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तो क्या....अवैध जरीब से हो रही है जमीनों की पैमाइश
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झांसी। जिले में जमीनों की पैमाइश अवैध जरीब से की जा रही है। जरीब (चेन) का सत्यापन सरकारी नियमानुसार दो साल में एक बार विधिक एवं बांट माप विभाग द्वारा करना आवश्यक होता है। सत्यापन के बाद ही जरीब को वैध माना जाता है। लेकिन तहसील प्रबंधन द्वारा कई सालों से जरीब का सत्यापन ही नहीं कराया गया है। सबसे अजीब बात यह है कि सरकारी हुक्मरानों को ही आदेशों की जानकारी नहीं है।
जमीनों की नापजोख के लिए तहसील में मौजूद जरीब की नाप को ही विश्वसनीय माना जाता है। विभाग में मौजूद जरीब की लंबाई 66 फुट होती है। जिसमें 100 कड़ी होती हैं। प्रत्येक कड़ी की लंबाई लगभग आठ इंच होती है। दस कड़ी के बाद एक टैग होता है। जमीनों के विवादों के निपटारे के साथ ही नापजोख के लिए सरकारी जरीब को इस्तेमाल किया जाता है। जरीब में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हो इसके लिए तहसील प्रशासन द्वारा दो साल में एक बार विधिक एवं बांट मांप विभाग से जरीब का सत्यापन करने के बाद ही जरीब को वैध होने का प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। प्रमाण पत्र जारी होने के बाद ही जरीब को वैध माना जाता है। लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी तहसील प्रबंधन द्वारा जरीब का सत्यापन ही नहीं कराया गया है।
यह है नियम
2009 अधिनियम की धारा 24/37 के तहत दो साल के अंतराल में विधिक एवं बांट माप विभाग द्वारा सत्यापन और मुद्रांकन जरूरी है। विभाग द्वारा जिस जरीब के लिए प्रमाण पत्र जारी करेगा। उसी को पैमाइश के लिए वैध मनाना जाएगा। बिना सत्यापन वाली जरीब से जमीन की माप करना कानूनी रूप से गलत है।
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निजी जरीब से हो रही है पैमाइश
लेखपालों द्वारा सरकारी जरीब की जगह बाजारों में बिकने वाले जरीब से ही पैमाइश की जा रही है। हैरानी की बात यह है यह जरीब बाजारों में बड़ी ही आसानी से मिल जाती है। जिसके चलते तहसील के सभी लेखपालों पर निजी जरीब है। जिससे ही जमीनों की नाप की जा रही है।
जरीब के सत्यापन की कोई भी जानकारी नहीं है। जिसके चलते विधिक एवं बांट माप विभाग से आज तक जरीब का सत्यापन नहीं कराया जा सका है।
मनोज कुमार, तहसीलदार
कई सालों से विभाग में कार्यरत हूं। लेकिन आज तक तहसील द्वारा जरीब का सत्यापन नहीं कराया गया है। यह स्थिति पूरे प्रदेश भर में है।
डीसी गुप्ता, सीनियर इंस्पेक्टर, विधिक एवं बांट माप विभाग
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जमीनों की नापजोख के लिए तहसील में मौजूद जरीब की नाप को ही विश्वसनीय माना जाता है। विभाग में मौजूद जरीब की लंबाई 66 फुट होती है। जिसमें 100 कड़ी होती हैं। प्रत्येक कड़ी की लंबाई लगभग आठ इंच होती है। दस कड़ी के बाद एक टैग होता है। जमीनों के विवादों के निपटारे के साथ ही नापजोख के लिए सरकारी जरीब को इस्तेमाल किया जाता है। जरीब में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हो इसके लिए तहसील प्रशासन द्वारा दो साल में एक बार विधिक एवं बांट मांप विभाग से जरीब का सत्यापन करने के बाद ही जरीब को वैध होने का प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। प्रमाण पत्र जारी होने के बाद ही जरीब को वैध माना जाता है। लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी तहसील प्रबंधन द्वारा जरीब का सत्यापन ही नहीं कराया गया है।
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यह है नियम
2009 अधिनियम की धारा 24/37 के तहत दो साल के अंतराल में विधिक एवं बांट माप विभाग द्वारा सत्यापन और मुद्रांकन जरूरी है। विभाग द्वारा जिस जरीब के लिए प्रमाण पत्र जारी करेगा। उसी को पैमाइश के लिए वैध मनाना जाएगा। बिना सत्यापन वाली जरीब से जमीन की माप करना कानूनी रूप से गलत है।
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निजी जरीब से हो रही है पैमाइश
लेखपालों द्वारा सरकारी जरीब की जगह बाजारों में बिकने वाले जरीब से ही पैमाइश की जा रही है। हैरानी की बात यह है यह जरीब बाजारों में बड़ी ही आसानी से मिल जाती है। जिसके चलते तहसील के सभी लेखपालों पर निजी जरीब है। जिससे ही जमीनों की नाप की जा रही है।
जरीब के सत्यापन की कोई भी जानकारी नहीं है। जिसके चलते विधिक एवं बांट माप विभाग से आज तक जरीब का सत्यापन नहीं कराया जा सका है।
मनोज कुमार, तहसीलदार
कई सालों से विभाग में कार्यरत हूं। लेकिन आज तक तहसील द्वारा जरीब का सत्यापन नहीं कराया गया है। यह स्थिति पूरे प्रदेश भर में है।
डीसी गुप्ता, सीनियर इंस्पेक्टर, विधिक एवं बांट माप विभाग