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ऐसे कैसे दूर होगा कुपोषण
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Tue, 05 Jan 2016 12:29 AM IST
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जिले में हजारों की तादात में निकले कुपोषित और
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अतिकुपोषित बच्चों को बेहतर उपचार नहीं मिल पा रहा है। जिला अस्पताल में
बना अतिकुपोषित वार्ड के सभी बेड नहीं भर पा रहे हैं। इससे कुपोषण मुक्त
जनपद होने का सपना साकार नहीं हो पा रहा है।
जिले से कुपोषण दूर करने को प्रशासन ने जिला अस्पताल परिसर के अंदर 10 बेड का वार्ड स्थापित किया था। इसमें अतिकुपोषित बच्चों को भर्ती करके कुपोषण मुक्त किया जाता है। आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से वजन कराकर प्रशासन ने हजारों की तादात में अतिकुपोषित बच्चे निकले हैं, पर उनमें से चिह्नित किए गए बच्चों को अति कुपोषित वार्ड में नहीं पहुंचाया जा रहा है।
वर्ष 15 में उन्नयन कार्यक्रम के तहत जिले के अफसरों ने कुपोषण को गंभीरता से लिया था। तब जिलाधिकारी, सीडीओ समेत आधा सैकड़ा से अधिक अधिकारियों ने गांवों को गोद लेकर कुपोषित बच्चों को सेहतमंद बनाने की मुहिम चलाई थी। तब कुपोषण वार्ड में बच्चों को भर्ती कराने के लिए लाइन लग गई गई थी।
इस कारण दूसरा कुपोषण वार्ड तैयार कराया गया था। पर, अब आलम यह है कि पहले का वार्ड ही खाली पड़ा रहता है। शुरू में यह योजना कारगर भी रही, पर चुनाव की व्यस्तता ने फिर कुपोषण को हावी होने का मौका दे दिया। अब आलम यह है कि जनपद स्तर के अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं।
इस कारण ग्रामीण स्तर पर भी कुपोषण से बच्चों को निजात दिलाने की मुहिम ठंडी पड़ गई है। जिला कार्यक्रम अधिकारी कार्यालय से लेकर आंगनबाड़ी केंद्रों पर फिर से लापरवाही का पुराना ढर्रा चालू हो गया है। इस कारण रविवार को वार्ड में मात्र छह बच्चे ही भर्ती मिले। जानकारी करने पर स्टाफ नर्स ज्योति ने बताया कि कुछ बच्चे ठीक होकर घर चले गए हैं।
नए बच्चे अभी तक नहीं आए हैं। उन्होंने बताया कि इस कारण बेड खाली पड़े हैं। बताया कि कुछ आंगनबाड़ी कार्यकत्री, आशा बहू बच्चों को लेकर आती हैं। कुछ परिवार अपने बच्चों को भर्ती तो कराते हैं, पर बाद में चुपचाप भाग जाते हैं। उधर, जिला अस्पताल के अधीक्षक डा. सीपी सिंह का कहना है कि कभी-कभी बच्चे अधिक आ जाने पर उनके मोबाइल नंबर लेकर वापस कर दिया जाता है। बेड खाली होते ही फोन से सूचना देकर बुलाया जाता है।
वर्तमान समय में बच्चे कम आ रहे हैं। इस कारण बेड खाली पड़े हैं। एएनएम एवं आशा बहू कुपोषित बच्चों को भर्ती कराने में दिलचस्पी नहीं ले रही हैं। इसके अलावा सीएचसी व पीएचसी के अधीक्षक भी यहां पर अति कुपोषित बच्चों को रेफर कर सकते हैं, पर ऐसा हो नहीं रहा है।
उधर, जनपद में आंगनबाड़ी केंद्रों पर नवजात शिशुओं को कुपोषण से मुक्त करने के लिए हाटकुक्ड बनाकर गरमागरम खाना खिलाने की योजना धड़ाम हो गई है। शासन से बीते तीन महीने से इस योजना के संचालन को बजट ही नहीं आया है। इसी कारण आंगनबाड़ी केंद्रों पर भी धनराशि नहीं पहुंची, जिससे हाटकुक्ड बंद पड़ा है।
इस कारण हाटकुक्ड के जरिए कुपोषण दूर करने के प्रयास हवाई साबित हो रहे हैं। जनपद स्तर के अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि बजट आवंटन के लिए शासन स्तर पर लिखा-पढ़ी चल रही है।
जिले से कुपोषण दूर करने को प्रशासन ने जिला अस्पताल परिसर के अंदर 10 बेड का वार्ड स्थापित किया था। इसमें अतिकुपोषित बच्चों को भर्ती करके कुपोषण मुक्त किया जाता है। आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से वजन कराकर प्रशासन ने हजारों की तादात में अतिकुपोषित बच्चे निकले हैं, पर उनमें से चिह्नित किए गए बच्चों को अति कुपोषित वार्ड में नहीं पहुंचाया जा रहा है।
वर्ष 15 में उन्नयन कार्यक्रम के तहत जिले के अफसरों ने कुपोषण को गंभीरता से लिया था। तब जिलाधिकारी, सीडीओ समेत आधा सैकड़ा से अधिक अधिकारियों ने गांवों को गोद लेकर कुपोषित बच्चों को सेहतमंद बनाने की मुहिम चलाई थी। तब कुपोषण वार्ड में बच्चों को भर्ती कराने के लिए लाइन लग गई गई थी।
इस कारण दूसरा कुपोषण वार्ड तैयार कराया गया था। पर, अब आलम यह है कि पहले का वार्ड ही खाली पड़ा रहता है। शुरू में यह योजना कारगर भी रही, पर चुनाव की व्यस्तता ने फिर कुपोषण को हावी होने का मौका दे दिया। अब आलम यह है कि जनपद स्तर के अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं।
इस कारण ग्रामीण स्तर पर भी कुपोषण से बच्चों को निजात दिलाने की मुहिम ठंडी पड़ गई है। जिला कार्यक्रम अधिकारी कार्यालय से लेकर आंगनबाड़ी केंद्रों पर फिर से लापरवाही का पुराना ढर्रा चालू हो गया है। इस कारण रविवार को वार्ड में मात्र छह बच्चे ही भर्ती मिले। जानकारी करने पर स्टाफ नर्स ज्योति ने बताया कि कुछ बच्चे ठीक होकर घर चले गए हैं।
नए बच्चे अभी तक नहीं आए हैं। उन्होंने बताया कि इस कारण बेड खाली पड़े हैं। बताया कि कुछ आंगनबाड़ी कार्यकत्री, आशा बहू बच्चों को लेकर आती हैं। कुछ परिवार अपने बच्चों को भर्ती तो कराते हैं, पर बाद में चुपचाप भाग जाते हैं। उधर, जिला अस्पताल के अधीक्षक डा. सीपी सिंह का कहना है कि कभी-कभी बच्चे अधिक आ जाने पर उनके मोबाइल नंबर लेकर वापस कर दिया जाता है। बेड खाली होते ही फोन से सूचना देकर बुलाया जाता है।
वर्तमान समय में बच्चे कम आ रहे हैं। इस कारण बेड खाली पड़े हैं। एएनएम एवं आशा बहू कुपोषित बच्चों को भर्ती कराने में दिलचस्पी नहीं ले रही हैं। इसके अलावा सीएचसी व पीएचसी के अधीक्षक भी यहां पर अति कुपोषित बच्चों को रेफर कर सकते हैं, पर ऐसा हो नहीं रहा है।
उधर, जनपद में आंगनबाड़ी केंद्रों पर नवजात शिशुओं को कुपोषण से मुक्त करने के लिए हाटकुक्ड बनाकर गरमागरम खाना खिलाने की योजना धड़ाम हो गई है। शासन से बीते तीन महीने से इस योजना के संचालन को बजट ही नहीं आया है। इसी कारण आंगनबाड़ी केंद्रों पर भी धनराशि नहीं पहुंची, जिससे हाटकुक्ड बंद पड़ा है।
इस कारण हाटकुक्ड के जरिए कुपोषण दूर करने के प्रयास हवाई साबित हो रहे हैं। जनपद स्तर के अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि बजट आवंटन के लिए शासन स्तर पर लिखा-पढ़ी चल रही है।