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दीमक चट कर गए किताबें, खत्म हुई नगर निगम की लाइब्रेरी
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झांसी। गांधी स्मारक भवन स्थित नगर निगम की प्रतिष्ठित लाइब्रेरी में अब किताबें ही नहीं बची। दीमक पांच हजार से अधिक किताबें चट कर गए। बची हुई किताबों की भी हाल खस्ता है। इनको रैक से हटाकर ऊपर की उन अलमारियोें में बंद कर दिया गया जहां कोई पहुंच नहीं सकता। निगम अफसरों का ध्यान भी इस दुर्दशा की ओर नहीं है।
राष्ट्र रक्षा समर्पण पर्व के दौरान प्रधानमंत्री समेत अन्य तमाम वीवीआईपी के आगमन के चलते गांधी स्मारक भवन का रंग-रोगन करके उसे चमका दिया गया लेकिन, इसी इमारत के एक हिस्से में चलने वाली नगर निगम की लाइब्रेरी की ओर किसी अफसर का ध्यान नहीं गया। जानकारों के मुताबिक एक समय में इस लाइब्रेरी में पांच हजार से अधिक किताबें थीं। इनमें तमाम समकालीन साहित्यकारों की रचनाओं के अलावा इतिहास, राजनीति शास्त्र, विज्ञान समेत अन्य विषयों पर केंद्रित पुस्तकों की खरीद हुई थी।
इनमें तमाम किताबें ऐसी थीं जिनका अब कोई संस्करण ही नहीं बचा। यह किताबें पचास साल से अधिक पुरानी होने की वजह से दुर्लभ हो चुकीं। महारानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर केंद्रित कई शोधपरख ग्रंथ भी यहां रखवाए गए। संदर्भ ग्रंथ भी खरीदे गए लेकिन, रखरखाव न होने से साल-दर-साल किताबों की दशा बिगड़ती गई। अब हालात यह है कि अधिकांश पुरानी किताबें नष्ट हो गईं। इनमें महज पांच-छह सौ किताबें ही बची हैं। यह भी पढ़ने लायक नहीं रह गईं। इनको रैक से निकालकर ऊपर की अलमारियों में बंद कर दिया गया।
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कुछ वर्ष पहले तक इन किताबों को पढ़ने के लिए यहां पाठकों का जमावड़ा रहता था लेकिन, किताबों के न होने से पाठकों की संख्या सिमटकर दहाई में पहुंच गई। अब सिर्फ कुछ छात्र ही यहां प्रतियोगी पत्रिकाएं एवं समाचार पत्र पढ़ने ही यहां पहुंचते हैं। यह हालत तब है जब नगर निगम ने इसके संचालन के लिए दस लाख रुपये का भारी-भरकम बजट तय कर रखा है। पांच लाख रुपये सिर्फ लाइब्रेरी के रख-रखाव के लिए तय किया गया है। उधर, महापौर रामतीर्थ सिंघल का कहना है अगर यह दशा है तब इसकी जांच कराई जाएगी। इसको ठीक कराने का काम कराया जाएगा।
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राष्ट्र रक्षा समर्पण पर्व के दौरान प्रधानमंत्री समेत अन्य तमाम वीवीआईपी के आगमन के चलते गांधी स्मारक भवन का रंग-रोगन करके उसे चमका दिया गया लेकिन, इसी इमारत के एक हिस्से में चलने वाली नगर निगम की लाइब्रेरी की ओर किसी अफसर का ध्यान नहीं गया। जानकारों के मुताबिक एक समय में इस लाइब्रेरी में पांच हजार से अधिक किताबें थीं। इनमें तमाम समकालीन साहित्यकारों की रचनाओं के अलावा इतिहास, राजनीति शास्त्र, विज्ञान समेत अन्य विषयों पर केंद्रित पुस्तकों की खरीद हुई थी।
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इनमें तमाम किताबें ऐसी थीं जिनका अब कोई संस्करण ही नहीं बचा। यह किताबें पचास साल से अधिक पुरानी होने की वजह से दुर्लभ हो चुकीं। महारानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर केंद्रित कई शोधपरख ग्रंथ भी यहां रखवाए गए। संदर्भ ग्रंथ भी खरीदे गए लेकिन, रखरखाव न होने से साल-दर-साल किताबों की दशा बिगड़ती गई। अब हालात यह है कि अधिकांश पुरानी किताबें नष्ट हो गईं। इनमें महज पांच-छह सौ किताबें ही बची हैं। यह भी पढ़ने लायक नहीं रह गईं। इनको रैक से निकालकर ऊपर की अलमारियों में बंद कर दिया गया।
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कुछ वर्ष पहले तक इन किताबों को पढ़ने के लिए यहां पाठकों का जमावड़ा रहता था लेकिन, किताबों के न होने से पाठकों की संख्या सिमटकर दहाई में पहुंच गई। अब सिर्फ कुछ छात्र ही यहां प्रतियोगी पत्रिकाएं एवं समाचार पत्र पढ़ने ही यहां पहुंचते हैं। यह हालत तब है जब नगर निगम ने इसके संचालन के लिए दस लाख रुपये का भारी-भरकम बजट तय कर रखा है। पांच लाख रुपये सिर्फ लाइब्रेरी के रख-रखाव के लिए तय किया गया है। उधर, महापौर रामतीर्थ सिंघल का कहना है अगर यह दशा है तब इसकी जांच कराई जाएगी। इसको ठीक कराने का काम कराया जाएगा।