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पानी बंटवारे के विवाद में उलझी केन-बेतवा परियोजना
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झांसी। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक जल परियोजना अलग-अलग फसली सीजन में जल बंटवारा तय न हो पाने से उप्र एवं मप्र के बीच अटकी हुई है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान के एक बार फिर 750 एमसीएस पानी छोड़ने की बात कहने से विवाद दोबारा सतह पर आ गया। हालांकि, अफसरों का कहना है कि इसका असर नहीं होगा।
बुंदेलखंड के लिहाज से यह जल परियोजना काफी अहम है। इसके जरिए बुंदेलखंड की करीब 13695 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। इसका फायदा झांसी के असिंचित इलाकों को भी मिलेगा। वर्ष 2005 में एमओयू के बाद से मामला जल बंटवारे को लेकर मप्र-उप्र के बीच फंसा है। सिंचाई विभाग के अधिकारियों के मुताबिक दोनों राज्यों में 1700-1700 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) पानी बंटवारा तय हो गया। लेकिन, मध्य प्रदेश ने नया पेच फंसा दिया। एमपी पानी का अधिकांश हिस्सा बारिश के दिनों में छोड़ना चाहता है। जबकि, उप्र इसके लिए राजी नहीं। सिंचाई अफसरों का कहना है बारिश के दौरान उप्र के पास भी भरपूर पानी रहता है, ऐसे में इस शर्त का कोई फायदा नहीं। फसली सीजन पर बात तय हुई लेकिन, मप्र रबी की फसली सीजन के लिए सिर्फ 750 एमसीएम पानी ही देने पर अड़ा है। जबकि, उप्र करीब 950 एमसीएम पानी की मांग कर रहा है। केंद्र सरकार की ओर से बीच की राह निकालने को दोनों राज्यों के बीच बात चल रही, लेकिन इसी विवाद के न सुलझने से परियोजना आगे नहीं बढ़ रही।
मप्र नहीं कर रहा पूर्व स्थापित परंपराओं की परवाह
करीब छह हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना का मुख्य बांध पन्ना के टाइगर रिजर्व के डोंदन गांव पर बनाया जाना है। यहां करीब 2700 एमसीएम पानी स्टोर होगा। मप्र में बांध बनने की वजह से मप्र अधिक पानी पर दावा ठोंक रहा। जबकि इसके पहले बन चुकी राजघाट परियोजना ललितपुर उप्र में होने के बावजूद उससे दोनों ही राज्यों को पचास-पचास फीसदी पानी मिलता है। इसके अलावा इस पूरी परियोजना का बजट केंद्र सरकार से मिल रहा, इस वजह से भी यूपी पानी पर आधी हिस्सेदारी का दावा कर रहा।
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जल बंटवारे को लेकर उच्च स्तर पर मामला विचाराधीन है। दीपावली के बाद दोनों पक्षों के साथ बैठक प्रस्तावित है। दोनों पक्ष बैठकर आपस में मामला जल्द सुलझा लेंगे। इस परियोजना के जल्द आरंभ होने से दोनों राज्यों को फायदा मिलेगा। त्रिलोक चंद्र शर्मा, मुख्य अभियंता, एल-वन
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बुंदेलखंड के लिहाज से यह जल परियोजना काफी अहम है। इसके जरिए बुंदेलखंड की करीब 13695 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। इसका फायदा झांसी के असिंचित इलाकों को भी मिलेगा। वर्ष 2005 में एमओयू के बाद से मामला जल बंटवारे को लेकर मप्र-उप्र के बीच फंसा है। सिंचाई विभाग के अधिकारियों के मुताबिक दोनों राज्यों में 1700-1700 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) पानी बंटवारा तय हो गया। लेकिन, मध्य प्रदेश ने नया पेच फंसा दिया। एमपी पानी का अधिकांश हिस्सा बारिश के दिनों में छोड़ना चाहता है। जबकि, उप्र इसके लिए राजी नहीं। सिंचाई अफसरों का कहना है बारिश के दौरान उप्र के पास भी भरपूर पानी रहता है, ऐसे में इस शर्त का कोई फायदा नहीं। फसली सीजन पर बात तय हुई लेकिन, मप्र रबी की फसली सीजन के लिए सिर्फ 750 एमसीएम पानी ही देने पर अड़ा है। जबकि, उप्र करीब 950 एमसीएम पानी की मांग कर रहा है। केंद्र सरकार की ओर से बीच की राह निकालने को दोनों राज्यों के बीच बात चल रही, लेकिन इसी विवाद के न सुलझने से परियोजना आगे नहीं बढ़ रही।
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मप्र नहीं कर रहा पूर्व स्थापित परंपराओं की परवाह
करीब छह हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना का मुख्य बांध पन्ना के टाइगर रिजर्व के डोंदन गांव पर बनाया जाना है। यहां करीब 2700 एमसीएम पानी स्टोर होगा। मप्र में बांध बनने की वजह से मप्र अधिक पानी पर दावा ठोंक रहा। जबकि इसके पहले बन चुकी राजघाट परियोजना ललितपुर उप्र में होने के बावजूद उससे दोनों ही राज्यों को पचास-पचास फीसदी पानी मिलता है। इसके अलावा इस पूरी परियोजना का बजट केंद्र सरकार से मिल रहा, इस वजह से भी यूपी पानी पर आधी हिस्सेदारी का दावा कर रहा।
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जल बंटवारे को लेकर उच्च स्तर पर मामला विचाराधीन है। दीपावली के बाद दोनों पक्षों के साथ बैठक प्रस्तावित है। दोनों पक्ष बैठकर आपस में मामला जल्द सुलझा लेंगे। इस परियोजना के जल्द आरंभ होने से दोनों राज्यों को फायदा मिलेगा। त्रिलोक चंद्र शर्मा, मुख्य अभियंता, एल-वन