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क्रांतिकारियों से साथ बम बनाते समय विस्फोट में उड़ गए थे रामसेवक रावत के हाथ के परखच्चे

Thu, 12 Aug 2021 01:48 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 12 Aug 2021 01:48 AM IST
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While making a bomb with the revolutionaries, the blast was flying in the blast.
झांसी। बचपन में गांव से पढ़ाई करने झांसी आए और क्रांतिकारी डा. भगवानदास माहौर के संपर्क में आकर सातार नदी के तट पर चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में चलने वाली क्रातिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए।पृथ्वीपुर के पास स्थित मजल गांव में जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामसेवक रावत महज पंद्रह वर्ष की उम्र में ही अंग्रेजों की आंख की किरकिरी बन गए तथा बम रखने के जुर्म में अंग्रेजी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। जवान होते होते 18 वर्ष की उम्र में क्रांतिकारियों के साथ बम बनाते समय बारूद फटने से उनका एक हाथ शरीर से अलग हो गया था। इसके बाद भी उन्हें कई बार जेल यात्रा करना पड़ी।
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सातार तट पर चंद्रशेखर आजाद के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में रहते थे शामिल
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामसेवक रावत के पौत्र पियूष रावत बताते हैं कि उनके पिताजी बताते थे कि दादा जी रामसेवक रावत बचपन से ही देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित थे। आठ वर्ष की उम्र में उनके माता पिता की निधन हो गया था, वह पढ़ाई करने के लिए झांसी आ गए यहां पर उनक ी मुलाकात डा. भगवानदास माहौर और सदाशिवराव मलकापुरकर से हुई इन्हीं के मार्फत वह सातारतट पर अज्ञातवास काट रहे चंद्रशेखर आजाद तक पहुंचे। अछारह वर्ष की नई युवा उम्र को देखते हुए क्रांतिकारियों ने इन्हें सातार नदी के जंगल में ही बम बनाने की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया। अभी यह पूरी तरह से प्रशिक्षित भी नहीं हो पाए थे कि एक दिन अचानक बम बनाते समय बारूद फटने से रामसेवक रावत का हाथ के परखच्चे उड़ गए। क्रांतिकारियों ने उपचार करवा कर उनकी जान तो किसी तरह बचा ली पर आजादी के लिए उन्होंने जो खोया उस हाथ की कीमत उन्हें जीवनपर्यंत चुकानी पड़ी।
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आजादी के बाद सरकार ने ताम्रपत्र भेंटकर किया था सम्मानित
पृथ्वीपुर क्षेत्र के निवासी कृपाराम यादव बताते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामसेवक रावत के स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान के लिए देश आजाद होने के बाद उन्हें भारत सरकार की ओर से ताम्रपत्र भेंटकर सम्मानित किया गया। जिस समय रामसवेक रावत बम बनाते समय गंभीर रूप से घायल हुए तथा उन्हें आजादी की लड़ाई में जेल जाना पड़ उस समय उनकी दो दवान बहनों की शादी करनी थी, ऐसे हालत में उनके छोटे भाई रामदास रावत ने झांसी में ही फुटपाथ पर कपड़े की दुकान लगाकर किसी तरह घर का संचालन किया तथा दोनों बहनों की शादी भी की, हलांकि इन शादियों में क्रांतिकारियों में भी चोरी छुपे पूरा सहयोग किया। रामसेवक रावत लगातार स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे और इधर घर की सारी जिम्मेदारी उनके छोटे भाई रामदास निभाते रहे। आजादी के बाद उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित किया गया तथा वह साहित्यिक गतिविधियों में भी शामिल रहे।
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