोशिश रंग लाई और सुब्रत पाठक ने सपा के इस मजबूत किले को भेदकर भाजपा का झंडा बुलंद कर दिया।


सुब्रत पाठक के सांसद बनने के बाद से ही जिले में सपा की सियासी जमीन सिकुड़नी शुरू हो गई। लोकसभा चुनाव के बाद हुए पंचायत चुनाव में जिले के आठों ब्लॉकों में एक साथ पहली बार भाजपा के प्रमुख बने। उसके बाद जिला पंचायत में सदस्यों की कम संख्या होने के बावजूद सियासी दांवपेंच से सपा को पटखनी देते हुए अध्यक्ष पद पर पहली बार भाजपा का कब्जा करवाने में भी सुब्रत पाठक की अहम भूमिका रही। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जिले की तीनों सीट पर सपा को शिकस्त देकर जिले से सपा का सफाया हो गया। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर संगठन ने फिर से सुब्रत पाठक पर ही भरोसा जताया है।



सुब्रत पाठक भाजपा की युवा इकाई भाजयुमो के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। उसके बाद भाजपा के जिलाध्यक्ष की भी जिम्मेदारी निभाई। वर्ष 2009 के चुनाव में अखिलेश यादव के मुकाबले तीसरे नंबर पर रहे थे। पार्टी ने उनपर भरोसा रखा और निकाय चुनाव में उनकी मां सरोज पाठक को पालिकाध्यक्ष का टिकट दिया और वह जीत गईं। वर्ष 2014 के चुनाव में डिंपल यादव से कड़े मुकाबले में शिकस्त के बावजूद पार्टी ने उन्हें भाजयुमो का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। उसके बाद प्रदेश संगठन में मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी।


विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed