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पर स्मारक फिर भी न बना
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Mon, 25 Jan 2016 11:43 PM IST
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शिकार बीएसएफ के जवान ब्रह्मपाल यादव का परिवार भी है। शुरू में तो हर किसी
ने गांव जाकर हर संभव मदद का भरोसा दिलाया, पर गुजरते वक्त के साथ सब अपनी
बातें भूल गए। यही वजह रही कि आज तक देश की खातिर जान गंवाने वाले बीएसएफ
के जवान का स्मारक तक नहीं बन सका है।
हरेईपुर थाना इंदरगढ़ निवासी ब्रह्मपाल राजस्थान में 27 अक्तूबर 14 को देशद्रोहियों से लड़ते हुए कुर्बान हो गए थे। उनकी पत्नी विनीता ने बताया कि मेडिकल कालेज कैंपस में आयोजित कार्यक्रम में सीएम अखिलेश यादव ने 20 लाख रुपये का चेक उनको दिया था। उस वक्त उन्होंने परिवार के भरण पोषण को सरकारी नौकरी की मांग की थी।
तब मदद का आश्वासन मिला, पर हुआ कुछ नहीं। पेंशन के अलावा अन्य कोई मदद नहीं दी गई। ब्रह्मपाल की याद में स्मारक तक नहीं बनवाया जा सका। सरकार की ओर से कोई भूमि भी नहीं दी गई। वह कई बार सीएम को पत्र भेजकर गुहार लगा चुकी हैं पर कोई सुनवाई नहीं हो रही।
नौ वर्षीय बेटे विजय एवं छह वर्षीय बेटी शानू को पालने की जिम्मेदारी उसी के कंधे पर है। दोनों बच्चों को तिर्वा में प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही है। अक्सर उनकी फीस जमा करने तक में परेशानी होती है। भाई मुरली यादव का कहना है कि सैनिक बटालियन के अफसरों ने भी परिवार के एक सदस्य को नौकरी मिलने का मौखिक वादा किया था, जो आज तक अधूरा है। अब न तो सरकार कोई सुधि ले रही है और न ही शासन-प्रशासन।
हरेईपुर थाना इंदरगढ़ निवासी ब्रह्मपाल राजस्थान में 27 अक्तूबर 14 को देशद्रोहियों से लड़ते हुए कुर्बान हो गए थे। उनकी पत्नी विनीता ने बताया कि मेडिकल कालेज कैंपस में आयोजित कार्यक्रम में सीएम अखिलेश यादव ने 20 लाख रुपये का चेक उनको दिया था। उस वक्त उन्होंने परिवार के भरण पोषण को सरकारी नौकरी की मांग की थी।
तब मदद का आश्वासन मिला, पर हुआ कुछ नहीं। पेंशन के अलावा अन्य कोई मदद नहीं दी गई। ब्रह्मपाल की याद में स्मारक तक नहीं बनवाया जा सका। सरकार की ओर से कोई भूमि भी नहीं दी गई। वह कई बार सीएम को पत्र भेजकर गुहार लगा चुकी हैं पर कोई सुनवाई नहीं हो रही।
नौ वर्षीय बेटे विजय एवं छह वर्षीय बेटी शानू को पालने की जिम्मेदारी उसी के कंधे पर है। दोनों बच्चों को तिर्वा में प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही है। अक्सर उनकी फीस जमा करने तक में परेशानी होती है। भाई मुरली यादव का कहना है कि सैनिक बटालियन के अफसरों ने भी परिवार के एक सदस्य को नौकरी मिलने का मौखिक वादा किया था, जो आज तक अधूरा है। अब न तो सरकार कोई सुधि ले रही है और न ही शासन-प्रशासन।