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सुरक्षा बंदोबस्त नहीं दुरुस्त, इसलिए होते हादसे
अमर उजाला ब्यूराो
Updated Mon, 21 Aug 2017 12:16 AM IST
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railway jhansi news
- फोटो : demo pic
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मुजफ्फरनगर रेल हादसे में रेल प्रशासन की घोर लापरवाही सामने आई है। आशंका है कि ब्लाक न मिलने के बावजूद पटरियों पर काम कराया जा रहा था। मगर, ऐसा पहली बार नहीं हुआ, अक्सर पीडब्लूआई (रेल पथ निरीक्षक) ब्लाक न मिलने पर जोखिम उठाकर काम करते हैं। रेलवे की भाषा में ब्लाक वह समयावधि है जिसमें ट्रैफिक रोककर मरम्मत का काम किया जाता है। यह जोखिम सुरक्षा के बंदोबस्त करने के बाद ही उठाया जाता है। अगर यहीं कदम खतौली में उठाए गए होते तो शायद भीषण हादसे को रोका जा सकता था।
रेल पटरियों (ट्रैक) के रखरखाव का काम रेल पथ निरीक्षक के नेतृत्व में होता हैं। ट्रैक पर लगातार बढ़ते ट्रैफिक के कारण पीडब्लूआई के लिए रखरखाव करना मुश्किल होता जा रहा है। एक के बाद एक ट्रेन ट्रैक पर दौड़ रही हैं। पटरियों पर काम कराने के लिए परिचालन विभाग से ब्लाक लेना पड़ता है। मगर, परिचालन विभाग कहता है कि वे गाड़ियां लेट नहीं कर सकते। जैसे कि, किसी पटरी पर वेल्डिंग करनी है तो कम से कम डेढ़ घंटे का ब्लाक चाहिए। ऐसी स्थिति में पीडब्लूआई को तमाम आग्रह के बाद ही ब्लाक मिल पाता है। इस कारण अक्सर पीडब्लूआई छोटे-मोटे काम कराने के लिए ब्लाक नहीं लेते हैं। वे अपने हिसाब से पता कर लेते है कि ट्रेन गुजरने में कितना वक्त है? उस समय का अंतर निकालकर काम शुरू कर देते हैं। हालांकि, पीडब्लूआई बिना ब्लाक के काम करते समय सुरक्षा के इंतजामों का पूरा ध्यान रखने की कोशिश करते हैं, ताकि कोई हादसा नहीं हो सके।
ये हैं सुरक्षा के इंतजाम
- सिंगल लाइन पर छह सौ और बारह सौ मीटर की दूरी पर दोनों तरफ लाल बैनर फ्लैग लगाने पड़ते हैं।
- सिंगल लाइन पर दोनों तरफ तीन-तीन ट्रैकमैन और डबल लाइन पर तीन ट्रैकमैन लाल झंडी लेकर निश्चित दूरी पर खड़े करने पड़ते हैं।
- कर्मचारी न होने पर खतरे का संकेत देने के लिए आठ सौ मीटर की दूरी पर पटाखे भी लगाए जाते हैं।
ये देना पड़ता है ध्यान
- कहीं पटरी चटकी तो नहीं
- स्लीपर तो खराब नहीं हो गए
- चाबियां ढीली तो नहीं
- ज्वाइंट पर वेल्डिंग की जरूरत तो नहीं
- क्रासिंग प्वाइंट ठीक से काम कर रहे कि नहीं
- पटरी बदलने की जरूरत तो नहीं
ये दिक्कतें
- पटरियों के रखरखाव के लिए समय पर नहीं मिलते ब्लाक
- नई भर्ती के ट्रैकमैन शाम पांच बजे के बाद काम करने में करते हैं आनाकानी
- पटरियों पर काम करने वाली गैंग में नहीं पर्याप्त कर्मचारी
- पटरी की जगह अफसरों के बंगलों पर काम कर रहे बड़ी संख्या में ट्रैकमैन
- कर्मचारियों की कमी से कई सेक्शन में रात में नहीं हो पाती पेट्रोलिंग
मजबूरी समझे प्रशासन
रेल प्रशासन को पटरियों के रखरखाव पर विशेष ध्यान देने की जरूरत हैं, क्योंकि ट्रेनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और पीडब्लूआई का काम उतना ही मुश्किल होता जा रहा है। पिछले एक साल में जितने भी रेल हादसे हुए इसी तरह की चूक सामने आई। रेल प्रशासन को पीडब्लूआई की मजबूरी को समझना चाहिए।
