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घर में कैद होकर रह गया आजादी का मतवाला
अमर उजाला कन्नाैैज
Updated Tue, 11 Aug 2015 11:52 PM IST
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देश की आजादी के 69वें उत्सव में चंद दिन बाकी रह गए हैं। जश्न-ए-इंकलाब पर भाषण और उपलब्धियां गिनाने के लिए नेताओं से लेकर अफसर तैयारियों में जुट गए हैं। प्रशासन ने भी स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में होने वाले कार्यक्रमों की लंबी फेहरिस्त बना रखी है। लेकिन जिन वीर सपूतों ने यह उत्सव मनाने का मौका दिया उनके योगदान को विभागीय अफसर भूलते जा रहे हैं। सम्मान के नाम पर महज राष्ट्रीय पर्वों पर लाव-लश्कर के साथ अफसर जाते हैं और कार्यक्रम में शामिल कर अपने कर्तव्य से बरी हो जाते हैं। शहर के एकमात्र जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अनंतराम श्रीवास्तव ने यह दर्द अमर उजाला के साथ साझा किया।
मकरंदनगर स्थित बिजली घर के पीछे उनके आवास तक एक इंटरलाकिंग गली जाती है। आगे रास्ता अवरुद्ध होने से महज कूंचा बनकर रह गयी है। गली के ओर जलनिकासी का पक्का नाला बना है। सुरक्षा के लिए न तो नाले के किनारे दीवार बनवाई गयी है और न ही इसे पाटने की जरूरत समझी गई। गली में जगह-जगह टूटी नालियां, कूड़े कै ढेर बदहाली की दास्तान बयां कर रहे हैं। जब यह संवाददाता उनके घर पहुंचा तो पुत्रवधू कांती श्रीवास्तव ने गेट खोला और पूछा कि क्या आप प्रेस से हैं? आचर्श्य जताने पर वे बोलीं कि स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस के तीन-चार दिन पहले सिर्फ प्रेस वाले ही आते हैं। अफसरों को तो राष्ट्रीय पर्व के दिन ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की याद आती है।
अंदर कमरे में वे बिस्तर पर लेटे गुमनाम-सी जिंदगी जीते मिले। पुत्रवधू के जगाने पर वे उठे और निजी चिकित्सक ने उन्हें इंजेक्शन दिया। कुछ देर बाद ही वे कुर्सी पर बैठ सके। उन्होंने बताया कि जीवन के अंतिम दिन काफी दिक्कतों में गुजर रहे हैं। प्रशासन की उपेक्षा के चलते पेंशन के अलावा कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। तबियत अक्सर खराब रहती है। जब कभी छड़ी के सहारे टहलने का प्रयास करते हैं तो गली में जगह-जगह लगे मलबे के ढेर की चपेट में आकर कई बार चुटहिल हो चुके हैं। गली में कई फुट गहरा जलनिकासी का पक्का नाला बना है।
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लेकिन सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं है। आंखों की रोशनी कम होने से इसमें गिर जाने का भय रहता है। इसके चलते बहुत कम ही घर से बाहर निकलना होता है। चिकित्सीय सुविधाओं के बारे में पूछे जाने पर बताया कि कोई डाक्टर उनके घर नहीं आता है। उपचार के लिए प्राइवेट डाक्टर का सहारा लेना पड़ता है। कार्यक्रम में शामिल होने को बुलाने आए अफसरों के साथ डाक्टरों की टीम भी आती है। ये टीम इस तरह चेकअप करती है जैसे एक ही दिन में सारे मर्ज ठीक कर देगी। लेकिन राष्ट्रीय पर्व के बाद कोई अफसर या डाक्टर हाल-चाल लेने भी नहीं आता है। करीब 1700 प्रति माह इलाज पर खर्च होता है।
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मकरंदनगर स्थित बिजली घर के पीछे उनके आवास तक एक इंटरलाकिंग गली जाती है। आगे रास्ता अवरुद्ध होने से महज कूंचा बनकर रह गयी है। गली के ओर जलनिकासी का पक्का नाला बना है। सुरक्षा के लिए न तो नाले के किनारे दीवार बनवाई गयी है और न ही इसे पाटने की जरूरत समझी गई। गली में जगह-जगह टूटी नालियां, कूड़े कै ढेर बदहाली की दास्तान बयां कर रहे हैं। जब यह संवाददाता उनके घर पहुंचा तो पुत्रवधू कांती श्रीवास्तव ने गेट खोला और पूछा कि क्या आप प्रेस से हैं? आचर्श्य जताने पर वे बोलीं कि स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस के तीन-चार दिन पहले सिर्फ प्रेस वाले ही आते हैं। अफसरों को तो राष्ट्रीय पर्व के दिन ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की याद आती है।
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अंदर कमरे में वे बिस्तर पर लेटे गुमनाम-सी जिंदगी जीते मिले। पुत्रवधू के जगाने पर वे उठे और निजी चिकित्सक ने उन्हें इंजेक्शन दिया। कुछ देर बाद ही वे कुर्सी पर बैठ सके। उन्होंने बताया कि जीवन के अंतिम दिन काफी दिक्कतों में गुजर रहे हैं। प्रशासन की उपेक्षा के चलते पेंशन के अलावा कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। तबियत अक्सर खराब रहती है। जब कभी छड़ी के सहारे टहलने का प्रयास करते हैं तो गली में जगह-जगह लगे मलबे के ढेर की चपेट में आकर कई बार चुटहिल हो चुके हैं। गली में कई फुट गहरा जलनिकासी का पक्का नाला बना है।
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लेकिन सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं है। आंखों की रोशनी कम होने से इसमें गिर जाने का भय रहता है। इसके चलते बहुत कम ही घर से बाहर निकलना होता है। चिकित्सीय सुविधाओं के बारे में पूछे जाने पर बताया कि कोई डाक्टर उनके घर नहीं आता है। उपचार के लिए प्राइवेट डाक्टर का सहारा लेना पड़ता है। कार्यक्रम में शामिल होने को बुलाने आए अफसरों के साथ डाक्टरों की टीम भी आती है। ये टीम इस तरह चेकअप करती है जैसे एक ही दिन में सारे मर्ज ठीक कर देगी। लेकिन राष्ट्रीय पर्व के बाद कोई अफसर या डाक्टर हाल-चाल लेने भी नहीं आता है। करीब 1700 प्रति माह इलाज पर खर्च होता है।