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मौसम बदलते ही नवजातों में बढ़ने लगा निमोनिया
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झांसी। मौसम में ठंडक होते ही नवजात निमोनिया के शिकार होने लगे हैं। जिसके चलते जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में रोजाना लगभग पांच नवजातों को भर्ती कर निमोनिया का इलाज किया जा रहा है। वहीं ओपीडी में भी रोजाना बीस से तीस नवजातों को परिजन निमोनिया का इलाज कराने के लिए जा रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार सर्दी के मौसम में नवजातों की देखभाल में कमी होने के कारण नवजात निमोनिया की चपेट में आ रहे हैं।
सर्दी के मौसम में लापरवाही व देखभाल की कमी होने के कारण नवजातों को ठंड हो जाती है। जिसके चलते सीने में जकड़न के साथ ही खांसी व जुकाम हो जाता है। समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण सर्दी निमोनियों में बदल जाती है। यह एक का संक्रमण है जिसमें वैक्टीरिया सांस के माध्यम से नवजात के फेफड़ों तक पहुंच जाता है। निमोनिया होने पर बच्चे में कपकपी व पसीने के साथ बुखार आता है। वहीं सूखी खांसी के साथ बलगम आने लगता है। निमोनिया होने पर होंठ अथवा नाखूनों का रंग नीला पड़ जाता है। जिसके चलते नवजात को सांस लेने में दिक्कत व परेशानी होती है।
इस संबंध में जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अरविंद सोनी ने बताया कि मौसम में ठंडक होती ही नवजातों में निमोनिया खतरा बढ़ जाता है।
- जन्म के छह माह तक नवजात को सिर्फ मां का दूध ही पिलाना चाहिए।
- छह माह के बाद कम मात्रा में अतिरिक्त आहार की शुरूआत करना चाहिए।
- खांसी जुकाम व बुखार के रोगी से बच्चे की उचित दूरी आवश्यक है।
- घरों में भी बच्चों को ढक कर रखना चाहिए।
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सर्दी के मौसम में लापरवाही व देखभाल की कमी होने के कारण नवजातों को ठंड हो जाती है। जिसके चलते सीने में जकड़न के साथ ही खांसी व जुकाम हो जाता है। समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण सर्दी निमोनियों में बदल जाती है। यह एक का संक्रमण है जिसमें वैक्टीरिया सांस के माध्यम से नवजात के फेफड़ों तक पहुंच जाता है। निमोनिया होने पर बच्चे में कपकपी व पसीने के साथ बुखार आता है। वहीं सूखी खांसी के साथ बलगम आने लगता है। निमोनिया होने पर होंठ अथवा नाखूनों का रंग नीला पड़ जाता है। जिसके चलते नवजात को सांस लेने में दिक्कत व परेशानी होती है।
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इस संबंध में जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अरविंद सोनी ने बताया कि मौसम में ठंडक होती ही नवजातों में निमोनिया खतरा बढ़ जाता है।
- जन्म के छह माह तक नवजात को सिर्फ मां का दूध ही पिलाना चाहिए।
- छह माह के बाद कम मात्रा में अतिरिक्त आहार की शुरूआत करना चाहिए।
- खांसी जुकाम व बुखार के रोगी से बच्चे की उचित दूरी आवश्यक है।
- घरों में भी बच्चों को ढक कर रखना चाहिए।