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जलवायु परिवर्तन से एक दशक में एक महीने खिसक गया मानसून

Sun, 05 Jun 2022 12:09 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sun, 05 Jun 2022 12:09 AM IST
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Monsoon slipped by one month in a decade due to climate change
झांसी। जलवायु परिवर्तन की वजह से बुंदेलखंड में पिछले एक दशक में मानसून एक महीने आगे खिसक गया है। अब 15 जुलाई के आसपास अच्छी बारिश शुरू हो पाती है। ऐसे में फसलों की बुवाई से लेकर तैयार होने का चक्र तक प्रभावित हो गया है। धान की नर्सरी तैयार करने के लिए बारिश का इंतजार करना पड़ता है। इस बार तो प्रचंड गर्मी पड़ने से गेहूं का दाना जल्दी पककर सिकुड़ गया है।
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झांसी समेत बुंदेलखंड में मानसूनी बारिश का समय 15 जून से 15 सितंबर तक होता है। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अरविंद कुमार ने बताया कि बारिश के बाद अक्तूबर के पहले सप्ताह में सरसों की बुवाई की जाती थी। मगर जलवायु परिवर्तन के चलते बारिश का चक्र बिगड़ गया। वहीं, अब अक्तूबर तक 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान बना रहता है। इस वजह से किसान अक्तूबर के अंत या फिर नवंबर के पहले हफ्ते में बुवाई करते हैं। उन्होंने बताया कि इस बार तो मार्च से ही प्रचंड गर्मी पड़ने लगी। ऐसे में गेहूं का दाना जल्दी पक गया और छोटा रह गया। ऐसे में गेहूं का उत्पादन कम होने की संभावना है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विनीत कुमार ने बताया कि पिछले एक दशक में बुंदेलखंड में एक महीने आगे मानसून खिसक गया है। अब 15 जून की जगह 15 जुलाई के आसपास वर्षा होती है। पहले मई के अंतिम सप्ताह में किसान धान की नर्सरी तैयार करने लगते थे मगर अब बारिश का इंतजार करना पड़ता है। नर्सरी तैयार करने के 15 दिनों में वर्षा नहीं हुई तो ये सूख जाती है। इसलिए किसान अब जून के अंत तक नर्सरी तैयार करते हैं।
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कम पानी, जलवायु परिवर्तन से इन फसलों को दें बढ़ावा
कुलपति ने बताया कि किसानों को सुस्त जलवायु में होने वाली उद्यानिकी फसलें जैसे बेर, बेल, आंवला, अमरूद, करौंदा के अलावा नींबू वर्गीय पौधों को भी बढ़ावा देना है। ये सब बुंदेलखंड की जलवायु के मुफीद हैं। साथ ही कार्बन डाईऑक्साइड का उत्पादन कम करना है, इसलिए वन क्षेत्र बढ़ाना होगा।
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35 की जगह अब 15 प्रतिशत बच पा रहे पौधे
कृषि विश्वविद्यालय के वानिका विभागाध्यक्ष डॉ. मनमोहन डोबरियाल ने बताया कि बुंदेलखंड में एक दशक पहले पौधरोपण करने के बाद 30 से 35 फीसदी पौधे बच जाते थे। चूंकि, ये पथरीला इलाका है। 45 से 47 डिग्री सेल्सियस तापमान 15 दिनों तक रहने से पेड़-पौधों की जड़ें सूख जाती हैं। अब लगातार तापमान बढ़ रहा है। इस कारण 10 से 15 प्रतिशत पौधे ही विकास कर पाते हैं। उन्होंने बताया कि इस बार गर्मी में तो आम, अनार आदि फल तक फट गए हैं।

दो सालों में चित्रकूट छोड़ कहीं नहीं बढ़ा जंगल
डॉ. डोबरियाल ने बताया कि 1988 की केंद्र सरकार की वन नीति के अनुसार भूमि का 33 फीसदी वन क्षेत्र होना चाहिए, ताकि पृथ्वी चक्र अच्छे से चल सके। एफएसआई की रिपोर्ट के अनुसार झांसी समेत बुंदेलखंड में पिछले दो सालों में वन क्षेत्र में कोई इजाफा नहीं हुआ है। सिर्फ चित्रकूट में 45.29 वर्ग किलोमीटर जंगल बढ़ा है। उन्होंने बताया कार्बन डाईऑक्साइड को शोषित करने के लिए वन क्षेत्र कम है। इस कारण वातावरण शुद्ध नहीं रह पाता है। सूखा पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।
बुंदेलखंड में कहां-कितना जंगल
जिला वन क्षेत्र
बांदा 2.31 फीसदी
महोबा 5.14 फीसदी
जालौन 5.42 फीसदी
हमीरपुर 5.65 फीसदी
झांसी 6.05 फीसदी
ललितपुर 11.54 फीसदी
चित्रकूट 19.64 फीसदी
(नोट: ये आंकड़े एफएसआई 2021 की रिपोर्ट के हैं।)
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