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शौचालय तो नहीं बने, पैसे जरूर फंस गए
ब्यूरो
Updated Sat, 05 Dec 2015 12:55 AM IST
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झांसी। पंचायत सचिवों की लापरवाही के कारण वर्ष 2014-15 में विभिन्न योजनाओं में चयनित आठ सौ लाभार्थियों के घरों में अब तक शौचालय नहीं बन पाए है। इन लोगों का पैसा जरूर इस मद में फंस गया है। इस स्थिति को देखते हुए मुख्य विकास अधिकारी ने लाभार्थियों के खाते में पैसा पहुंचाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं। सचिवों पर भी कार्रवाई का डंडा चलाने की तैयारी की जा रही है।
पिछले वित्तीय वर्ष तक ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण का काम निर्मल भारत अभियान और मनरेगा मिलकर करते थे। एक शौचालय के लिए दस हजार रुपये का बजट निर्धारित था, इसमें 46 सौ रुपये निर्मल भारत अभियान से व 45 सौ रुपये मनरेगा से दिया जाता था।
नौ सौ रुपये लाभार्थी अंश होता था। पंचायत सचिवों ने शौचालय निर्माण तो शुरू करा दिया, लेकिन मनरेगा की वेबसाइट पर करीब आठ सौ शौचालयों की काम की आईडी (कार्य प्रारंभ की सूचना) नहीं बनाई। मनरेगा के नियमानुसार काम शुरू करने से पहले वेबसाइट पर आईडी बनाना आवश्यक होता है। आईडी न बनने के कारण आठ सौ लाभार्थियों को मनरेगा के मद के 4500 रुपये नहीं मिल सके।
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इधर, वित्तीय वर्ष 2015-16 में केंद्र सरकार ने शौचालय निर्माण की योजना में तब्दीली कर दी। अब नये नियमों के अनुसार मनरेगा और निर्मल भारत अलग- अलग शौचालय बनाएगा। दोनों को शौचालय निर्माण के लिए नये नियमों के अनुसार 12-12 हजार रुपये खर्च करने होंगे। इस नियम के लागू होते ही पिछले वित्तीय वर्ष के काम लटक गए हैं। आईडी जनरेट न होने के कारण पिछले वर्ष के शौचालयों के लिए पैसा अब तक नहीं मिल सका है। ऐसे में सभी शौचालय अधूरे पड़े हैं।
सीडीओ संजय कुमार ने सभी पंचायत सचिवों को चेतावनी दी है कि बीस दिसंबर तक शौचालय पूर्ण कराकर उसकी जानकारी मनरेगा की वेबसाइट पर अंकित कराएं। 21 दिसंबर को होने वाली सचिवों की समीक्षा बैठक में जिन सचिवों का काम अधूरा मिला उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने लंबित भुगतान लाभार्थियों को दिलाने के लिए शासन को पत्र लिखकर दिशा-निर्देश मांगा है।
इसलिए हुआ खेल
दो अक्तूबर 2014 के पहले तक शौचालय निर्माण के लिए दस हजार रुपये का बजट निर्धारित था। दो अक्तूबर 2014 के बाद केंद्र सरकार ने शौचालय का बजट 12 हजार रुपये कर दिया था। बजट बढ़ने की सुगबुगाहट पहले से चल रही थी, इस कारण सचिवों ने काम की आईडी जनरेट नहीं कराई थी। उन्हें उम्मीद थी कि नये काम दिखाकर 10 की जगह 12 हजार रुपये निकाले जाएंगे। लेकिन, शासन से स्पष्ट निर्देश न आने के कारण पिछले वित्तीय वर्ष में इसे शुरू नहीं किया गया और पंचायत सचिव बढ़े पैसे के इंतजार में आईडी जनरेट कराने से चूक गए। उनकी यह चूक अब लाभार्थियों पर भारी पड़ रही है।
अलग-अलग मिला लक्ष्य
मनरेगा और निर्मल भारत अभियान के अलग-अलग होने के बाद दोनों विभागों के मुखियाओं को लक्ष्य भी अलग-अलग मिल गए हैं। जिला प्रशासन ने निर्मल भारत अभियान के तहत 8000 शौचालय का लक्ष्य डा. राममनोहर लोहिया समग्र ग्रामों, जनप्रतिनिधि व अफसरों द्वारा गोद लिए गए कुपोषित गांवों में पूरा करने को कहा है। वहीं, मनरेगा के तहत जिले के विभिन्न ब्लाकों के 64 गांव में 2600 शौचालय बनाने का लक्ष्य दिया गया है।
