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सिंघाड़े की खेती में पांच गुना मुनाफा
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तालग्राम(कन्नौज)। कम लागत में अधिक मुनाफा वाली फसलें अब किसानों की पहली पंसद हैं। इसमें सिंघाड़े की खेती भी शामिल है। इसमें किसान सिर्फ दो हजार रुपये लगाकर 10 हजार रुपये मुनाफा कमा रहे हैं।
जिले में 50 हेक्टेयर के करीब सिंघाड़े की खेती की जा रही है। तालग्राम क्षेत्र में करीब 15 हेक्टेयर खेती हो रही है। कृषि विज्ञान केंद्र अनौगी के वैज्ञानिक डॉ. वीके कनौजिया ने बताया कि समय से तालाब में रोपाई कर कम समय में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं।
सिंघाड़ा अधिक मुनाफे वाली खेती मानी जाने लगी है। किसान इसका बरसात के मौसम में लाभ उठा सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार जिन किसानों के पास तालाब है और उन्होंने जून में सिंघाड़े की पौध तैयार कर ली है।
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उपचारित कर तालाब में बेल डाल दें। 25 अगस्त तक का समय है। 60 दिन बाद सिंघाड़े तैयार होने लगते हैं। सितंबर से जनवरी तक फल तोड़ा जाता है। इस फसल में बीमारियां और कीट भी अधिक लगते हैं।
पौधों को सुरक्षित रखना अति आवश्यक है। इसमें बेलनाकार कीड़े लगते हैं जो पत्तों और फल को खाते खाते अंदर से खोखला कर देता है। इसके लिए नीम से तैयार जैविक दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए। केमिकल और रसायनिक कीटनाशकों का कम प्रयोग करें।
अमोलर के किसान सुभाष कश्यप ने बताया सिंघाड़े की खेती दो दशक से करते आ रहे हैं। उनको हर साल अच्छा मुनाफा होता है, जिससे आर्थिक स्थिति सुधरी है। उनकी देखादेखी कर गदोरा माधौनगर, दलापुर्वा, पुखरावां, सलेमपुर के कुछ किसान परंपरागत खेती छोड़ सिंघाड़े की खेती में रुचि लेने लगे हैं।
किसान हीरालाल का कहना है कि बरसात में मक्का और धान की फसलों को उगाने में अधिक खर्च आता है जबकि सिंघाड़ा खेती में एक बीघा में दो हजार की लागत में 10 हजार से अधिक रुपये की आमदनी आसानी से होती है। दूसरी फसलों में कम मुनाफा होता है। सिंघाड़ा 20 से 30 रुपये में बिक जाते हैं। एक बीघा में 10 क्विंटल तक सिंघाड़ा की पैदावार हो जाती है।
संतोष कुमार कश्यप ने बताया सिंघाड़े की खेती कराना मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। इसे आवारा मवेशी भी नुकसान नहीं पहुंचा पा रहे हैं। इस लिए लोगों का झुकाव सिंघाड़ा की खेती की ओर बढ़ रहा है।
किसान लोकेश कुमार का कहना है कि अब सिंघाड़े की मांग हर वर्ष बढ़ती जा रही है। इसके आटे का प्रयोग व्रत में खाने में किया जाता है। पीछले वर्ष सिंघाड़ा 30 रुपये किलो तक बिका था। इस कारण आटे की कीमत बाजार में 200 रुपये से 220 रुपये तक पहुंच गई थी।
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जिले में 50 हेक्टेयर के करीब सिंघाड़े की खेती की जा रही है। तालग्राम क्षेत्र में करीब 15 हेक्टेयर खेती हो रही है। कृषि विज्ञान केंद्र अनौगी के वैज्ञानिक डॉ. वीके कनौजिया ने बताया कि समय से तालाब में रोपाई कर कम समय में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं।
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सिंघाड़ा अधिक मुनाफे वाली खेती मानी जाने लगी है। किसान इसका बरसात के मौसम में लाभ उठा सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार जिन किसानों के पास तालाब है और उन्होंने जून में सिंघाड़े की पौध तैयार कर ली है।
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उपचारित कर तालाब में बेल डाल दें। 25 अगस्त तक का समय है। 60 दिन बाद सिंघाड़े तैयार होने लगते हैं। सितंबर से जनवरी तक फल तोड़ा जाता है। इस फसल में बीमारियां और कीट भी अधिक लगते हैं।
पौधों को सुरक्षित रखना अति आवश्यक है। इसमें बेलनाकार कीड़े लगते हैं जो पत्तों और फल को खाते खाते अंदर से खोखला कर देता है। इसके लिए नीम से तैयार जैविक दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए। केमिकल और रसायनिक कीटनाशकों का कम प्रयोग करें।
अमोलर के किसान सुभाष कश्यप ने बताया सिंघाड़े की खेती दो दशक से करते आ रहे हैं। उनको हर साल अच्छा मुनाफा होता है, जिससे आर्थिक स्थिति सुधरी है। उनकी देखादेखी कर गदोरा माधौनगर, दलापुर्वा, पुखरावां, सलेमपुर के कुछ किसान परंपरागत खेती छोड़ सिंघाड़े की खेती में रुचि लेने लगे हैं।
किसान हीरालाल का कहना है कि बरसात में मक्का और धान की फसलों को उगाने में अधिक खर्च आता है जबकि सिंघाड़ा खेती में एक बीघा में दो हजार की लागत में 10 हजार से अधिक रुपये की आमदनी आसानी से होती है। दूसरी फसलों में कम मुनाफा होता है। सिंघाड़ा 20 से 30 रुपये में बिक जाते हैं। एक बीघा में 10 क्विंटल तक सिंघाड़ा की पैदावार हो जाती है।
संतोष कुमार कश्यप ने बताया सिंघाड़े की खेती कराना मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। इसे आवारा मवेशी भी नुकसान नहीं पहुंचा पा रहे हैं। इस लिए लोगों का झुकाव सिंघाड़ा की खेती की ओर बढ़ रहा है।
किसान लोकेश कुमार का कहना है कि अब सिंघाड़े की मांग हर वर्ष बढ़ती जा रही है। इसके आटे का प्रयोग व्रत में खाने में किया जाता है। पीछले वर्ष सिंघाड़ा 30 रुपये किलो तक बिका था। इस कारण आटे की कीमत बाजार में 200 रुपये से 220 रुपये तक पहुंच गई थी।