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आरएस दुबे, रेलवे विशेषज्ञ।
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मुजफ्फरनगर रेल हादसे में रेल प्रशासन की घोर लापरवाही सामने आई है। आशंका है कि ब्लाक न मिलने के बावजूद पटरियों पर काम कराया जा रहा था। मगर, ऐसा पहली बार नहीं हुआ, अक्सर पीडब्लूआई (रेल पथ निरीक्षक) ब्लाक न मिलने पर जोखिम उठाकर काम करते हैं। रेलवे की भाषा में ब्लाक वह समयावधि है जिसमें ट्रैफिक रोककर मरम्मत का काम किया जाता है। यह जोखिम सुरक्षा के बंदोबस्त करने के बाद ही उठाया जाता है। अगर यहीं कदम खतौली में उठाए गए होते तो शायद भीषण हादसे को रोका जा सकता था।
रेल पटरियों (ट्रैक) के रखरखाव का काम रेल पथ निरीक्षक के नेतृत्व में होता हैं। ट्रैक पर लगातार बढ़ते ट्रैफिक के कारण पीडब्लूआई के लिए रखरखाव करना मुश्किल होता जा रहा है। एक के बाद एक ट्रेन ट्रैक पर दौड़ रही हैं। पटरियों पर काम कराने के लिए परिचालन विभाग से ब्लाक लेना पड़ता है। मगर, परिचालन विभाग कहता है कि वे गाड़ियां लेट नहीं कर सकते। जैसे कि, किसी पटरी पर वेल्डिंग करनी है तो कम से कम डेढ़ घंटे का ब्लाक चाहिए। ऐसी स्थिति में पीडब्लूआई को तमाम आग्रह के बाद ही ब्लाक मिल पाता है। इस कारण अक्सर पीडब्लूआई छोटे-मोटे काम कराने के लिए ब्लाक नहीं लेते हैं। वे अपने हिसाब से पता कर लेते है कि ट्रेन गुजरने में कितना वक्त है? उस समय का अंतर निकालकर काम शुरू कर देते हैं। हालांकि, पीडब्लूआई बिना ब्लाक के काम करते समय सुरक्षा के इंतजामों का पूरा ध्यान रखने की कोशिश करते हैं, ताकि कोई हादसा नहीं हो सके।
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ये हैं सुरक्षा के इंतजाम
- सिंगल लाइन पर छह सौ और बारह सौ मीटर की दूरी पर दोनों तरफ लाल बैनर फ्लैग लगाने पड़ते हैं।
- सिंगल लाइन पर दोनों तरफ तीन-तीन ट्रैकमैन और डबल लाइन पर तीन ट्रैकमैन लाल झंडी लेकर निश्चित दूरी पर खड़े करने पड़ते हैं।
- कर्मचारी न होने पर खतरे का संकेत देने के लिए आठ सौ मीटर की दूरी पर पटाखे भी लगाए जाते हैं।
ये देना पड़ता है ध्यान
- कहीं पटरी चटकी तो नहीं
- स्लीपर तो खराब नहीं हो गए
- चाबियां ढीली तो नहीं
- ज्वाइंट पर वेल्डिंग की जरूरत तो नहीं
- क्रासिंग प्वाइंट ठीक से काम कर रहे कि नहीं
- पटरी बदलने की जरूरत तो नहीं
ये दिक्कतें
- पटरियों के रखरखाव के लिए समय पर नहीं मिलते ब्लाक
- नई भर्ती के ट्रैकमैन शाम पांच बजे के बाद काम करने में करते हैं आनाकानी
- पटरियों पर काम करने वाली गैंग में नहीं पर्याप्त कर्मचारी
- पटरी की जगह अफसरों के बंगलों पर काम कर रहे बड़ी संख्या में ट्रैकमैन
- कर्मचारियों की कमी से कई सेक्शन में रात में नहीं हो पाती पेट्रोलिंग
मजबूरी समझे प्रशासन
रेल प्रशासन को पटरियों के रखरखाव पर विशेष ध्यान देने की जरूरत हैं, क्योंकि ट्रेनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और पीडब्लूआई का काम उतना ही मुश्किल होता जा रहा है। पिछले एक साल में जितने भी रेल हादसे हुए इसी तरह की चूक सामने आई। रेल प्रशासन को पीडब्लूआई की मजबूरी को समझना चाहिए।
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आरएस दुबे, रेलवे विशेषज्ञ।