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वर्क फ्रॉम होम और मोबाइल ने तोड़े पति-पत्नी के रिश्ते, समझौते का रिचार्ज भी काम न आया
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झांसी। कोरोना काल में वर्क फ्रॉम होम और मोबाइल भले ही लोगों की लाइफलाइन बना हो, लेकिन पति-पत्नी के आपसी रिश्ते तोड़ने में भी इसने कोई कसर नहीं छोड़ी। इनके बिगड़े संबंधों का धागा कुछ इस तरह से उलझा है कि बार-बार समझौते का रिचार्ज भी इनके रिश्तों को जोड़ नहीं पाया। असल में वर्ष 2018-2019 से अब तक जिला प्रोबेशन अधिकारी के पास घरेलू हिंसा आदि से संबंधित ऐसे एक हजार से अधिक मामले आ चुके हैं जिनमें पति-पत्नी अब एक-दूसरे के साथ रहना नहीं चाहते हैं। इनमें अधिकांश केस वर्क फ्रॉम होम और मोबाइल के चक्कर में पति-पत्नी का एक-दूसरे को वक्त न देना, कई-कई घंटे ऑनलाइन रहना, पासवर्ड न बताना, तनाव, बेवजह मारपीट करने के अलावा एक-दूसरे पर शक करने के हैं।
घरेलू हिंसा के केस दर्ज होना कोई नई बात नहीं है। अक्सर पहले जो मामले दर्ज होते थे उनमें लगभग हर केस में पत्नी द्वारा दहेज में मोटी रकम, बाइक और जेवरात मांगने के अलावा मारपीट के आरोप लगाए जाते थे। पति भी तमाम आरोप लगाते थे, लेकिन अब मोबाइल युग में पति-पत्नी की शिकायतों और आरोपों का दायरा भी बदला है। जिला प्रोबेशन अधिकारी के कार्यालय में सीधे और ऊपर से जांच के लिए आने वाले घरेलू हिंसा के मामलों में अब मोबाइल अहम भूमिका में है। इधर, विभाग में जो केस आ रहे हैं उनमें अधिकांश मोबाइल पर लगातार बातें, मोबाइल छुपाना, घर-परिवार पर ध्यान न देना और शादी से इतर किसी दूसरे से संबंध होने के शक से जुड़ी शिकायतें सबसे अधिक हैं। उधर, विभाग में 2018-2019 से अप्रैल 2022 तक घरेलू हिंसा के 1075 मामले आ चुके है। विभाग की मानें तो काउंसलिंग के साथ-साथ जोड़ों को आशा ज्योति केंद्र (वन स्टॉप सेंटर) भी भेजा जा रहा, लेकिन इनमें समझौता शायद ही किसी में हुआ हो। अधिकांश मामले अब कोर्ट पहुंच चुके हैं।
समझौता कराने की तमाम कोशिशें रहती है
विभाग में कोरोना काल से अब तक ऐसे तमाम केस आए जिनमें पति-पत्नी में समझौता कराने की कोशिशें की गईं लेकिन दोनों तरफ से कोई नहीं माना। कई में उत्पीड़न सामने आया, जबकि कई के पीछे वर्क फ्रॉम होम के दौरान पति का दिन भर काम में बिजी रहना, दोनों में लगाव न होना, कामकाजी पति-पत्नी का एक-दूसरे पर शक व कड़ी निगरानी रखना जैसे कई कारण सामने आए हैं।
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नंदलाल सिंह, जिला प्रोबेशन अधिकारी
ये भी हैं बड़े कारण
-पति-पत्नी को एक-दूसरे को समय न दे पाना।
-भावात्मक जुड़ाव कम होना, बाहरी दिखावे से लगाव।
-जिंदगी में छोटी-छोटी बातों को तूल देना, अहम के कारण तनाव बढ़ना।
-जरूरत से अधिक इच्छाएं, आमदनी कम, खर्च व समस्याएं अधिक।
-परिवार में मायके और ससुराल वालों का जरूरत से अधिक हस्ताक्षेप।
-संयुक्त परिवारों का टूटना, पति-पत्नी का अकेले रहना।
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छह वर्षों में आए केस
-2018-2019 249
-2019-2020 306
-2020-2021 221
-2021-2022 299
-अप्रैल 2022-2023 04 (अबतक)
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घरेलू हिंसा के केस दर्ज होना कोई नई बात नहीं है। अक्सर पहले जो मामले दर्ज होते थे उनमें लगभग हर केस में पत्नी द्वारा दहेज में मोटी रकम, बाइक और जेवरात मांगने के अलावा मारपीट के आरोप लगाए जाते थे। पति भी तमाम आरोप लगाते थे, लेकिन अब मोबाइल युग में पति-पत्नी की शिकायतों और आरोपों का दायरा भी बदला है। जिला प्रोबेशन अधिकारी के कार्यालय में सीधे और ऊपर से जांच के लिए आने वाले घरेलू हिंसा के मामलों में अब मोबाइल अहम भूमिका में है। इधर, विभाग में जो केस आ रहे हैं उनमें अधिकांश मोबाइल पर लगातार बातें, मोबाइल छुपाना, घर-परिवार पर ध्यान न देना और शादी से इतर किसी दूसरे से संबंध होने के शक से जुड़ी शिकायतें सबसे अधिक हैं। उधर, विभाग में 2018-2019 से अप्रैल 2022 तक घरेलू हिंसा के 1075 मामले आ चुके है। विभाग की मानें तो काउंसलिंग के साथ-साथ जोड़ों को आशा ज्योति केंद्र (वन स्टॉप सेंटर) भी भेजा जा रहा, लेकिन इनमें समझौता शायद ही किसी में हुआ हो। अधिकांश मामले अब कोर्ट पहुंच चुके हैं।
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समझौता कराने की तमाम कोशिशें रहती है
विभाग में कोरोना काल से अब तक ऐसे तमाम केस आए जिनमें पति-पत्नी में समझौता कराने की कोशिशें की गईं लेकिन दोनों तरफ से कोई नहीं माना। कई में उत्पीड़न सामने आया, जबकि कई के पीछे वर्क फ्रॉम होम के दौरान पति का दिन भर काम में बिजी रहना, दोनों में लगाव न होना, कामकाजी पति-पत्नी का एक-दूसरे पर शक व कड़ी निगरानी रखना जैसे कई कारण सामने आए हैं।
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नंदलाल सिंह, जिला प्रोबेशन अधिकारी
ये भी हैं बड़े कारण
-पति-पत्नी को एक-दूसरे को समय न दे पाना।
-भावात्मक जुड़ाव कम होना, बाहरी दिखावे से लगाव।
-जिंदगी में छोटी-छोटी बातों को तूल देना, अहम के कारण तनाव बढ़ना।
-जरूरत से अधिक इच्छाएं, आमदनी कम, खर्च व समस्याएं अधिक।
-परिवार में मायके और ससुराल वालों का जरूरत से अधिक हस्ताक्षेप।
-संयुक्त परिवारों का टूटना, पति-पत्नी का अकेले रहना।
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छह वर्षों में आए केस
-2018-2019 249
-2019-2020 306
-2020-2021 221
-2021-2022 299
-अप्रैल 2022-2023 04 (अबतक)