{"_id":"5eea640a8ebc3e42e917699d","slug":"today-burn-depak-jhansi-news-jhs169327874","type":"story","status":"publish","title_hn":"रानी की याद में आज दीप जलाएं, फोटो हमें उपलब्ध कराएं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
रानी की याद में आज दीप जलाएं, फोटो हमें उपलब्ध कराएं
विज्ञापन
रानी लक्ष्मीबाई
- फोटो : ???? ??????????
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
झांसी। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की बृहस्पतिवार को 162वीं पुण्य तिथि ‘अमर उजाला’ अनूठे अंदाज में मनाने जा रहा है। इस अवसर पर घर-घर में रानी की याद में दीप जलाए जाएंगे। दीपों के साथ गौरवपूर्ण क्षण की फोटो आप हमें भेजिये, 19 जून के अंक में हम आपकी फोटो प्रकाशित करेंगे। फोटो हमारे मोबाइल नंबर 9415183605 पर भेज सकते हैं।
ब्रिटिश हुकूमत से देश की आजादी का बिगुल झांसी की धरती से फूंका गया था। 1857 में इसकी अगुवाई वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ने की थी। स्वराज की खातिर फिरंगियों से लड़ते हुए रानी ने 18 जून 1858 को वीरगति प्राप्त की थी। बृहस्पतिवार को वीरांगना की 162वीं पुण्य तिथि है। नई पीढ़ी झांसी के गौरवशाली इतिहास से परिचित हो, इसके लिए रानी की पुण्य तिथि पर घर - घर दीप जलाए जाएंगे। आपके इस गरिमापूर्ण क्षण की फोटो हम अगले दिन प्रकाशित करेंगे। फोटो के साथ नाम और पता जरूर लिखें।
ग्वालियर में शहीद हुईं थीं रानी
झांसी। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का जीवन काल महज 22 साल 6 माह 29 दिन का रहा। उनका जन्म 19 नवंबर 1835 को हुआ था, जबकि 18 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हुईं थीं। 1857 के संग्राम की शुरुआत झांसी से हुई थी, लेकिन अंत ग्वालियर में रानी की वीरगति के साथ हुआ था। युद्ध की रणनीति के तहत रानी ग्वालियर पहुंची थीं। आखिरी समय में उनके साथ वफादार साथियों की छोटी सी टुकड़ी थी। भनक मिलते ही अंग्रेजों उन्हें वहां घेर लिया था। बावजूद, चारों तरफ से घिरी होने के बाद भी रानी ने हिम्मत नहीं हारी थी। अंग्रेजी सेना के वार पर वार वे सहन करती रहती रहीं और मुंह में घोड़े की लगाम थामकर दोनों हाथों से तलवार चलाती रहीं। लेकिन, काल के क्रूर पंजे ने रानी को अपनी चपेट में ले लिए। साथी उनके शव को अंग्रेजों से बचाते हुए पास में साधू गंगादास की कुटिया में ले गए। जहां रानी का अंतिम संस्कार हुआ। रानी ने पहले से ही कह रखा था कि उनके शव को भी कोई फिरंगी छू न पाए।
विज्ञापन
विज्ञापन
ब्रिटिश हुकूमत से देश की आजादी का बिगुल झांसी की धरती से फूंका गया था। 1857 में इसकी अगुवाई वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ने की थी। स्वराज की खातिर फिरंगियों से लड़ते हुए रानी ने 18 जून 1858 को वीरगति प्राप्त की थी। बृहस्पतिवार को वीरांगना की 162वीं पुण्य तिथि है। नई पीढ़ी झांसी के गौरवशाली इतिहास से परिचित हो, इसके लिए रानी की पुण्य तिथि पर घर - घर दीप जलाए जाएंगे। आपके इस गरिमापूर्ण क्षण की फोटो हम अगले दिन प्रकाशित करेंगे। फोटो के साथ नाम और पता जरूर लिखें।
विज्ञापन
ग्वालियर में शहीद हुईं थीं रानी
झांसी। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का जीवन काल महज 22 साल 6 माह 29 दिन का रहा। उनका जन्म 19 नवंबर 1835 को हुआ था, जबकि 18 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हुईं थीं। 1857 के संग्राम की शुरुआत झांसी से हुई थी, लेकिन अंत ग्वालियर में रानी की वीरगति के साथ हुआ था। युद्ध की रणनीति के तहत रानी ग्वालियर पहुंची थीं। आखिरी समय में उनके साथ वफादार साथियों की छोटी सी टुकड़ी थी। भनक मिलते ही अंग्रेजों उन्हें वहां घेर लिया था। बावजूद, चारों तरफ से घिरी होने के बाद भी रानी ने हिम्मत नहीं हारी थी। अंग्रेजी सेना के वार पर वार वे सहन करती रहती रहीं और मुंह में घोड़े की लगाम थामकर दोनों हाथों से तलवार चलाती रहीं। लेकिन, काल के क्रूर पंजे ने रानी को अपनी चपेट में ले लिए। साथी उनके शव को अंग्रेजों से बचाते हुए पास में साधू गंगादास की कुटिया में ले गए। जहां रानी का अंतिम संस्कार हुआ। रानी ने पहले से ही कह रखा था कि उनके शव को भी कोई फिरंगी छू न पाए।
विज्ञापन