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शहर की सरकार को अधिकार की दरकार

Mon, 13 Nov 2017 12:13 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 13 Nov 2017 12:13 AM IST
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nagr nigam chunav
nagr nigam, jhansi news - फोटो : demo
नगर निगम की अव्यवस्थाओं का ठीकरा भले ही महापौर के सिर फूटता हो, लेकिन सच्चाई यह है कि उनके पास कोई भी ऐसा अधिकार नहीं है, जिससे वह व्यवस्थाओं को दुरुस्त कर सकें। हकीकत यह है कि नगर आयुक्त की स्वीकृति के बिना वह कोई भी वित्तीय फैसला नहीं ले सकते हैं। इतना ही नहीं नगर निगम सदन से पास प्रस्ताव शासन की स्वीकृति के बिना लागू नहीं हो पाते हैं। यह सब संविधान के 74 वें संशोधन विधेयक के लागू नहीं होने के कारण है।
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उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में नियमित रूप से निकाय चुनाव नहीं होने और सदन के भंग रहने के कारण 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने संविधान में 74 वां संशोधन विधेयक लागू किया था, ताकि स्थानीय निकाय के अफसर शहर के विकास को गति दे सकें। महापौर अपनी देखरेख में शहर का सर्वांगीण विकास करा सकें। केंद्र सरकार ने संशोधन प्रस्ताव पारित करते समय इसे सभी राज्यों में लागू करने की बाध्यता नहीं रखी, बल्कि इसके लिए राज्य सरकारों को स्वतंत्र कर दिया। इसी का नतीजा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे लागू नहीं किया, क्योंकि यदि लागू हो जाता तो राज्य सरकार का शहर की सरकार पर अपना नियंत्रण नहीं रहता। संविधान संशोधन लागू नहीं होने के कारण उत्तर प्रदेश के शहरों का विकास उतनी तेजी से नहीं हो सका, जैसा होना चाहिए था।
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इन राज्यों में लागू है विधेयक
मध्य प्रदेश, केरल, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात में 74 वां संविधान संशोधन विधेयक लागू है।

सभी कार्यालय होते नियंत्रण में
यदि 74 वां संविधान संशोधन विधेयक उत्तर प्रदेश में लागू हो जाता तो महापौर के पास भी नगर निगम के साथ-साथ  झांसी विकास प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग, स्वास्थ्य, पुलिस, शिक्षा जैसे विभाग महापौर के नियंत्रण में होते। महापौर अपनी देखरेख में इन विभागों का काम संचालित कराते। महापौर के पास वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार रहते, जिससे विभाग नियंत्रण में रहते। पार्षदों को अलग-अलग विभागों का प्रभारी बनाया जाता। लेकिन, संविधान संशोधन लागू नहीं होने के कारण महापौर सिर्फ सलाहकार के रूप में काम कर रहे हैं।
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कराते हैं बेवजह के काम
चुनाव में पैसा खर्च करने के बाद महापौर और पार्षद चुनाव जीत कर आते हैं, परंतु उन्हें अधिकार नहीं होने के कारण वार्डों में बेवजह के विकास कार्य कराते हैं। इनमें कहीं नाली की रिपेयरिंग तो कहीं सड़क पर एपेक्स लगवाना, कहीं सीसी सड़क तोड़कर फिर से सड़क बनवाना जैसे काम शामिल हैं। एक ही काम बार-बार कराने से बेवजह के भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।


... फिर नगर आयुक्त नहीं कर पाते मनमानी
यदि 74 वां संविधान संशोधन विधेयक उत्तर प्रदेश में लागू हो जाता है तो नगर आयुक्त मनमानी नहीं कर पाते। अभी 10 से 15 लाख रुपये तक के काम कराने का अधिकार है, लेकिन विधेयक लागू हो जाने के बाद सभी अधिकार महापौर के पास आ जाते।
- किरन वर्मा
निवर्तमान महापौर
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