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जिला अस्पताल में चार, मेडिकल कालेज में एक बच्चे की हुई मौत

Mon, 13 Jan 2020 11:48 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Mon, 13 Jan 2020 11:48 PM IST
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jila aspataal mein chaar, medikal kaalej mein ek bachche kee huee maut
जिला अस्पताल के महिला वार्ड में भर्ती प्रसूता। - फोटो : KANNAUJ
कन्नौज। कोटा, राजकोट और अहमदाबाद में बच्चों की मौत का भयावह आंकड़ा सामने आने के बाद पूरे देश में चिंता है। पिछले दिनों स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त निदेशक व लखनऊ से क्वालिटी कंट्रोलर ने जिला अस्पताल में एनआरसी, एसएनसीयू व ओटी का निरीक्षण कर व्यवस्थाएं परखी थीं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कन्नौज जिले में सीएचसी, पीएचसी पर पिछले आठ माह में गर्भावस्था के दौरान 102 व जिला अस्पताल में दो बच्चों की मौत हुई है। एसएनसीयू वार्ड में दिसंबर माह में चार नवजात बच्चों की मौत हुई है। 11 गंभीर बच्चों को रेफर किया गया है। राजकीय मेडिकल कालेज में एक बच्चे की मौत हुई।
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जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में 21 नवंबर से 20 दिसंबर तक 75 नवजात बच्चों को भर्ती किया गया। इनमें 22 नवजात प्री मैच्योर थे। 25 बच्चों का वजन कम रहा। प्राइवेट अस्पतालों से रेफर होकर आए चार बच्चों की मौत हुई है। इनमें दो नवजातों की मौत सांस लेने में दिक्कत व दो की इंफेक्शन की वजह से हुई है। राजकीय मेडिकल कालेज में दिसंबर माह में 75 प्रसव हुए। एक बच्चे की प्रसव के दौरान मौत हुई है।
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जिला अस्पताल के प्रसव वार्ड में 21 नवंबर से 20 दिसंबर तक 311 महिलाओं का प्रसव हुआ। दो बच्चों की गर्भावस्था के दौरान मौत हुई है। जिले में 11 सीएचसी व 34 पीएचसी हैं। इनमें अप्रैल से दिसंबर के बीच 14720 प्रसव कराए गए। 102 बच्चों की गर्भावस्था के दौरान मौत हुई है।
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जिला अस्पताल में तीन बाल रोग विशेषज्ञ तैनात
जिला अस्पताल में तीन बाल रोग विशेषज्ञ तैनात हैं। बाल रोग विशेषज्ञ चिकित्सकों को प्रतिदिन ओपीडी भी करनी पड़ती है। कई बार चिकित्सकों को एसएनसीयू वार्ड में भर्ती नवजात बच्चों की हालत बिगड़ने पर ओपीडी छोड़कर पहुंचना पड़ता है। ऐसे में ओपीडी में नवजात के इलाज के लिए पहुंचने वाले तमाम तीमारदारों को चिकित्सक के आने का इंतजार करना पड़ता है।
नवजातों की मौत के मामलों में कई दिक्कतें
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.सुरेश यादव का कहना है कि नवजात बच्चों की मौत के मामलों में कई तरह की दिक्कतें हैं। जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में रेडियंट वार्मर व फोटो थेरेपी मशीन की कमी है। कई बार वार्ड फुल हो जाने पर मजबूरी में नवजात बच्चों को कानपुर, सैफई के लिए रेफर करना पड़ता है। इसके अलावा वार्ड में वेंटिलेटर की सुविधा नहीं है। पिछले माह कई नवजात बच्चों की मौत प्राइवेट चिकित्सालय व राजकीय मेडिकल कालेज के चिकित्सकों की लापरवाही से हुई है। एसएनसीयू में आने वाले अधिकतर बच्चों को बिना एंबुलेंस मुहैया कराए निजी वाहनों के जरिए बिना ऑक्सीजन के भेज दिया जाता है। इससे इनकी जान चली जाती है।

जागरुकता की भी है कमी
बाल रोग विशेषज्ञ का कहना है कि तमाम मामलों में जागरुकता की कमी भी सामने आती है। घर या प्राइवेट अस्पतालों में प्रसव के बाद परिजन जच्चा-बच्चा को लेकर घर पहुंच जाते हैं। हालत बिगड़ने पर घरेलू उपचार शुरू कर देते हैं। इससे सुधरने की बजाय हालत बिगड़ जाती है। ऐसे में बीमारी कंट्रोल कर पाना कठिन होता है।
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