‘पंचायत सचिवों की लापरवाही के कारण लाभार्थियों का पैसा फंसा है। मनरेगा में बिना आईडी जनरेट किए कार्य शुरू नहीं माना जाता है। सीडीओ ने शासन से पत्राचार किया है। शासन से दिशा-निर्देश मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।’
विकास मिश्रा, उपायुक्त, मनरेगा।
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पिछले वित्तीय वर्ष तक ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण का काम निर्मल भारत अभियान और मनरेगा मिलकर करते थे। एक शौचालय के लिए दस हजार रुपये का बजट निर्धारित था, इसमें 46 सौ रुपये निर्मल भारत अभियान से व 45 सौ रुपये मनरेगा से दिया जाता था।
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नौ सौ रुपये लाभार्थी अंश होता था। पंचायत सचिवों ने शौचालय निर्माण तो शुरू करा दिया, लेकिन मनरेगा की वेबसाइट पर करीब आठ सौ शौचालयों की काम की आईडी (कार्य प्रारंभ की सूचना) नहीं बनाई। मनरेगा के नियमानुसार काम शुरू करने से पहले वेबसाइट पर आईडी बनाना आवश्यक होता है। आईडी न बनने के कारण आठ सौ लाभार्थियों को मनरेगा के मद के 4500 रुपये नहीं मिल सके।
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इधर, वित्तीय वर्ष 2015-16 में केंद्र सरकार ने शौचालय निर्माण की योजना में तब्दीली कर दी। अब नये नियमों के अनुसार मनरेगा और निर्मल भारत अलग- अलग शौचालय बनाएगा। दोनों को शौचालय निर्माण के लिए नये नियमों के अनुसार 12-12 हजार रुपये खर्च करने होंगे। इस नियम के लागू होते ही पिछले वित्तीय वर्ष के काम लटक गए हैं। आईडी जनरेट न होने के कारण पिछले वर्ष के शौचालयों के लिए पैसा अब तक नहीं मिल सका है। ऐसे में सभी शौचालय अधूरे पड़े हैं।
सीडीओ संजय कुमार ने सभी पंचायत सचिवों को चेतावनी दी है कि बीस दिसंबर तक शौचालय पूर्ण कराकर उसकी जानकारी मनरेगा की वेबसाइट पर अंकित कराएं। 21 दिसंबर को होने वाली सचिवों की समीक्षा बैठक में जिन सचिवों का काम अधूरा मिला उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने लंबित भुगतान लाभार्थियों को दिलाने के लिए शासन को पत्र लिखकर दिशा-निर्देश मांगा है।
इसलिए हुआ खेल
दो अक्तूबर 2014 के पहले तक शौचालय निर्माण के लिए दस हजार रुपये का बजट निर्धारित था। दो अक्तूबर 2014 के बाद केंद्र सरकार ने शौचालय का बजट 12 हजार रुपये कर दिया था। बजट बढ़ने की सुगबुगाहट पहले से चल रही थी, इस कारण सचिवों ने काम की आईडी जनरेट नहीं कराई थी। उन्हें उम्मीद थी कि नये काम दिखाकर 10 की जगह 12 हजार रुपये निकाले जाएंगे। लेकिन, शासन से स्पष्ट निर्देश न आने के कारण पिछले वित्तीय वर्ष में इसे शुरू नहीं किया गया और पंचायत सचिव बढ़े पैसे के इंतजार में आईडी जनरेट कराने से चूक गए। उनकी यह चूक अब लाभार्थियों पर भारी पड़ रही है।
अलग-अलग मिला लक्ष्य
मनरेगा और निर्मल भारत अभियान के अलग-अलग होने के बाद दोनों विभागों के मुखियाओं को लक्ष्य भी अलग-अलग मिल गए हैं। जिला प्रशासन ने निर्मल भारत अभियान के तहत 8000 शौचालय का लक्ष्य डा. राममनोहर लोहिया समग्र ग्रामों, जनप्रतिनिधि व अफसरों द्वारा गोद लिए गए कुपोषित गांवों में पूरा करने को कहा है। वहीं, मनरेगा के तहत जिले के विभिन्न ब्लाकों के 64 गांव में 2600 शौचालय बनाने का लक्ष्य दिया गया है।
‘पंचायत सचिवों की लापरवाही के कारण लाभार्थियों का पैसा फंसा है। मनरेगा में बिना आईडी जनरेट किए कार्य शुरू नहीं माना जाता है। सीडीओ ने शासन से पत्राचार किया है। शासन से दिशा-निर्देश मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।’
विकास मिश्रा, उपायुक्त, मनरेगा।