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चुनाव में अब नहीं मिलता पेंटरों को काम
Jhansi
Updated Sun, 05 Feb 2017 12:45 AM IST
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चुनाव में अब नहीं मिलता पेंटरों को काम
- फोटो : demo
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चुनाव में लाखों रुपये कमाने वाले पेंटरों के हाथ इस बार खाली हैं। निर्वाचन आयोग की सख्ती ने उनकी आर्थिक कमर तोड़ दी है। रही- सही कसर विकास योजनाओं के काम पर रोक ने पूरी कर दी है। ऐसे में पेंटर इधर- उधर भटक कर छोटे - मोटे काम तलाशने के लिए मजबूर हैं।
चुनाव का मौसम कई लोगों के लिए रोजगार का अच्छा मौका होता है। खासकर पेंटरों के लिए यह उत्सव की तरह होता था। वे दीवार लेखन, कपड़े पर होर्डिंग, बैनर और झंडे बनाकर एकमुश्त कमाई कर लेते थे। करीब पंद्रह साल पहले तक हर चुनाव में पेंटरों के पास इतना काम होता था कि महीनों पहले से काम शुरू करने के बावजूद समय से आर्डर पूरे नहीं कर पाते थे, लेकिन अब स्थिति उलट हो गई है। बड़े पेंटरों को चुनाव आयोग की सख्ती से ज्यादा असर नहीं पड़ा है, लेकिन छोटे पेंटरों को गहरी चोट लगी है। चुनाव हो या सरकारी कार्यक्रम कहीं से भी पेंटरों को काम नहीं मिल पा रहा है। फ्लैक्स बोर्ड व कट आउट का धंधा चौपट हो गया है। इन हुनरमंदों को अब मजदूरी भी काम के हिसाब से नहीं मिल पा रही है।
फोटो
रोजी रोटी की जुगाड़ हुई मुश्किल
पहले चुनाव के दौरान इतना कमा लेते थे कि यदि छह माह भी काम नहीं मिले तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता था। अतिरिक्त कर्मचारी बुलाकर दिन- रात काम करवाते थे, जिससे अन्य पेंटरों को भी रोजगार मिल जाता था। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने प्रचार सामग्री पर रोक लगाई थी, तब से चुनाव में बड़ी मुश्किल से रोजी- रोटी का जुगाड़ हो पा रहा है।
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- इशरत अली, पेंटर
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कई पेंटरों का छिन गया रोजगार
चुनाव आने के साल भर पहले से काम शुरू हो जाता था। अच्छा रोजगार होने के कारण कई पेंटरों ने इसे अपना धंधा बना लिया था। मगर, जब से प्रचार सामग्री बननी बंद हुई, कई लोगों को पेंटिंग का काम छोड़ना पड़ा। अब वे दूसरे काम करने को मजबूर हैं।
- साजिद, पेंटर
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चुनाव का मौसम कई लोगों के लिए रोजगार का अच्छा मौका होता है। खासकर पेंटरों के लिए यह उत्सव की तरह होता था। वे दीवार लेखन, कपड़े पर होर्डिंग, बैनर और झंडे बनाकर एकमुश्त कमाई कर लेते थे। करीब पंद्रह साल पहले तक हर चुनाव में पेंटरों के पास इतना काम होता था कि महीनों पहले से काम शुरू करने के बावजूद समय से आर्डर पूरे नहीं कर पाते थे, लेकिन अब स्थिति उलट हो गई है। बड़े पेंटरों को चुनाव आयोग की सख्ती से ज्यादा असर नहीं पड़ा है, लेकिन छोटे पेंटरों को गहरी चोट लगी है। चुनाव हो या सरकारी कार्यक्रम कहीं से भी पेंटरों को काम नहीं मिल पा रहा है। फ्लैक्स बोर्ड व कट आउट का धंधा चौपट हो गया है। इन हुनरमंदों को अब मजदूरी भी काम के हिसाब से नहीं मिल पा रही है।
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रोजी रोटी की जुगाड़ हुई मुश्किल
पहले चुनाव के दौरान इतना कमा लेते थे कि यदि छह माह भी काम नहीं मिले तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता था। अतिरिक्त कर्मचारी बुलाकर दिन- रात काम करवाते थे, जिससे अन्य पेंटरों को भी रोजगार मिल जाता था। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने प्रचार सामग्री पर रोक लगाई थी, तब से चुनाव में बड़ी मुश्किल से रोजी- रोटी का जुगाड़ हो पा रहा है।
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- इशरत अली, पेंटर
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कई पेंटरों का छिन गया रोजगार
चुनाव आने के साल भर पहले से काम शुरू हो जाता था। अच्छा रोजगार होने के कारण कई पेंटरों ने इसे अपना धंधा बना लिया था। मगर, जब से प्रचार सामग्री बननी बंद हुई, कई लोगों को पेंटिंग का काम छोड़ना पड़ा। अब वे दूसरे काम करने को मजबूर हैं।
- साजिद, पेंटर