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कइयों को पहनाया ‘ताज’, लेकिन खुद रहे ‘बेताज’

Sat, 12 Feb 2022 01:54 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sat, 12 Feb 2022 01:54 AM IST
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Some wore 'crown', but remained 'uncrowned'
झांसी। झांसी विधानसभा सीट पर मुस्लिम वोटरों ने कई बार समर्थन देकर तमाम राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को विधायक बनाया, लेकिन जब भी कोई मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरा तो हर बार हार से रूबरू होना पड़ा। झांसी से अब तक एक भी मुस्लिम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं कर सका है।
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झांसी विधानसभा क्षेत्र से कई बार मुस्लिम नेताओं ने किस्मत आजमाई है, लेकिन हर बार उनको हार का सामना करना पड़ा है। सन 1980 में पहली बार मुस्लिम उम्मीदवार चौधरी महमूद ने कांग्रेस के टिकट पर किस्मत आजमाई थी, लेकिन पराजय का सामना करना पड़ा था। उसके बाद चौधरी महमूद के बेटे चौधरी मोहम्मद मुकीम ने सन 1989, 1991 और 1993 में बहुजन समाज पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ा। लेकिन वह तीनों ही चुनाव में एक बार भी जीत दर्ज नहीं कर सके।
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वर्ष 1991 में कांग्रेस ने झांसी विधानसभा क्षेत्र से मुस्लिम प्रत्याशी मुख्तार अहमद को चुनावी मैदान में उतार दिया। जिसके चलते एक ही चुनाव में दो मुस्लिम उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। उस चुनाव में दोनों ही मुस्लिम प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा था। वहीं 2009 के उपचुनाव और 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने झांसी विधानसभा से अशफान सिद्दीकी को टिकट देकर मुस्लिम उम्मीदवार पर भरोसा जताया था, लेकिन दोनों ही बार अशफान सिद्दीकी जीत हासिल नहीं कर सके। इस बार एआईएमआईएम ने मुस्लिम प्रत्याशी सादिक अली को टिकट देकर चुनावी रण में उतारा है।
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झांसी सदर सीट पर कम नहीं हैं मुस्लिम मतदाता
झांसी सदर सीट पर मुस्लिम मतदाता कम नहीं हैं। पिछले चुनाव तक यहां 50000 मुस्लिम मतदाता थे। इस बार मतदाताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। लेकिन, किसी भी चुनाव में मुस्लिम प्रत्याशी को मुस्लिमों के ही पूरे वोट नहीं मिल सके। हालांकि अधिकांश मुस्लिमों ने प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया, लेकिन वह जीत के लिए नाकाफी रहा।
ललितपुर सदर और महरौनी सीट पर कभी नहीं उतारा मुस्लिम प्रत्याशी
अल्पसंख्यक हितों की बात तो राजनीतिक दल लगातार करते आ रहे हैं लेकिन जिले की दो विधान सभा क्षेत्रों में कभी मुस्लिम प्रत्याशी पर दांव नहीं लगाया। यह स्थिति तब है जबकि दोनों क्षेत्रों में करीब 26 हजार मुस्लिम मतदाता हैं।

आजादी के बाद महरौनी विधान सभा में पहली बार वर्ष 1951 में चुनाव हुआ था तब से आज तक इस सीट पर किसी भी राजनीतिक दल ने मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव मैदान में नहीं उतारा। इस क्षेत्र में करीब 5 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। जबकि सदर विधान सभा क्षेत्र में वर्ष 1974 से शुरू हुए विधान सभा चुनाव में भी यही स्थिति रही। इस क्षेत्र में करीब 21 हजार मुस्लिम मतदाता हैं लेकिन कोई प्रमुख मुस्लिम नेता उभर के नहीं आ पाया। इस वजह से मुस्लिम मतदाता अपने विवेक से ही मतदान करते चले आ रहे हैं।
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